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Tuesday, 25 May 2021

किसानों की आर-पार की लड़ाई है 26 मई को फिर से मोदी सरकार को ललकारना



इसे मोदी सरकार की मनमानी ही तो कहा जाएगा कि कोरोना कहर के बीच नरेन्द्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के दिन 26 मई को किसान काला दिवस मना रहे हैं। किसानों ने दिल्ली की सीमा पर एकत्र होकर फिर से मोदी सरकार को ललकारने की रणनीति बनाई है। कोरोना संक्रमण को झेलते हुए किसानों के इस जमावड़े को मोदी सरकार केे खिलाफ आरपार की लड़ाई के रूप में देखा जाना चाहिए। मोदी सरकार और उसका मीडिया भले ही कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए किसानों के इस कदम को देश के लिए घातक बता रहे हों पर क्या मोदी सरकार ने इन परिस्थितियों में किसानों को इस कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं किया है। जब लोग कोरोना संक्रमण के डर से अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं तो ऐसे में किसान अपनी जान हथेली पर रखकर सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं तो यह माना जाए कि अब किसान निर्णायक मूड में आ गये हैं।

दरअसल मोदी सरकार लगातार किसानों की भावनाओं से खेल रही है। किसान अपनी मांगों को लकर चिल्लाते रहे पर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं  रेंगी। बैठकों के नाम पर किसान संगठनों को मात्र बेवकूफ ही बनाया गया। 26 जनवरी प्रकरण के बाद किसान संगठन लगातार मोदी सरकार को वार्ता के लिए लिख रहे हैं पर सरकार ने चुप्पी साध ली है। ऐसे में यही कहा जाएगा कि मोदी सरकार ने कोरोना कहर के बीच फिर से किसानों को फिर से जमावड़ा करने के लिए मजबूर कर दिया है।  वैसे भी छह महीने से कोरोना को झेलते हुए किसान आंदोलन तो कर ही रहे हैं।
जो लोग किसानों के इस रुख को गलत ठहरा रहे हैं, उन्होंने इस आंदोलन में 200 से अधिक किसानों शहादत पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं दिखाई। किसान सर्दी, गर्मी और बारिश झेलते हुए अपनी आवाज बुलंद करते रहे किसी को उनकी बेबसी नहीं दखाई दी। क्या नये कानून किसान ही नहीं जनविरोधी नहीं हैं ? क्या इस देश में खाद्यान्न की छूट आत्मघाती कदम नहीं है ? क्या कांट्रेक्ट फार्मिंग किसानों की जमीन को हथियाने का षड्यंत्र नहीं है ? क्या इस कानून में किसानों से अदालत में भी जाने का अधिकार नहीं छीन लिया गया है ? मोदी सरकार इस कानून में किसानों को व्यापारी बनाने की बात कह रही है। उसके अनुसार इससे फसल खरीद में कम्पटीशन बढ़ेगा। यदि ऐसा है तो फिर एमएसपी खरीद पर कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है ? जिसे कम्पटीशन करना एमएसपी से ऊपर करे। मतलब इन नये कानूनों के माध्यम से न केवल किसान बल्कि जनता जनता के हाथ से भी रोटी उतारने की पूरी तैयारी मोदी सरकार ने कर ली है। किसानों की खेती अडानी के हवाले करने का षड्यंत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रचे और किसान बोले भी न। आंदोलन भी न करें। वाह ही मोदी सरकार और गोदी मीडिया। यह आंदोलन मोदी सरकार को सबक सिखाने वाला माना जा रहा है।
