Wednesday, 15 February 2017

मुख्यमंत्री जी को समर्पित की विचारवान युवाओं की टीम




    साथियों लगभग 10 साल बाद मैं फिर से समाजवादी पार्टी में सक्रिय हो गया हूं। मैंने 10 फरवरी को लखनऊ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली है। प्रांजल तिवारी 'समाजवादीÓ टीम के रूप में हजारों नेता समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। इस टीम में हमारी टीम प्रमुख रूप से थी। 100 नेताओं ने सक्रिय सदस्यता ग्रहण की। युवाओं, पत्रकारों, लेखकों, वकीलों, किसानों, मजदूरों से सुसज्जित यह टीम समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री माननीय अखिलेश यादव को समर्पित की गई।
   समाजवादियों के लिए यह गर्व की बात है कि यह टीम वैचारिक और सांगठनिक रूप से बहुत मजबूत टीम है। इस टीम में अकेले उत्तर प्रदेश से 60 हजार लोग जुड़ चुके हैं। हम लोग इसे राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने जा रहे हैं। हम लोग माननीय मुख्यमंत्री जी और प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम जी का आभार व्यक्त करते हैं कि न केवल उन्होंने हमारी टीम को अपने समाजवादी परिवार में शामिल किया बल्कि हमें कार्यक्रम करने के लिए समाजवादी पार्टी कार्यालय का प्रेस हाल भी दिया।
साथियों पार्टी कार्यालय में युवाओं को साथ लेकर समाजवाद पर वार्तालाप करना एक ऐतिहासिक क्षण था। कार्यक्रम का संचालन मेरे हाथ में था तो मैंने अपने स्वभाव के अनुकूल युवाओं के विचार लेने शुरू किए। यह बताते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है कि इस टीम में उत्साह, जज्बे और मेहनत के मामले में एक से बढ़कर एक युवा है। हमारा प्रयास है कि इन युवाओं को ऐसा तराशा जाए कि समाजवाद के क्षेत्र में यह टीम एक मिसाल बनकर उभरे। 
   यह मुख्यमंत्री जी का बड़ा दिल ही है कि चुनाव के इतने व्यस्त कार्यक्रम में उन्होंने हमारे कार्यक्रम को न केवल फेस बुक पर लाइव देखा बल्कि हमारी टीम को बुलाकर बधाई भी दी। मुख्यमंत्री जी के आशीर्वाद ने हमारी टीम को आत्मविश्वास से लबरेज कर दिया है। यह टीम विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पूरी तरह से लगी है। इस टीम में विभिन्न समाज के संगठन हैं। कई सामाजिक संगठन भी हैं। बहुत जल्द हम लोग समाजवादी इस टीम को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर मुख्यमंत्री जी को गिफ्ट के रूप में देंगे। फिलहाल भाई प्रांजल तिवारी, मैं खुद (चरण सिंह राजपूत), आजाद शेखर, मनोजपाल और सचिन गुप्ता इसका नेतृत्व कर रहे हैं। इस टीम में अधिकतर वे युवा हैं, जो देश व समाज के लिए काम तो करना चाहते हैं पर अवसरवाद की राजनीति इन्हें आगे नहीं बढ़ने दे रही है। हम लोग समाज से कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाले युवाओं को आगे ला रहे हैं तथा राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।
साथियों जो मुझे समझता है, जिसने मुझे सुना है, पढ़ा है। वह जानता है कि मेरे स्वभाव, रहन-सहन लेखन और खान-पीन में समाजवाद कूट-कूट कर भरा है। इसी सोच की वजह से मैं 1999 में नोएडा में समाजवादी पार्टी से जुड़ा। नोएडा का प्रवक्ता रहा। प्रताप सेना का प्रदेश अध्यक्ष भी रहा। तब नोएडा से लेकर अपने गृह जनपद बिजनौर तक मैंने बड़े स्तर पर युवा समाजवादी पार्टी से जोड़े थे पर एक षड्यंत्र के तहत कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं कि मुझे संगठन से दूर रहना पड़ा। हां समाजवाद के लिए मैं बखूबी काम करता रहा।
   अब फिर से समाजवादी पार्टी से जुड़कर अपनी दूसरी पारी खेल रहा हूं। दूसरी पारी खेलने का मेरा एकमात्र मकसद है कि वैचारिूक और सांगठनिक रूप से मजबूत विचारवान, चरित्रवान और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पित युवाओं की एक समाजवादी टीम देश में खड़ी हो जो पूरी तरह से समर्पित होकर माननीय अखिलेश यादव जी के लिए काम करे। जिस तरह से देश में अखिलेश यादव जी के रूप में विचारवान, चरित्रवान, समाजवादी विचारधारा को पूरी तरह से समर्पित युवा नेता देश के राजनीतिक पटल पर उभरकर आया है। उससे अब समाजवाद के आगे बढ़कर की उम्मीद जगी है। अखिलेश जी में ही वह माद्दा है जो उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में समाजवाद की स्थापना कर सकते हैं।

Thursday, 19 January 2017

अखिलेश ने रखी नव समाजवाद की नीव!

