Wednesday, 22 March 2017

देश को लोहिया की विचारधारा की जरूरत


     
     केंद्र व देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश समेत कई प्रदेश में संघियों की सरकार बनने पर समाजवाद के नाम पर राजनीति कर रहे नेताओं को अपने संघर्ष, कार्यशैली और विचारधारा पर मंथन की जरूरत है। यदि आज फिरकापरस्त ताकतों के चलते साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका महसूस की जा रही है, उसके लिए कहीं न कहीं समाजवादी भी दोषी हैं। गैर कांग्रेसवाद का नारा तो समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था पर जब देश में कांग्रेस कमजोर हुई तो संघी सत्ता पर कैसे काबिज हो गए। संघर्ष के लिए जाने जाने वाले समाजवादियों से संघियों ने गैर कांग्रेसवाद का नारा कैसे छीन लिया। जेपी आंदोलन के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी में शामिल होने वाले संघियों ने 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनाकर अपने को इतना कैसे मजबूत कर लिया कि समाजवादी कहीं पीछे रह गए। कैसे-कैसे समाजवादी कमजोर हुए। कैसे-कैसे समाजवादी विचारधारा से भटके। कैसे उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव जीतकर भी हार गए। कैसे नीतीश कुमार गैर संघवाद का नारा देकर शांत पड़ गए। आज इन सब पर मंथन की जरूरत है। क्यों जनता समाजवादियों से दूर होती जा रही है ? इन प्रश्नों पर समाजवादियों को सोचने की जरूरत है।
    दरअसल डॉ. राम मनोहर लोहिया की नीतियों पर चलने का दावा करने वाले समाजवादी उनकी विचारधारा से कहीं दूर चले गए। समाजवाद कुछ परिवारों तक सिमट कर रह गया। कार्यकर्ताओं की जगह वैतनिक युवाओं ने ली।  समाजवादी आगे बढ़ने के लिए संघर्ष को छोड़कर दूसरे अन्य रास्ते  अपनान लगे। सत्ता के मोह से कोसों दूर डॉ. लोहिया के चेले सत्ता के मोह में फंसते चले गए।  संघर्ष को अपनाकर अन्याय का विरोध करने वाले समाजवादियों में आराम तलबी देखी जाने लगी।
   यदि जनता पार्टी के गठन से लेकर उत्तर प्रदेश चुनाव तक की समीक्षा करें तो समाजवादियों ने समझौतावादी प्रवृत्ति के चलते अपने को कमजोर किया है। चाहे चरण सिंह का प्रधानमंत्री बनना रहो हो। या फिर चंद्रशेखर का, एचडी देवगौड़ा का या फिर इंद्र कुमार गुजराल का सबने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। खुद नेताजी ने एक बार कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बचाई। आज समाजवादियों को डॉ. लोहिया की विचारधारा से ओतप्रोत होकर संघर्ष की जरूरत है। डॉ. लोहिया की नीतियों को अपनाकर ही संघियों को परास्त करा जा सकता है। लोहिया जी के संघर्षांे का आत्मसात कर अपने को मजबूत किया जा सकता है। इन सबके लिए लोहिया जी संघर्ष पर अध्ययन की जरूरत है। अपने अंदर स्वाभिमान और खुद्दारी पैदा करने की जरूरत है। 
    डा. लोहिया कितने खुद्दार थे,  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके पिता का निधन हुआ तो वह भारत छोड़ो आन्दोलन के चलते आगरा जेल में बंद थे। इस विकट परिस्तिथि में भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार की कृपा पर पैरोल पर छुटने से इनकार कर दिया था। लोहिया का  समाजवाद व संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था।  जब लोहिया ढाई वर्ष के थे तो उनकी माता चंदादेवी का देहांत हो गया और उनकी दादी व नैन ने उनका पालन-पोषण किया ।  गांधी जी के विराट व्यक्त्तिव का असर लोहिया पर बचपन से ही हो गया था। दरअसल उनके  पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे और जब उनसे मिलने जाते तो लोहिया को अपने साथ ले जाते।  वैसे तो राजनीति का पाठ लोहिया जी ने गांधी जी से बचपन से ही सिखाना शुरू कर दिया था पर सक्रिय रूप से वह 1918 में अपने पिता के साथ पहली बार अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए।  पहली हड़ताल उन्होंने लोकमान्य गंगाधर तिलक के निधन के दिन अपने विद्यालय के लड़कों के साथ 1920  में की। 1921 में फैजाबाद किसान आन्दोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरु से उनकी पहली बार मुलाक़ात हुई। युवाओं में लोहिया की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्त थी कि कलकत्ता में अखिल बंग विधार्थी परिषद के सम्मलेन में सुभाष चन्द्र बोस के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता की।
      लोहिया से उनका समाज इतना प्रभावित था कि 1930 को अपने कोष से उन्हें पढ़ने के लिया विदेश भेजा। लोहिया पढ़ाई करने के  लिए बर्लिन गए। वह लोहिया ही थे कि जिन्होंने बर्लिन में हो रही लीक आफ नेशंस की बैठक में भगत सिंह को फांसी दिए जाने विरोध में सिटी बजाकर दर्शक दीर्घा से इसका विरोध प्रकट किया। लोहिया ने किन परिस्तिथियों ने देश और समाज के लिया संघर्ष किया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब 1933 में वह समुद्री जहाज से मद्रास के लिए चले तो रास्ते में ही उनका सामान जब्त कर लिया गया। मद्रास पहुंचने के बाद लोहिया हिन्दू अखबार के दफ्तर पहुंचे और दो लेख लिखकर 25 रूपये कमाए और इनसे कलकत्ता पहुंचे।  कलकत्ता से बनारस पहुंचकर उन्होंने मालवीय जी से मुलाकात की।  मालवीय जी ने उन्ही रामेश्वर दास बिडला से मिलाया, जिन्होंने लोहिया को नोकरी का प्रस्ताव दिया पर दो हफ्ते रहने के बाद उन्होंने बिडला जी का निजी सचिव बनने इनकार कर दिया।