किसानों इस ललकार के माध्यम से किसान प्रधानमंत्री को अपनी गलती का अहसास करा रहे हैं। अपना अहंकार छोड़कर जमीन पर आने का संदेश दे रहे हैं। हालांकि देश में विपक्ष के नाकारा होने की वजह से ही मोदी देश में नंगा नाच कर पा रही है फिर भी आंदोलन को कांग्रेस और सपा समेत 12 विपक्षी दलों का समर्थन मिलना आंदोलन को मजबूती देना ही है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह का पंजाब में कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए किसानों से आंदोलन को खत्म करने की अपील उनकी अपनी सत्ता की मजबूरी है।
मोदी सरकार को इस ललकार पर किसान मोर्चा का कहना है कि उनके इस आंदोलन को शक्ति प्रदर्शन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह शक्ति दिखाना नहीं बल्कि गहरे असंतोष की सांकेतिक अभिव्यक्ति है। किसान संगठनों ने प्रदर्शन के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन करने की भी बात कही है।
किसान संगठनों के अनुसार 26 मई को दिल्ली की सीमा ही नहीं बल्कि पूरे देश में नये किसान कानूनों के विरोध में किसान विरोध प्रदर्शन करेंगे। संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य और क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष डॉ. दर्शन पाल का कहना है कि किसान गांवों में, शहरों में और दिल्ली की सीमा पर अपना विरोध प्रदर्शन करेंगे। प्रदर्शनकारी काली पगडिय़ां पहनेंगे, काले दुपट्टे ओढेंगे और काले कपड़े पहनकर विरोध दर्शाएंगे। किसान अपने घरों की छतों पर, अपने टैक्टरों पर काले झंड़े लगाएंगे। जगह-जगह मोदी सरकार के पुतले जलाए जाएंगे। किसान अलग-अलग स्थानों पर धरना देंगे। उनका कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि ये एक आंदोलन होगा, लेकिन इसमें लोगों को एकत्रित करने या संख्या बल बढ़ाने पर जोर नहीं होगा। इसका उद्येश्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपना विरोध दर्ज कराना होगा। कोरोना संक्रमण के मुद्दे पर किसानों का कहना है कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनकी दुर्दशा की जिम्मेदारी लेने के कोई भी तैयार नहीं है। किसानों को अपनी जायज मांगों के लिए महामारी के काल में अपनी जान खतरे में डालकर आंदोलन करना पड़ रहा है। वैसे भी आंदोलन में किसानों का बड़ा चेहरा बनते जा रहे भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कह दिया है कि यह मोदी सरकार और किसानों के बीच कुश्ती है। इसमें एक जीतेगा और एक हारेगा।
आज भले ही मोदी सरकार के बनाये गये इस माहौल में आंदोलन किसानों को आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही नकली किसान की संज्ञा दी जा रही है पर यह भी जमीनी हकीकत है कि कृषि प्रधान देश में किसान हमेशा ही ठगे गये हैं। देश में किसानों की दुर्दशा नई नहीं है। किसानों का शोषण राजतंत्र से ही चला आ रहा है। पहले राजा-महाराजाओं, उनके ताबेदारों ने किसानों का शोषण किया। फिर मुगल आए तो उन्होंने किसानों को जम कर निचोड़ा। अंग्रेजों ने तो तमाम हदें पार कर दीं। वे जमीदारों से उनका शोषण कराते थे। देश आजाद होने के बाद भी किसान कर्ज, तंगहाली और बदहाली से आजाद नहीं हुए। ऐसा नहीं कि सरकारें किसानों की तंगहाली पर रोक के लिए कुछ नहीं करती हों। किसानों को कर्जे से मुक्त करने के लिए समय-समय पर कृषि माफी योजनाएं भी लाई गईं। पता चला कि इन योजनाओं का फायदा या तो बैंकों को मिला या फिर बिचौलियों को किसान तो बेचारा ठगा ही जाता रहा है।

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Monday, 24 May 2021

उप्र पंचायत चुनाव में शिक्षकों को धकेलने से भी ज्यादा घातक होगा सीबीएसई 12वीं की परीक्षा का फैसला!