   
देश में जो भी आंदोलन हुआ है, उसमें समाजवादियों का बहुत योगदान रहा है। चाहे स्वतंत्रता संग्राम हो, सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अराजकता के खिलाफ हुआ बुलंद हुई आवाज हो। अस्सी के दशक में बोफोर्स मामले में हुआ आंदोलन हो या फिर अन्ना आंदोलन। इन सबमें समाजवादियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। समाजवादियों ने अन्याय के खिलाफ आवाज तो उठाई पर संगठित न हो सके। चाहे जनता पार्टी की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो या फिर 1996 में बनी देवगौड़ा सरकार।
   समाजवादियों ने सत्ता तो हासिल कर ली पर आपसी फूट के चलते कार्यकाल पूरा न कर सके। हां इन्हीं पार्टियों से निकली समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश तो राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू ने लंबे समय तक बिहार में राज किया। इसमें दो राय नहीं कि संघर्ष के मामले में समाजवादियों ने अलग छाप छोड़ी है पर केंद्र में चल रही संघियों की सरकार यह साबित करती है कि समाजवादियों में कहीं न कहीं कमियां रही हैं। गैर कांग्रेसवाद का नारा समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था तो कांग्रेस के पिछड़ने पर देश की सत्ता पर समाजवादियों का कब्जा होना चाहिए था। समाजवादियों की कमियों का फायदा उठाते हुए ही नरेंद्र मोदी ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और देश की सत्ता हथियाई।
   जब पुराने समाजवादियों पर चारों ओर से तरह-तरह के आरोप लग रहे हों। उत्तर प्रदेश में घांटी समाजवादी रहे मुलायम सिंह यादव  (नेताजी) के पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नव समाजवाद के प्रणेता के रूप में उभरे हैं। समाजवादी पार्टी और नेताजी के परिवार में जो घमासान हुआ। वह जगजाहिर है। इस घमासान में अखिलेश यादव ने बड़े संयम के साथ जो विचारधारा और नैतिकता की लड़ाई जीती है, उससे वह सोने से तपकर कुंदन बनकर उभरे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया की नीतियों का अनुसरण करते हुए उन्होंने विचारधारा और उत्तर प्रदेश के विकास के सामने किसी की एक न सुनी। यहां तक कि अपने पिता की भी। तमाम विवाद के बाद आखिरकार पार्टी और चुनाव चिह्न हासिल करने में वह कामयाब रहे। आज की तारीख में निर्णायक वोटबैंक माना जाने वाला युवा वर्ग नरेंद्र मोदी से ज्यादा अखिलेश यादव की ओर आकर्षित हुआ है।
   अखिलेश यादव के पांच साल के कार्यकाल की समीक्षा करें तो इतने कम अनुभव के बावजूद वह अन्य मुख्यमंत्रियों से 20 साबित हुए हैं। भेदभाव, दुर्भावना की राजनीति से बचते हुए उन्होंने विकास की राजनीति पर ज्यादा जोर दिया। फैसले लेने के मामले में उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया यादें ताजा की हैं।  अखिलेश सरकार पर भले कोई आरोप लगे हों पर व्यक्तिगत रूप से विरोधी भी उनको कटघरे में खड़ा न कर सके। सरकार पर भी आरोप लगते तो परिवार और नेताजी के साथियों के दबाव में हुए फैसलों के चलते लगे। जहां समाजवादियों पर परिवारवाद का आरोप लगता रहा है वहीं अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष नरेश उत्तम को बनाकर अपने को विशुद्ध समाजवादी दिखाने का प्रयास किया। अखिलेश यादव के पांच साल के कार्यकाल पर ध्यान दें तो उन्होंने परिवार के किसी भी सदस्य को ज्यादा नहीं सटाया है। उनके कार्यक्रमों में परिवार से ज्यादा संगठन और सरकार के लोग देखे गए।