     17 मई 1934 को पटना में आचार्य  नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हाल में इकट्ठे हुए जहां पर समाजवादी पार्टी की स्थापना का निर्णय लिया गया। लोहिया जी ने समाजवादी आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की और पार्टी दे उद्देश्यों में पूर्ण स्वराज्य लक्ष्य को जोड़ने का संशोधन पेश किया पर उसे अस्वीकार कर दिया गया। बाद में 21 अक्टूबर 1934 को बम्बई के रेडिमनी टेरेस में 150 समाजवादियों  ने इकट्ठा होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए और पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए। 1935 में जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया।  दक्षिण कलकत्ता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण देने पर 24 मई 1939 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।  कलकत्ता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट के सामने लोहिया ने खुद अपने मुकदमे की पैरवी और बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया।

    दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में विवादित भाषण का आरोप लगाकर 11 मई 1940 को  उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की 38 के तहत उन्हें दो साल की सजा हुई।  लोहिया देश के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए थे कि उस समय गांधी जी ने कहा था कि जब तक राम मनोहर लोहिया जेल में हैं तब तक खामोश नहीं रहा जा  सकता।  उनसे ज्यादा बहादुर और सरल आदमी मुझे मालुम नहीं। चार दिसंबर 1941 को लोहिया को रिहा कर दिया गया। 

    आन्दोलन के जोर पकड़ने के साथ ही लोहिया व नेहरु में मतभेद पैदा हो गए थे। 1942 में इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में यह बात जगजाहिर हो गई। इस अधिवेशन में लोहिया ने पंडित जवाहर लाल नेहरु का खुलकर विरोध किया।  इसके बाद अल्मोड़ा में जिला सम्मेलन में लोहिया ने नेहरु को झट से पलटने वाला नट कहा।

    भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ने पर 9 अगस्त 1944 को गांधी जी व अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के बाद लोहिया ने भूमिगत रहते हुए आन्दोलन की अगुआई की।  20 मई 1944 को लोहिया को बम्बई से गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर जेल की उस कोठरी में रखा गया, जहां 14 वर्ष पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी।  1945 में लोहिया  को आगरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।  लोहिया से अंग्रेज सरकार इतने घबराई हुई थी की द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को तो छोड़ दिया गया, पर लोहिया को नहीं छोड़ा गया।  बाद में 11 अप्रैल , 1946 को लोहिया को भी रिहा कर दिया गया।

       15  जून को लोहिया ने गोवा के पंजिम में गोवा मुक्ति आन्दोलन की पहली सभा की।  लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आन्दोलन के शुरुआत में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 को जब देश में सांप्रदायिक  दंगे भड़के तो नवाखली, कलकत्ता, बिहार दिल्ली समेत की जगहों पर लोहिया गांधी जी के साथ मिलकर साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशीश करते रहे।  9  अगस्त, 1947 से ही हिंसा रोकने का प्रयास युद्धस्तर से शुरू हो गया। 14  अगस्त की रात  को हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई के नारे के साथ लोहिया ने सभा की। स्वतंत्रता मिलने के बाद 31 अगस्त को वातावरण फिर से भड़क गया ।  गांधी जी अनशन पर बैठ गए। उस समय लोहिया ने दंगाइयों के हथियार इकट्ठे कराए और उनके प्रयास से शांति समिति की स्थापना हुई चार सितम्बर  को गांधी जी ने अनशन  तोड़ दिया। देश में लोकतंत्र स्थापित करने में लोहिया का विशेष  योगदान रहा है। आजादी मिलने के बाद लोहिया की प्रेरणा से 650 रियासतों की समाप्ति का आन्दोलन समाजवादी चला थे ।  दो जनवरी 1948  को रीवा में हमें चुनाव चाहिए।  विभाजन रद्द करो के नारे के साथ आन्दोलन किया गया।

      1962 के आम चुनाव में लोहिया, नेहरु के विरुद्ध फूलपुर में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर  1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने तिब्बत  के सवाल को उठाया। 1963  को फरुखाबाद के  चुवाव में लोहिया 58 हजार मतों चुनाव जीते। उस समय लोकसभा में लोहिया की तीन आना बनाम पन्द्रह आना बहस बहुत चर्चित रही।  उन्होंने  कहा था कि 18 करोड़ आबादी  चार आने पर जिन्दगी काटने को मजबूर है तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च होते हैं।  9 अगस्त 1965  को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।

     30  सितम्बर 1967 लोहिया को नई  दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल जो आजकल डा. राम मनोहर लोहिया के नाम से जाने जाता है में पौरुष ग्रंथि के आप्रेशन के लिए भर्ती कराया गया।  इलाज के दौरान 12 अक्टूबर 1967 को  यह समाजवादी पुरोधा हमें छोड़कर चला गया।