मोदी सरकार आखिरकार चाहती क्या है ? क्या अभी इतनी मौतों पर उसका मन नहीं भरा है। देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का कहर अभी थमा नहीं है। ब्लैक फंगस की एक महामारी और आ गई है। ब्लैक फंगस से ज्यादा खतरनाक व्हाइट फंगस और इससे भी खतरनाक येलो फंगस के मामले सामने आ रहे हैं। कोरोना की तीसरी लहर के खतरे अंदेशा अलग से। वह बच्चों की जान को खतरा। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार सीबीएसई बोर्ड 12वीं की परीक्षाएं कराने का फैसला लेने जा रही है। बस परीक्षा की तिथियों की आधिकारिक घोषणा होना अभी बाकी रहने की बात सामने आ रही है।15 जुलाई से 25 अगस्त के बीच परीक्षा कराने की सूचनाएं आ रही हैं। यह सब तब करने का दम भरा जा रहा है जब देशभर के स्टूडेंट्स और पैरेंट्स परीक्षा होने का विरोध कर रहे हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंकÓ, शिक्षा राज्य मंत्री, अन्य केंद्रीय मंत्रियों और विभिन्न राज्यों के शिक्षा मंत्रियों व शिक्षा सचिवों की 23 मई को जो उच्च स्तरीय बैठक हुई है, उसमें से तो यही बातें निकल कर सामने आई हैं। हालांकि औचारिकता के लिए सुझाव भी मांगे गये हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब परीक्षा देने वाले विद्यार्थी और दिलाने वाले अभिाभावक परीक्षा रद्द करने की मांग कर रहे हैं तो सुझाव किससे मांगे जा रहे हैं ? क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को पता नहीं है कि जो बच्चे कोरोना संक्रमण और उससे होने वाली मौतों का तांदव देख रहे हैं उनकी मनोस्थिति क्या होगी ?  क्या इन बच्चों में ऐसे कितने बच्चे नहीं होंगे जिनके अपने कोरोना की चपेट में आकर दम तोड़ गये होंगे। या फिर दम तोडऩे की स्थिति में होंगे। क्या इन सब में से कितने बच्चे ऐसे नहीं होंगे जिनके अपने ब्लैक, व्हाइट या फिर येलो फंगस के शिकार हो गये होंगे। ऐसी परिस्थिति में केंद्र सरकार 12वीं के बच्चों को  खतरे में डालकर आखिर क्या दिखाना चाहती है ?
 क्या परीक्षा केंद्रों पर विद्यार्थियों को एक दूसरे मिलने और बात करने से रोका जा सकेगा ? क्या जब बच्चे परीक्षा देकर बाहर निकलेंगे तो एक दूसरे से बात नहीं करेंगे ? क्या इस माहौल में परीक्षा में शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक सुरक्षित रह पाएंगे ? यदि 12वीं सीबीएसई की परीक्षा होती है तो केंद्र का यह फैसला उत्तर प्रदेश शिक्षकों को पंचायत चुनाव में धकेलने से भी ज्यादा घातक साबित होगा। जब एक प्रदेश के एक दिन के चुनाव में 1629 शिक्षक कोरोना संक्रमण से दम तोड़ सकते हैं तो कल्पना कीजिए कि पूरे देश में लाखों विद्यार्थी परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा देंगे और हजारों शिक्षक दिलाएंगे तो बच्चों के साथ ही शिक्षकों में भी संक्रमण और मौत होने का कितना अंदेशा पैदा हो जाएगा ?
 वैसे भी जब दसवीं की परीक्षा रद्द कर दी गई हैं तो 12वीं की परीक्षा रद्द करने करने में दिक्कतें क्या आ रही हैं ? 12वीं के बच्चे 10वीं के बच्चों से मात्र दो साल बड़े ही तो होते हैं। रही उनके भविष्य की बात तो कोरोना कहर ने तो देश में न कितने बच्चों का भविष्य प्रभावित कर दिया है। क्या 12वीं के विद्यार्थियों के अंक10वीं के बच्चों की तरह नहीं दिये जा सकते हैं हैं ? केंद्र सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए कि जिस आधार पर 12वीं के विद्यार्थियों को अंक मिले, उसी आधार पर विश्वविद्यालयों में दाखिलों के साथ विदेश में जाने वाले विद्यार्थियों की भी व्यवस्था हो। मात्र अंकों के लिए बच्चों को एक बड़े खतरे में झोंक देना कहां की अकलमंदी है ? केंद्र सरकार इन सब बातों पर भी विचार कर ले कि यदि बच्चों और शिक्षकों में संक्रमण फैल गया तो परीक्षा देने वाले कितने विद्यार्थियों  और कितने शिक्षकों की मौत होगी ? अभिभावकों पर खतरा अलग से। यदि परीक्षा देने वाले बच्चों की मौत होती है तो ये सब  केंद्र सरकार द्वारा की जाने वाली हत्याएं कहलाएंगी।
गजब खेल है मोदी सरकार का। किसान नये कानूनों का विरोध कर रहे हैं तो उन पर जबर्दस्ती लादे जा रहे हैं। अब 12वीं के विद्यार्थी और उनके अभिभावक परीक्षा रद्द करने की मांग कर रहे हैं बच्चों के भविष्य को आधार बनाकरउन पर परीक्षा लादी जा रही है।  रही बात परीक्षा कराने वाले राज्यों की। तो भाजपा शासित प्रदेश तो मोदी सरकार का विरोध कर ही नहीं सकते। इन सब राज्य के मुख्यमंत्रियों को तो कोरोना महामारी में हुई मौतों पर भी कोई शर्मिंदगी नहीं है।  हालांकि दिल्ली, महाराष्ट्र और प. बंगाल ने पहले बच्चों को वैक्सीन लगाने की मांग की है। वैसे केंद्र सरकार बच्चों के भविष्य की चिंता करने का ड्रामा तो ऐसे कर रही है जैसे कि गत 7 साल में उसने विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने के लिए बहुत कुछ कर दिया हो। कितने बच्चों को रोजगार छीन गया, कितने चलने जाने और कितने रोजगार न मिलने से फांसी के फंदे पर लटक गये, कितने डिप्रेशन में हैं। 
प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 08:25 No comments:
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Sunday, 23 May 2021