  कहना गलत न होगा कि उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव ने नव समाजवाद की नीव रखी है। जहां पुराने समाजवादी युवाओं को उभरने नहीं दे रहे थे वहीं अखिलेश यादव ने युवाओं की समाजवादी फौज तैयार कर ली है। हां पुराने समाजवादियों का आर्शीवाद वह जरूर ले रहे हैं। उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि अखिलेश यादव की अगुआई में समाजवादियों की यही फौज उत्तर प्रदेश ही नहीं देश पर भी राज करेगी। आज भले ही लोग नरेंद्र मोदी देश के बड़े नेता बने हों पर अखिलेश यादव की लोकप्रियता का जो ग्राफ दिनोंदिन बढ़ जा रहा है। उससे वह नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं। संघियों की समाज को तोड़ने की राजनीति के चलते देश में समाजवादियों के लिए राजनीति करने का पूरा स्पेस है। बस समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाना है। इस स्पेश को अखिलेश यादव भरते हुए देखे जा रहे हैं और उत्तर प्रदेश के रास्ते देश की राजनीतिक पटल पर छाने की ओर जा रहे हैं। 

Friday, 30 December 2016

इस जिद पर इतिहास कभी माफ नहीं करेगा नेताजी!

   
   सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को जब अपने पुत्र अखिलेश यादव की साफ-सुथरी छवि और उत्तर प्रदेश में हुए ऐतिहासिक विकास कार्यांे पर गर्व होना चाहिए था। प्रदेश को अच्छा शासन देनेपर जब उन्हें अखिलेश यादव की पीठ थपथपानी चाहिए थी। जब उन्हें सीना चौड़ा कर देश की राजनीति में संदेश देन चाहिए था कि सीखो उनके बेटे से राजनीति, जिसने उनसे भी आगे बढ़कर जनहित के कार्य किए।  ऐसे समय में वह खुद देश के उभरते हुए समाजवादी सितारे को धूमिल करने में लग गए। जब देश में समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया व लोकनायक जयप्रकाश नारायण के तैयार किए गए समाजवादी अपने रास्ते से भटकने लगे तो आगे बढ़कर ऐसे नौजवान ने समाजवाद का झंडा संभाला जिसने अपने पिता को बस संघर्ष करते ही देखा। अखिलेश यादव गत दिनों जनहित और समाजवादी विचारधारा के पक्ष में जो निर्णय लिए उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया की याद दिला दी। उन्होंने दबाव में गलत काम के लिए बोलने पर नेताजी को जो आइना दिखाने का प्रयास किया उसने प्रदेश ही नहीं बल्कि देश का दिल जीत लिया। दीपक सिंघल को मुख्य सचिव और गायत्री प्रजापति पहले हटाने और फिर मंत्री बनाने पर अखिलेश यादव की जो किरकिरी हुई उसके लिए खुद मुलायम सिंह यादव जिम्मेदार थे। नेताजी आपके राज में नीरा यादव और अखंड प्रताप सिंह ने मुख्य सचिव रहते सरकार की जो छवि धूमिल की थी क्या वह सही थी ?