Wednesday, 15 February 2017

मुख्यमंत्री जी को समर्पित की विचारवान युवाओं की टीम




    साथियों लगभग 10 साल बाद मैं फिर से समाजवादी पार्टी में सक्रिय हो गया हूं। मैंने 10 फरवरी को लखनऊ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली है। प्रांजल तिवारी 'समाजवादीÓ टीम के रूप में हजारों नेता समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। इस टीम में हमारी टीम प्रमुख रूप से थी। 100 नेताओं ने सक्रिय सदस्यता ग्रहण की। युवाओं, पत्रकारों, लेखकों, वकीलों, किसानों, मजदूरों से सुसज्जित यह टीम समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव को समर्पित की गई।
   समाजवादियों के लिए यह गर्व की बात है कि यह टीम वैचारिक और सांगठनिक रूप से बहुत मजबूत टीम है। इस टीम में अकेले उत्तर प्रदेश से 60 हजार लोग जुड़ चुके हैं। हम लोग इसे राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने जा रहे हैं। हम लोग माननीय मुख्यमंत्री जी और प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम जी का आभार व्यक्त करते हैं कि न केवल उन्होंने हमारी टीम को अपने समाजवादी परिवार में शामिल किया बल्कि हमें कार्यक्रम करने के लिए समाजवादी पार्टी कार्यालय का प्रेस हाल भी दिया।
साथियों पार्टी कार्यालय में युवाओं को साथ लेकर समाजवाद पर वार्तालाप करना एक ऐतिहासिक क्षण था। कार्यक्रम का संचालन मेरे हाथ में था तो मैंने अपने स्वभाव के अनुकूल युवाओं के विचार लेने शुरू किए। यह बताते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है कि इस टीम में उत्साह, जज्बे और मेहनत के मामले में एक से बढ़कर एक युवा है। हमारा प्रयास है कि इन युवाओं को ऐसा तराशा जाए कि समाजवाद के क्षेत्र में यह टीम एक मिसाल बनकर उभरे। 
   यह मुख्यमंत्री जी का बड़ा दिल ही है कि चुनाव के इतने व्यस्त कार्यक्रम में उन्होंने हमारे कार्यक्रम को न केवल फेस बुक पर लाइव देखा बल्कि हमारी टीम को बुलाकर बधाई भी दी। मुख्यमंत्री जी के आशीर्वाद ने हमारी टीम को आत्मविश्वास से लबरेज कर दिया है। यह टीम विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पूरी तरह से लगी है। इस टीम में विभिन्न समाज के संगठन हैं। कई सामाजिक संगठन भी हैं। बहुत जल्द हम लोग समाजवादी इस टीम को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर मुख्यमंत्री जी को गिफ्ट के रूप में देंगे। फिलहाल भाई प्रांजल तिवारी, मैं खुद (चरण सिंह राजपूत), आजाद शेखर, मनोजपाल और सचिन गुप्ता इसका नेतृत्व कर रहे हैं। इस टीम में अधिकतर वे युवा हैं, जो देश व समाज के लिए काम तो करना चाहते हैं पर अवसरवाद की राजनीति इन्हें आगे नहीं बढ़ने दे रही है। हम लोग समाज से कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को आगे ला रहे हैं तथा राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।
साथियों जो मुझे समझता है, जिसने मुझे सुना है, पढ़ा है। वह जानता है कि मेरे स्वभाव, रहन-सहन लेखन और खान-पीन में समाजवाद कूट-कूट कर भरा है। इसी सोच की वजह से मैं 1999 में नोएडा में समाजवादी पार्टी से जुड़ा। नोएडा का प्रवक्ता रहा। प्रताप सेना का प्रदेश अध्यक्ष भी रहा। तब नोएडा से लेकर अपने गृह जनपद बिजनौर तक मैंने बड़े स्तर पर युवा समाजवादी पार्टी से जोड़े थे पर एक षड्यंत्र के तहत कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं कि मुझे संगठन से दूर रहना पड़ा। हां समाजवाद के लिए मैं बखूबी काम करता रहा।
   अब फिर से समाजवादी पार्टी से जुड़कर अपनी दूसरी पारी खेल रहा हूं। दूसरी पारी खेलने का मेरा एकमात्र मकसद है कि वैचारिूक और सांगठनिक रूप से मजबूत विचारवान, चरित्रवान और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित युवाओं की एक समाजवादी टीम देश में खड़ी हो जो पूरी तरह से समर्पित होकर माननीय अखिलेश यादव जी के लिए काम करे। जिस तरह से देश में अखिलेश यादव जी के रूप में विचारवान, चरित्रवान, समाजवादी विचारधारा को पूरी तरह से समर्पित युवा नेता देश के राजनीतिक पटल पर उभरकर आया है। उससे अब समाजवाद के आगे बढ़कर की उम्मीद जगी है। अखिलेश जी में ही वह माद्दा है जो उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में समाजवाद की स्थापना कर सकते हैं।

Thursday, 19 January 2017

अखिलेश ने रखी नव समाजवाद की नीव!