जनता मूर्ख बन रही है और मोदी बना रहे हैं!

 


वैसे तो हर सरकार ने किसी न किसी रूप में जनता को ठगा ही है, पर मोदी सरकार ने ऐसा बेवकूफ बनाया कि कहीं न छोड़ा। उनको भी जिनके बलबूते पर सत्ता का मजा लूटते रहे। क्या रोजी-रोटी स्वयंभू हिन्दुओं की नहीं गई है ? क्या कोरोना कहर से ये लोग अछूते रह गये हैं ? क्या आज के हालात में इन लोगों के बच्चों का भी भविष्य और जान खतरे में नहीं है ? जमीनी हकीकत तो यह है कि हिन्दुत्व का राग अलापने वाली मोदी सरकार ने सबसे अधिक हिन्दुओं की भावनाओं से ही खिलवाड़ किया है।  ये जो नदियों में शव बह रहे हैं किन लोगों के हैं ? ये जो शवों के आसपास कपड़े दिखाई दे रहे है किस धर्म के लोगों के हैं ?

शुक्र है कि धर्म के नाम पर सत्ता हथियाने वाले लोगों को मुस्लिम समाज के खिलाफ कुछ नहीं मिल रहा है नहीं तो गत साल की तरह इस बार भी कोरोना कहर के लिए मुस्लिमों को ही जिम्मेदार ठहरा देते। विपदा या महामारी में बड़े स्तर पर जान और माल का नुकसान होता है पर क्या कोरोना महामारी में लोग मरे हैं ? क्या उन लोगों की हत्या नहीं हुई है। कौन लोग हैं इन हत्याओं के जिम्मेदार ? क्या आक्सीजन की कमी मरने वालों की स्वभाविक मौत हुई है ? क्या उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में जबर्दस्ती धकेले गये शिक्षकों की मौत हत्या नहीं है ? क्या इन शिक्षकों ने इलाहाबाद कोर्ट और योगी सरकार से कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए चुनाव को टालने की गुहार नहीं लगाई थी। हां संक्रमण रोकने का सरकारों के पास बस एक ही उपाय है, वह है लॉक डाउन।