    अखिलेश यादव की पांच साल की सरकार में उन पर व्यक्तिगत रूप से कोई आरोप न लग सका। निश्चित रूप से उनका पहला ही कार्यालय प्रदेश के अन्य मुख्यमंत्री रहे नेताओं पर भारी पड़ रहा है। समाजवादी विचारधारा के लिए दागी लोगों को पार्टी में न घुसने देने के उनके निर्णय ने उनके समकालीन नेताओं से कहीं आगे कर दिया। जहां उन्होंने बाहुबलि डी.पी. यादव को पार्टी में न घुसने दिया, वहीं मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद का भी विरोध किया। इन लोगों ने अखिलेश यादव का विरोध ताक पर रखकर मुलायम सिंह में विश्वास जताया था। ऐसे में नेताजी ने अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी को गले लगाकर अखिलेश यादव को नीचा नहीं दिखाया बल्कि अपना खुद का कद घटाया है।
निश्चित रूप से संघर्ष के समय में अमर सिंह और शिवपाल सिंह यादव ने पार्टी और नेताजी आपका साथ दिया। उसके हिसाब से उन्हें सम्मान भी मिल रहा है। अमर सिंह राष्ट्रीय महासचिव राज्यसभा सदस्य और संसदीय बोर्ड में हैं तो शिवपाल सिंह यादव प्रदेश के अध्यक्ष।  इसमें दो राय नहीं कि समाजवादी पार्टी को यहां तक नेताजी अपने दम पर खींच लेकर आए हैं पर क्या 2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के चेहरे पर वोट नहीं मिला ? क्या अखिलेश यादव ने परिवार और बड़े नेताओं के दबाव से निकलकर प्रदेश में विकास के ऐतिहासिक कार्य नहीं किए ? क्या यदि दोबारा सपा की सरकार बनती है तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री नहीं बनने चाहिए ? क्या अखिलेश यादव से योग्य चेहरा समाजवादी पार्टी में है ? यदि है तो कौन है ? यदि नहीं तो अखिलेश यादव के पसंद के प्रत्याशी क्यों नहीं बनने चाहिए ?
     जब चुनाव में 25 फीसद युवा निर्णायक भूमिका निभा रहा हो। यह युवा वह है जिस पर किसी जाति धर्म का असर नहीं पड़ता है और  आज की तारीख में युवा वर्ग अखिलेश यादव में उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश का भविष्य देख रहा है तो नेताजी आप इस युवा वर्ग को क्यों नाराज करने में लगे हैं? अखिलेश यादव की इच्छा के विरुद्ध बाहुबलि अतीक अहमद और खनन माफिया गायत्री प्रजापति को टिकट देकर आप क्या साबित करना चाहते हैं ?
    नेताजी तो यह माना जाए कि जितने भी बुजुर्ग नेता हैं बस दिखावे के ही लिए युवाओं का आगे बढ़ाने की बात करते हैं। जितने भी टिकट आपने काटे हैं ये सब युवा नेता हैं। उत्तर प्रदेश के योग्य मुख्यमंत्री को नीचा दिखाकर आप लोगों में क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या अब भी आप अखिलेश यादव से लंबी राजनीतिक पारी खेलने की स्थिति में है ? क्या आप देश के उभरते हुए समाजवादी चेहरे को ढकने का प्रयास नहीं कर रहे हंै ? आपने हमेशा ही जनहित और देशहित की बात कही है। समाजवादियों के संघर्ष का अध्ययन कर काम करने की बात कही है। जब आपका खुद का बेटा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में समाजवाद का झंडा बुलंद करने चला है तो आप ही उसके इस बुलंद इरादे में रोड़ा बनने लगे। नेताजी अब अखिलेश यादव को कोई रोकना वाला नहीं है। आप क्यों नायक से खलनायक बन रहे हंै। आज की तारीख में अखिलेश यादव का चेहरा ऐसा बन चुका है कि वह पूरी समाजवादी पार्टी पर भारी पड़ रहे हैं।
    सोचिए वह भी आपके ही बेटे हैं कहीं यदि उन्होंने अलग पार्टी बनाकर अपने प्रत्याशी चुनावी समर में उतार दिए तो आपके साथ खड़े नेताओं की राजनीति का क्या होगा ? नेताजी समझ लीजिए यदि आप लोग अपने पथ से न भटके होते तो आज देश में जहां संघी खड़े हैं वहां समाजवादी होते। संघियों को परास्त करने का जज्बा अखिलेश यादव में है उन्हें देश में समाजवादियों का परचम लहराने दीजिए। सपा में बने इस माहौल में अखिलेश यादव को भी संदेशनात्मक और कड़े निर्णय लेने होंगे।