   
देश में जो भी आंदोलन हुआ है, उसमें समाजवादियों का बहुत योगदान रहा है। चाहे स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अराजकता के खिलाफ हुआ बुलंद हुई आवाज हो। अस्सी के दशक में बोफोर्स मामले में हुआ आंदोलन हो या फिर अन्ना आंदोलन। इन सबमें समाजवादियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। समाजवादियों ने अन्याय के खिलाफ आवाज तो उठाई पर संगठित न हो सके। चाहे जनता पार्टी की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो या फिर 1996 में बनी देवगौड़ा सरकार।
   समाजवादियों ने सत्ता तो हासिल कर ली पर आपसी फूट के चलते कार्यकाल पूरा न कर सके। हां इन्हीं पार्टियों से निकली समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश तो राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू ने लंबे समय तक बिहार में राज किया। इसमें दो राय नहीं कि संघर्ष के मामले में समाजवादियों ने अलग छाप छोड़ी है पर केंद्र में चल रही संघियों की सरकार यह साबित करती है कि समाजवादियों में कहीं न कहीं कमियां रही हैं। गैर कांग्रेसवाद का नारा समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था तो कांग्रेस के पिछड़ने पर देश की सत्ता पर समाजवादियों का कब्जा होना चाहिए था। समाजवादियों की कमियों का फायदा उठाते हुए ही नरेंद्र मोदी ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और देश की सत्ता हथियाई।
   जब पुराने समाजवादियों पर चारों ओर से तरह-तरह के आरोप लग रहे हों। उत्तर प्रदेश में घांटी समाजवादी रहे मुलायम सिंह यादव  (नेताजी) के पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नव समाजवाद के प्रणेता के रूप में उभरे हैं। समाजवादी पार्टी और नेताजी के परिवार में जो घमासान हुआ। वह जगजाहिर है। इस घमासान में अखिलेश यादव ने बड़े संयम के साथ जो विचारधारा और नैतिकता की लड़ाई जीती है, उससे वह सोने से तपकर कुंदन बनकर उभरे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया की नीतियों का अनुसरण करते हुए उन्होंने विचारधारा और उत्तर प्रदेश के विकास के सामने किसी की एक न सुनी। यहां तक कि अपने पिता की भी। तमाम विवाद के बाद आखिरकार पार्टी और चुनाव चिह्न हासिल करने में वह कामयाब रहे। आज की तारीख में निर्णायक वोटबैंक माना जाने वाला युवा वर्ग नरेंद्र मोदी से ज्यादा अखिलेश यादव की ओर आकर्षित हुआ है।
   अखिलेश यादव के पांच साल के कार्यकाल की समीक्षा करें तो इतने कम अनुभव के बावजूद वह अन्य मुख्यमंत्रियों से 20 साबित हुए हैं। भेदभाव, दुर्भावना की राजनीति से बचते हुए उन्होंने विकास की राजनीति पर ज्यादा जोर दिया। फैसले लेने के मामले में उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया यादें ताजा की हैं।  अखिलेश सरकार पर भले कोई आरोप लगे हों पर व्यक्तिगत रूप से विरोधी भी उनको कटघरे में खड़ा न कर सके। सरकार पर भी आरोप लगते तो परिवार और नेताजी के साथियों के दबाव में हुए फैसलों के चलते लगे। जहां समाजवादियों पर परिवारवाद का आरोप लगता रहा है वहीं अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नरेश उत्तम को बनाकर अपने को विशुद्ध समाजवादी दिखाने का प्रयास किया। अखिलेश यादव के पांच साल के कार्यकाल पर ध्यान दें तो उन्होंने परिवार के किसी भी सदस्य को ज्यादा नहीं सटाया है। उनके कार्यक्रमों में परिवार से ज्यादा संगठन और सरकार के लोग देखे गए।
  कहना गलत न होगा कि उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव ने नव समाजवाद की नीव रखी है। जहां पुराने समाजवादी युवाओं को उभरने नहीं दे रहे थे वहीं अखिलेश यादव ने युवाओं की समाजवादी फौज तैयार कर ली है। हां पुराने समाजवादियों का आर्शीवाद वह जरूर ले रहे हैं। उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि अखिलेश यादव की अगुआई में समाजवादियों की यही फौज उत्तर प्रदेश ही नहीं देश पर भी राज करेगी। आज भले ही लोग नरेंद्र मोदी देश के बड़े नेता बने हों पर अखिलेश यादव की लोकप्रियता का जो ग्राफ दिनोंदिन बढ़ जा रहा है। उससे वह नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। संघियों की समाज को तोड़ने की राजनीति के चलते देश में समाजवादियों के लिए राजनीति करने का पूरा स्पेस है। बस समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाना है। इस स्पेश को अखिलेश यादव भरते हुए देखे जा रहे हैं और उत्तर प्रदेश के रास्ते देश की राजनीतिक पटल पर छाने की ओर जा रहे हैं। 