यह देश की विडंबना ही है कि इतना झेलने के बावजूद देश का एक बड़ा तबका जमीनी हकीकत समझने को तैयार ही नहीं। उसे देश और समाज के साथ ही अपने बच्चों के भविष्य और जान से चिंता  भाजपा के सत्ता के स्वंभू हिन्दुत्व की है। इन लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि तीसरी लहर का डर बच्चों में इतना बैठ गया है कि वे डिस्प्रेशन में आ रहे हैं। ये लोग समझने को तैयार नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिलाधिकारियों की बैठक में जिन गांवों में कोरोना को हराने की बात कर रहे हैं, वहां की स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमराई हुई हैं। क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के आदेश को योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट पलटवा दिया। क्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कोरोना संक्रमण से मरे लोगों के बारे में ‘मुक्त हो जाने’ वाले बयान को व्यवहारिक कहा जा सकता है।


लोग कह रहे हैं कि मोदी सरकार क्या करे। राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी बनती है अरे भाई प्रधानमंत्री तो वाहवाही लूटने के लिए सब कुछ हथियाकर रखना चाहते हैं। इन्हीं महाशय ने सांसदों से गांवों को गोद लेने की अपील की थी। तो इन सांसदों द्वारा गोद लिये गये गांवों ही स्वास्थ्य सेवाएं देख लीजिए। चलो प्रधानमंत्री के साथ ही सांसदों दूसरे मंत्रियों की ही बात छोड़ दीजिए। खुद स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्धवर्धन ने जिस गांवों को गोद लिया था, उनका ही हाल देख लीजिए।


2014 में प्रधानमंत्री के आह्वान पर डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के धीरपुर और घोगा गांव को गोद लिया था। 2018 में उन्होंने सिंघोला गांव को भी गोद ले लिया। वह बात दूसरी है कि गांवों को गोद लेना मात्र औपचारिकता ही रह गया है। डॉ. हर्षवर्धन ने गोद लेने के बाद उधर पलटकर भी नहीं देखा। आज सिंघोला गांव की स्थिति यह है कि वहां 90 फीसद लोग संक्रमित हुए और घर पर ही ठीक हो गये। जो लोग अस्पताल में भर्ती हुए उन्होंने से अधिकतर दम तोड़ गये। जहां तक जांच की बात तो इस गांव में न कोई जांच हुई और न कोई हाल जानने के लिए आया। यह हाल स्वास्थ्य मंत्री द्वारा गोद लिये गये गांव का है। फिर लोग कहते सुने जा रहे हैं कि देश में मोदी का विकल्प नहीं है। मतलब 130 करोड़ के देश में एक बेहरुपिया के सामने लोगों को देश चलाने वाला ही नहीं दिखाई दे रहा है। मैं मानता हूं कि देश में विपक्ष नाकारा है। अधिकतर स्थापित नेता वंशवाद या परिवारवाद के बल पर बड़े नेता बने हुए हैं पर क्या देश को ऐसे ही बर्बाद होते देखते रहें। क्या लोगों को ऐसे ही मरते देखते रहें। क्या ऐसे ही बच्चों का भविष्य बर्बाद होते देखते रहें। क्या ऐसे ही आने वाली पीढ़ी की बर्बादी को देखकर भी अनदेखा कर दें।


हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है कि बेवकूफ बनाना वाला चाहिए बनने के लिए तो लोग तैयार बैठे हैं। देश के लोगों की इस कमजोरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बखूबी पहचाना है। वह भलीभांति जानते हैं कि देश के लोगों को सपने दिखाते जाओ और उन पर राज करते जाओ। प्रधानमंत्री को संक्रमण में आई कमी तो दिखाई दे रही है पर बढ़ती मौतों की संख्या नहीं दिखाई दे रही है। देश में कोरोना महामारी खत्म नहीं हुई कि ब्लैक फंगस महामारी आ गई पर प्रधानमंत्री को अब हालात सुधरते दिखाई दे रहे हैं। उनके द्वारा बनाये गये माहौल में उनके प्रवक्ता के रूप में स्थापित टीवी चैनल भी भरपूर साथ दे रहे है। मतलब लोगों को बरगलाकर जमीनी हकीकत से दूर ले जाओ। सुविधाओं कुछ मत दो बस बातों से ही उन्हें छका दो। जिनके घर में मौत हुई है, उन्हें मुक्ति का उपदेश देकर सकारात्मक सोचने के लिए कहो। मतलब किसी भी तरह से लोगों का बेवकूफ बनाते रहो।


वैसे भारतीय लोगों के बारे में उनकी यह धारणा एक तरह से ठीक भी है। नोटबंदी में कितने लोग परेशान हुए, सब भूल गये। जीएसटी की परेशानी को सब भूल गये। देश में प्रधानमंत्री कितने स्मार्ट सिटी बनवा रहे थे, कहां वे स्मार्ट सिटी ? सब भूल गये। कितने स्मार्ट विजेज बनवा जा रहे थे, सब भूल गये। भाजपा सांसदों ने कितने गांव गोद लिये और उनका कितना विकास किया, सब भूल गये।  2014 में इनता काला धन विदेश से लाने की बात कर रहे थे कि प्रत्येक आदमी के खाते में 15 लाख रुपये आ रहे थे, सब भूल गये। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दे रहे थे कि लोग सब भूल गये। नये किसान कानून लाकर किसानों ही नहीं बल्कि सभी लोगों के हाथ से रोटी छिनने की व्यवस्था प्रधानमंत्री ने कर दी है पर लोगों को जनता के लिए सर्दी, गर्मी और बारिश को झेलते हुए देश की राजधानी के चारों ओर लड़ाई लड़ रहे किसानों में भी आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही और नकली किसान नजर आ रहे हैं।


श्रम कानून में संशोधन कर नयी पीढ़ी को मानसिक रूप से बीमार बनाने की पटकथा प्रधानमंत्री लिख चुके हैं पर लोगों को अपने बच्चों का भविष्य और स्वास्थ्य देखने के बजाय मोदी में करिश्मा दिखाई दे रहा है। अब जब कोरोना की दूसरी लहर में डॉक्टर आक्सीजन की कमी से लाखों संक्रमित लोग दम तोड़ गये। लोग रेमडेसिविर इंजेक्शन और आक्सीजन के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहे। मोदी सरकार वैक्सीन लगाने की बात तो करती रही पर वैक्सीन बनाने की कंपनियों को पैसे देने के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। अब जब वैक्सीन की किल्लत हो गई तो दूसरी दोज की मियाद बढ़ा दी गई। एक-दो महीने में शायद वैक्सीन लगवाने की जरूरत ही महसूस न की जाए। यदि लोगों ने देश की वैक्सीन विदेश में भेजने के पोस्टर छपवा कर चस्पा दिये तो उनकी गिरफ्तारी कर ली गई। इन सबके बावजूद लोगों को लगता है कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर मोदी सरकार और भाजपा शासित सरकारों को कुछ करने की जरूरत ही क्या है ?

प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 04:31 No comments:
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Wednesday, 9 December 2020

किसान कानून : मोदी सरकार की नीयत में खोट बता रहा पानीपत में 100 एकड़ जमीन पर बन रहा अडानी का गोदाम!