Friday, 23 December 2016

किसानों के सबसे बड़े पैरोकार थे चरण सिंह

                      (23 दिसंबर जयंती पर विशेष )                      


समाजवादी सत्ता की नींव में जहां डॉ. राममनोहर लोहिया का खाद-पानी स्मरणीय है वहीं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जाति तोड़ो सिद्धांत व उनकी स्वीकार्यता भी अहम बिन्दु है। चौधरी चरण सिंह की जयंती पर समाजवाद सरोकार में उनके जैसे खांटी नेताओं की याद आना लाजमी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देश की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस के विरुद्ध सशक्त समाजवादी विचारधारा की स्थापना का श्रेय भले ही डॉ. राममनोहर लोहिया आैर जयप्रकाश नारायण को जाता हो पर वर्तमान में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी के रहनुमा जिस पाठशाला में राजनीति का ककहरा सीख कर आए, उसके आचार्य चरण सिंह रहे हैं। यहां तक कि हरियाणा और बिहार के समाजवादियों को भी चरण सिंह ने राजनीतिक पाठ पढ़ाया।
    चौधरी चरण सिंह ने अजगर शक्ति अहीर, जाट, गुज्जर आैर राजपूत का शंखनाद किया। उनका कहना था कि अजगर समूह किसान तबका है। उन्होंने अजगर जातियों से रोटी-बेटी का रिश्ता जोड़ने का भी आह्वान किया तथा अपनी एक बेटी को छोड़ सारी बेटियों की शादी अंतरजातीय की। यह चरण सिंह की विचारधारा का ही असर है कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार चरण सिंह की नीतियों पर चलने का आश्वासन देती रही है तो उनके पुत्र आैर राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख अजीत सिंह उनके नाम पर राजनीति आगे बढ़ा रहे हैं। जदयू अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किसानों में चरण सिंह की आस्था का फायदा उठाने के लिए उत्तर प्रदेश में उनके पुत्र अजित सिंह से हाथ मिलाया है।
     आज भले ही उनके शिष्यों पर परिवाद और पूंजीवाद के आरोप लग रहे हों पर चौधरी चरण सिंह पूंजीवाद आैर परिवारवाद के घोर विरोधी थे तथा गांव गरीब तथा किसान उनकी नीति में सर्वोपरि थे। हां अजित सिंह को विदेश से बुलाकर पार्टी की बागडोर सौंपने पर उन पर पुत्रमोह का आरोप जरूर लगा। तबके कम्युनिस्ट नेता चौ. चरण सिंह को कुलक नेता जमीदार कहते थे जबकि सच्चाई यह भी है चौ. चरण सिंह के पास भदौरा (गाजियाबाद) गांव में मात्र 27 बीघा जमीन थी जो जरूरत पडने पर उन्होंने बेच दी थी। यह उनकी ईमानदारी का प्रमाण है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके नाम कोई जमीन आैर मकान नहीं था।
    चरण सिंह ने अपने करियर की शुरुआत मेरठ से वकालत के रूप में की। चरण सिंह का व्यक्तित्व आैर कृतित्व विलक्षण था तथा गांव तथा किसान के मुद्दे पर बहुत संवेदनशील हो जाते थे। आर्य समाज के कट्टर अनुयायी रहे चरण सिंह पर महर्षि दयानंद का अमिट प्रभाव था। चरण सिंह मूर्ति पूजा, पाखंड और आडम्बर में कतई विश्वास नहीं करते थे । यहां तक कि उन्होंने जीवन में न किसी मजार पर जाकर चादर चढ़ाई आैर न ही मूर्ति पूजा की। चौधरी चरण सिंह की नस-नस में सादगी आैर सरलता थी तथा वह किसानों की पीड़ा से द्रवित हो उठते थे। उन्होंने कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त करने का जो संकल्प लिया, उसे पूरा भी किया।शून्य से शिखर पर पहुंचकर भी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। चरण सिंह ने कहा था कि भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे, चाहे कोई भी लीडर आ जाये, चाहे
कितना ही अच्छा कार्यक्रम चलाओ, वह देश तरक्की नहीं कर सकता।
वैसे तो चौधरी चरण सिंह छात्र जीवन से ही विभिन्न  सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेने लगे थे पर उनकी राजनीतिक पहचान 1951 में उस समय बनी जब उन्हें उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री का पद प्राप्त हुआ। उन्होंने न्याय एवं सूचना विभाग संभाला।