Friday, 30 December 2016

इस जिद पर इतिहास कभी माफ नहीं करेगा नेताजी!

   
   सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को जब अपने पुत्र अखिलेश यादव की साफ-सुथरी छवि और उत्तर प्रदेश में हुए ऐतिहासिक विकास कार्यांे पर गर्व होना चाहिए था। प्रदेश को अच्छा शासन देनेपर जब उन्हें अखिलेश यादव की पीठ थपथपानी चाहिए थी। जब उन्हें सीना चौड़ा कर देश की राजनीति में संदेश देन चाहिए था कि सीखो उनके बेटे से राजनीति, जिसने उनसे भी आगे बढ़कर जनहित के कार्य किए।  ऐसे समय में वह खुद देश के उभरते हुए समाजवादी सितारे को धूमिल करने में लग गए। जब देश में समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया व लोकनायक जयप्रकाश नारायण के तैयार किए गए समाजवादी अपने रास्ते से भटकने लगे तो आगे बढ़कर ऐसे नौजवान ने समाजवाद का झंडा संभाला जिसने अपने पिता को बस संघर्ष करते ही देखा। अखिलेश यादव गत दिनों जनहित और समाजवादी विचारधारा के पक्ष में जो निर्णय लिए उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया की याद दिला दी। उन्होंने दबाव में गलत काम के लिए बोलने पर नेताजी को जो आइना दिखाने का प्रयास किया उसने प्रदेश ही नहीं बल्कि देश का दिल जीत लिया। दीपक सिंघल को मुख्य सचिव और गायत्री प्रजापति पहले हटाने और फिर मंत्री बनाने पर अखिलेश यादव की जो किरकिरी हुई उसके लिए खुद मुलायम सिंह यादव जिम्मेदार थे। नेताजी आपके राज में नीरा यादव और अखंड प्रताप सिंह ने मुख्य सचिव रहते सरकार की जो छवि धूमिल की थी क्या वह सही थी ?
    अखिलेश यादव की पांच साल की सरकार में उन पर व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप न लग सका। निश्चित रूप से उनका पहला ही कार्यालय प्रदेश के अन्य मुख्यमंत्री रहे नेताओं पर भारी पड़ रहा है। समाजवादी विचारधारा के लिए दागी लोगों को पार्टी में न घुसने देने के उनके निर्णय ने उनके समकालीन नेताओं से कहीं आगे कर दिया। जहां उन्होंने बाहुबलि डी.पी. यादव को पार्टी में न घुसने दिया, वहीं मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद का भी विरोध किया। इन लोगों ने अखिलेश यादव का विरोध ताक पर रखकर मुलायम सिंह में विश्वास जताया था। ऐसे में नेताजी ने अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी को गले लगाकर अखिलेश यादव को नीचा नहीं दिखाया बल्कि अपना खुद का कद घटाया है।