 



देश का किसान चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि मोदी सरकार ये जो किसान कानून लाई है ये कॉरपोरेट घरानों के भले के और उनकी बर्बादी के हैं। पर मोदी सरकार और उनके समर्थक हैं कि वे इन कानून से किसानों को मालामाल करने की रट लगाई हुए हैं। वह बात दूसरी है कि मोदी सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले किसानों या उनके नेताओं से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा। यह अपने आप में एक सवाल है कि कानून लाये गये किसानों से संबंधित और प्रधानमंत्री ने बैठक की कॉरपोरेट घरानों के साथ। जो लोग जानबूछ कर  अनजान बन हुए हैं उनको तो कोई नहीं समझा सकता है पर अब अंधे आदमी की भी समझ में आने लगा है कि ये कानून कॉरपोरेट घरानों को किसानों की जमीन हथियाने देने का षड्यंत्र हैं। कानून में एमएसपी मेनशन न करना, उद्योगपतियों को फसलों के भंडारण की छूट देना और सीधे किसानों की फसल खरीदना का अधिकार ये सब कॉरपोरेट घरानों का हित देखते हुए किया गया है। यही वजह रही है कि मोदी सरकार ने इन कानून में किसानों का कोर्ट जाने का भी अधिकार छीन लिया है। कानून में किसान के किसी शिकायत को लेकर एसडीएम के पास जाने की ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या एसडीएम की औकात है कि अडानी और अंबानी जैसे शीर्षस्थ उद्योगपतियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर दे वह भी जब वह जानता हो कि ये दोनों उद्योगपति देश के प्रधानमंत्री के घनिष्ठ मित्र हैं। बताया जा रहा है कि अडानी ग्रुप ने विभिन्न राज्यों में खाद्यान्न गोदाम बनाने की पूरी व्यवस्था कर ली है। न्यूज ख्ब् पर भाकियू महासचिव युद्धवीर सिंह ने बाकायदा क्ब् राज्यों में अडानी के गोदाम बनने की बात कही है। यह अपने आप में दिलचस्प है कि एक ओर सरकार सरकारी गोदामों में एमएसपी के अनुसार 1 लाख 90 हजार करोड़ का अनाज पड़ा बता रही है तो दूसरी ओर अडानी ग्रुप विभिन्न राज्यों में गोदाम बना रहा है। मतलब यदि ये कानून वापस नहीं होते हैं तो देश में आम मंडियां समाप्त हो जाएंगी और अडानी की मंडियों का राज चलेगा।
जिन लोगों को अभी भी ये कानून किसान हित में लग रहे है। जिन्हें मोदी सरकार किसान हितैषी दिखाई दे रही हो वे हरियाणा के पानीपत जिले के नौल्था गांव में जाकर इन कानून को लेकर अडानी ग्रुप की तैयारी देख लें। मोदी सरकार अडानी पर कितनी मेहरबान रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पानीपत जिले के इसराना तहसील के गांव नौल्था में अडानी ग्रुप ने 100 एकड़  जमीन दो साल पहले यानी कि मोदी के पहले ही कार्यकाल में खरीद ली थी। आजकल इस जमीन पर  रेलवे ट्रैक, सडक़ व मंडी का कार्य चल रहा है।  बताया जा रहा है कि यह जमीन इस बहाने अधिग्रहीत की गई कि गांव में रेलवे के डिब्बे (कोच) बनाने का कारखाना बनेगा। दरअसल रेलवे के डिब्बे बनाने के नाम पर रोजगार का लालच देकर किसानों ने यह जमीन खरीदी गई थी।  गांव वालों को बताया गया कि यह जमीन सरकार खरीद रही है। लोगों को लगा कि यदि वे जमीन नहीं देंगे तो जमीन जबर्दस्ती जमीन ले लेगी। इस लिहाज से उन्होंने यह जमीन दी थी।