    चरण सिंह स्वभाव से ही किसान थे। यह उनका किसानों के प्रति लगाव ही था कि उनके हितों के लिए अनवरत प्रयास करते रहे। 1960 में चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में उन्हें गृह तथा कृषि मंत्रालय दिया गया। उस समय तक वह उत्तर प्रदेश की जनता के मध्य अत्यंत लोकप्रिय हो चुके थे। उत्तर प्रदेश के किसान चरण सिंह को अपना मसीहा मानते थे। उन्होंने किसान नेता की हैशियत से उत्तर प्रदेश में भ्रमण करते हुए किसानों की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया। किसानों में सम्मान होने के कारण चरण सिंह को किसी भी चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। उनकी ईमानदाराना कोशिशों की सदैव सराहना हुई। वह लोगों के लिए एक राजनीतिज्ञ से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्हे भाषण देने में महारत हासिल थी। यही कारण था कि उनकी जनसभाओं में भारी भीड़ जुट जाती थी। यह उनकी भाषा शैली ही थी कि लोग उन्हें सुनने को लालयित रहते थे। 1969 में कांग्रेस का विघटन हुआ तो चौधरी चरण सिंह कांग्रेस (ओ) के साथ जुड़ गए। इनकी निष्ठा कांग्रेस सिंडिकेट के प्रति रही। वह कांग्रेस (ओ) के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो बने पर बहुत समय तक इस पद पर न रह सके।
    कांग्रेस विभाजन का प्रभाव उत्तर प्रदेश राज्य की कांग्रेस पर भी पड़ा था। केंद्रीय स्तर पर हुआ विभाजन राज्य स्तर पर भी लागू हुआ। चरण सिंह इंदिरा गांधी के सहज विरोधी थे। इस कारण वह कांग्रेस (ओ) के कृपापात्र बने रहे। जिस समय इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं तो उस समय भी उत्तर प्रदेश संसदीय सीटों के मामले मे बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य था। इंदिरा गांधी का गृह प्रदेश होने का कारण एक वजह था। इस कारण उन्हें यह स्वीकार न था कि कांग्रेस (ओ) का कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहे। इंदिरा गांधी ने दो अक्टूबर 1970 को उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। चौधरी चरण सिंह का मुख्यमंत्रित्व जाता रहा। इससे इंदिरा के प्रति चौधरी चरण सिंह का रोष और बढ़ गया था। हालांकि उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति से चरण सिंह को बेदखल करना संभव न था। चरण सिंह उत्तर प्रदेश में प्रदेश में भूमि सुधार के लिए अग्रणी नेता माने जाते हैं। 1960 में उन्होंने भूमि हदबंदी कानून लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
   ईमरजेंसी लगने के बाद 1977 में हुए चुनाव में जब जनता पार्टी जीती तो आंदोलन के अगुआ जयप्रकाश नारायण के सहयोग मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और चरण सिंह को गृहमंत्री बनाया गया। सरकार बनने के बाद से ही मोरारजी देसाई और चरण सिंह के मतभेद खुलकर सामने आने लगे थे। 28 जुलाई, 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने में सफल हो गए। कांग्रेस और सीपीआई ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया। प्रधानमंत्री बनने में इंदिरा गांंधी का समर्थन लेना राजनीतिक पंडित चरण सिंह की पहली और आखिरी गलती मानते हैं।