निश्चित रूप से संघर्ष के समय में अमर सिंह और शिवपाल सिंह यादव ने पार्टी और नेताजी आपका साथ दिया। उसके हिसाब से उन्हें सम्मान भी मिल रहा है। अमर सिंह राष्ट्रीय महासचिव राज्यसभा सदस्य और संसदीय बोर्ड में हैं तो शिवपाल सिंह यादव प्रदेश के अध्यक्ष।  इसमें दो राय नहीं कि समाजवादी पार्टी को यहां तक नेताजी अपने दम पर खींच लेकर आए हैं पर क्या 2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के चेहरे पर वोट नहीं मिला ? क्या अखिलेश यादव ने परिवार और बड़े नेताओं के दबाव से निकलकर प्रदेश में विकास के ऐतिहासिक कार्य नहीं किए ? क्या यदि दोबारा सपा की सरकार बनती है तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री नहीं बनने चाहिए ? क्या अखिलेश यादव से योग्य चेहरा समाजवादी पार्टी में है ? यदि है तो कौन है ? यदि नहीं तो अखिलेश यादव के पसंद के प्रत्याशी क्यों नहीं बनने चाहिए ?
     जब चुनाव में 25 फीसद युवा निर्णायक भूमिका निभा रहा हो। यह युवा वह है जिस पर किसी जाति धर्म का असर नहीं पड़ता है और  आज की तारीख में युवा वर्ग अखिलेश यादव में उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश का भविष्य देख रहा है तो नेताजी आप इस युवा वर्ग को क्यों नाराज करने में लगे हैं? अखिलेश यादव की इच्छा के विरुद्ध बाहुबलि अतीक अहमद और खनन माफिया गायत्री प्रजापति को टिकट देकर आप क्या साबित करना चाहते हैं ?
    नेताजी तो यह माना जाए कि जितने भी बुजुर्ग नेता हैं बस दिखावे के ही लिए युवाओं का आगे बढ़ाने की बात करते हैं। जितने भी टिकट आपने काटे हैं ये सब युवा नेता हैं। उत्तर प्रदेश के योग्य मुख्यमंत्री को नीचा दिखाकर आप लोगों में क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या अब भी आप अखिलेश यादव से लंबी राजनीतिक पारी खेलने की स्थिति में है ? क्या आप देश के उभरते हुए समाजवादी चेहरे को ढकने का प्रयास नहीं कर रहे हंै ? आपने हमेशा ही जनहित और देशहित की बात कही है। समाजवादियों के संघर्ष का अध्ययन कर काम करने की बात कही है। जब आपका खुद का बेटा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में समाजवाद का झंडा बुलंद करने चला है तो आप ही उसके इस बुलंद इरादे में रोड़ा बनने लगे। नेताजी अब अखिलेश यादव को कोई रोकना वाला नहीं है। आप क्यों नायक से खलनायक बन रहे हंै। आज की तारीख में अखिलेश यादव का चेहरा ऐसा बन चुका है कि वह पूरी समाजवादी पार्टी पर भारी पड़ रहे हैं।
    सोचिए वह भी आपके ही बेटे हैं कहीं यदि उन्होंने अलग पार्टी बनाकर अपने प्रत्याशी चुनावी समर में उतार दिए तो आपके साथ खड़े नेताओं की राजनीति का क्या होगा ? नेताजी समझ लीजिए यदि आप लोग अपने पथ से न भटके होते तो आज देश में जहां संघी खड़े हैं वहां समाजवादी होते। संघियों को परास्त करने का जज्बा अखिलेश यादव में है उन्हें देश में समाजवादियों का परचम लहराने दीजिए। सपा में बने इस माहौल में अखिलेश यादव को भी संदेशनात्मक और कड़े निर्णय लेने होंगे।