किसानों तब जाकर पता चला कि  उनकी ज़मीनें अडानी ग्रुप ले रहा है  जब तक 40-50 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली गई थी। जब किसानों ने अपनी ज़मीनें देने से इनकार किया तो इन बचे किसानों को मोटा लालच देकर यानी कि डेढ़ से ख् करोड़ का भाव देकर उनकी जमीन खरीद ली गई। मतलब ये पूंजीपति किसानों को मोटा लालच देकर उनकी जमीन हथियाने में माहिर होते हैं।
 इस जमीन पर अडानी ग्रुप फसलों के भंडारण के लिए अपना गोदाम बना रहा है। गोदाम कितना बड़ा होगा यह बात गोदाम तक बिछने वाली रेलवे लाइन ही बता रही है। मतलब इस गोदाम से खाद्यान्न दूसरे राज्यों ही नहीं बल्कि विदेश तक जाएगा। हो सकता है कि अडानी देश का खाद्यान्न मोटे मुनाफे पा विदेश में जाकर बेच दे। मतलब देश में खाद्यान्न संकट की पूरी तैयारी मोदी सरकार न इन कानूनों के माध्यम से कर दी है। वैसे भी उद्योगपतियों को तो बस अपना मुनाफा चाहिए।  देश और समाज से उनका कोई लेना देना नहीं होता है। पता चला है कि पहले भी पहले भी कारपोरेट घरानों के लिए  जमीन अधिग्रहीत की गई है। मतलब अब आढ़तियों की मंडी की जगह कारपोरेट घरानों की मंडी होंगी। बताया जा रहा है कि नौल्था गांव में मिट्टी खोदना या फैक्ट्री लगाने की आज्ञा नहीं है। उसके बावजूद ये सारा काम हुआ है। मतलब मामला अडानी ग्रुप का है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अडानी का एसडीएम तो क्या करेगा ? मुख्य सचिव भी कुछ नहीं कर सकता है। अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए नौल्था गांव को स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाया गया है। मतलब यहां हरियाणा या केंद्र का कानून नहीं चलेगा यहां पर अडानी का कानून चलेगा। कोई कोर्ट भी नहीं जा सकेगा। किसानों का कहना है कि यह  क्षेत्र में ऐसी चर्चा कि नौल्था गांव में अडानी निजी  मंडी लगाने जा रहा है।  यह जमीन जीटी रोड पानीपत रोहतक से इस गांव को जोड़ती है। इस ज़मीन पर अडानी इनीशिएटिव का बोर्ड भी लगा दिया गया है। अडानी ग्रुप के इस प्रोजेक्ट के लिए हजारों पेड़ ्काट दिय गये हैं। कारपोरेट घरानों के लिए मोदी सरकार क्या-क्या खेल खेलेगी। यह इस मामले में भी दिखाई दे रही है। दरअसल अडानी एग्री लॉजिस्टिक पानीपत की ओर से नौल्था और जोंधन कलान में अधिग्रहीत जमीन का लैंड-यूज बदल कर गोदाम (कृषि उत्पाद) स्थापित करने की परमिशन मांगने के तुरंत बाद इसे मान लिया गया।
दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव  में एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद हेलीकॉप्टर से लेकर चुनावी रैलियों तक का सारा खर्च अडानी के उठाने की चर्चा आम रही है। मीडिया को मेनेज करन के साथ ही लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए बनाए गये तंत्रों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालका को पंगू बनाने के लिए अडानी और अंबानी के पैसों का के इस्तेमाल करने की बात भी आम हो गई है।  वैसे भी मुकेश अंबानी के अधिकतर मीडिया हाउस में शेयर हैं। मोदी सरकार के प्रवक्ता की भूमिका निभा रहा जी न्यूज ग्रुप सांसद सुभाषा चंद्रा का है।
किसान कानूनों के साथ ही श्रम कानून में संशोधन भी इन शीर्षस्थ उद्योगपतियों क एहसान उतारने और उनके दबाव में लिया गया फैसला माना जा रहा है। 

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