    दरअसल इंदिरा गांधी जानती थीं कि मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के रिश्ते खराब हो चुके हैं। यदि चरण सिंह को समर्थन देने की बात कहकर बगावत के लिए मना लिया जाए तो जनता पार्टी में बिखराव शुरू हो जाएगा। इंदिरा गांधी ने ही चौधरी चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की भावना को हवा दी थी। चरण सिंह ने इंदिरा गांधी की बात मान ली और प्रधानमंत्री बन गए। हालांकि तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीवन रेड्डी ने 20 अगस्त 1979 तक लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने को  कहा इस प्रकार विश्वास मत प्राप्त करने के लिए उन्हें मात्र 13 दिन ही मिले । इसे चरण सिंह का दुर्भाग्य कहें या फिर समय की नजाकत कि इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त, 1979 को बिना बताए समर्थन वापस लिए जाने की घोषणा कर दी। चरण सिंह जानते थे कि विश्वास मत प्राप्त करना असंभव ही है। यहां पर यह बताना जरूरी होगा कि इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए शर्त लगा दी थी। उसके अनुसार जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो मुकदमें कायम किए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए, चौधरी साहब इसके लिए तैयार न थे। इसलिए उनकी प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई। वह जानते थे कि जो उन्होंने ईमानदार और सिद्धांतवादी नेता की छवि बना रखी। वह सदैव के लिए खंडित हो जाएगी। अत: संसद का एक बार भी सामना किए बिना चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।
   प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने के साथ-साथ चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रपति नीलम संजीवन रेड्डी से मध्यावधि चुनाव की सिफारिश भी की ताकि किसी अन्य द्वारा प्रदानमंत्री का दावा न किया जा सके। राष्ट्रपति ने इनकी अनुशंसा पर लोकसभा भंग कर दी। चौधरी चरण सिंह को लगता था कि इंदिरा गांधी की तरह जनता पार्टी भी अलोकप्रिय हो चुकी है। अत: वह अपनी लोकदल पार्टी और समाजवादियों से यह उम्मीद लगा बैठे कि मध्यावधि चुनाव में उन्हें बहुमत प्राप्त हो जाएगा। इसके अलावा चरण सिंह को यह आशा भी थी कि उनके द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के कारण उन्हें जनता की सहानुभूति मिलेगी। किसानों में उनकी जो लोकप्रियता थी कि वह असंदिग्ध थी। वह मध्यावधि चुनाव में 'किसान राजाÓ के चुनावी नारे के साथ में उतरे। तब कार्यवाहक प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ही थे, जब मध्यावधि चुनाव सम्पन्न हुए। वह 14 जनवरी 1980 तक ही भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस प्रकार उनका कार्यकाल लगभग नौ माह का रहा।
   चौधरी चरण सिंह की व्यक्तिगत छवि एक ऐसे देहाती पुरुष की थी जो सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखता था। इस कारण इनका पहनावा एक किसान की सादगी को प्रतिबिम्बत करता था। एक प्रशासक के तौर पर उन्हें बेहद सिद्धांतवादी आरै अनुशासनप्रिय माना जाता था। वह सरकारी अधिकारियों की लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के प्रबल विरोधी थे। प्रत्येक राजनीतिज्ञ की यह स्वभाविक इच्छा होती है कि वह राजनीति के शीर्ष पद पहुंचे। इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है। चरण सिंह अच्छे वक्ता थे और बेहतरीन सांसद भी थे। वह जिस कार्य को करने का मन बना लें तो फिर उसे पूरा करके ही दम लेते थे। चौधरी चरण सिंह राजनीति में स्वच्छ छवि रखने वाले इंसान थे। वह अपने समकालीन लोगों के समान गांधीवादी विचारधारा में यकीन रखते थे। स्वतंत्रता प्राप्त के बाद गांधी टोपी को कई दिग्गज नेताओं ने त्याग दिया था पर चौधरी चरण सिंह ने इसे जीवन पर्यंत धारण किए रखा।
    बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि चरण सिंह एक कुशल लेखक की आत्मा भी रखते थे। उनका अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। उन्होंने 'आबॉलिशन ऑफ जमींदारी, लिजेंड प्रोपराटरशिप और इंडियास पॉवर्टी एंड सोल्यूशंस नामक पुस्तकों का लेखन भी किया। जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी का पुरागमन चरण सिंह की राजनीतिक विदाई का महत्वपूर्ण कारण बना।