Monday, 28 November 2016

नमक से समाजवाद लाएंगे अखिलेश!

   नमक एक ऐसा पदार्थ है कि इसके बिना काम नहीं चल सकता है। गरीब के लिए तो नमक कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण माना जाता है। कितनी बार जब गरीब आदमी का दाल, सब्जी या चटनी की व्यवस्था नहीं कर पाता है तो नमक की रोटी ही खाकर अपना काम चला लेता है। नमक के बारे में हमारे समाज में यह धारणा भी रही है कि जो कोई किसी का नमक खा ले तो वह उसके साथ विश्वासघात नहीं करता है। अखिलेश यादव ने नमक के माध्यम से लोगों से जुड़ने की अच्छी रणनीति बनाई है। यह उनका समाजवाद के प्रति समर्पण भाव ही है कि उन्होंने इसे समाजवादी नमक का नाम दिया है। यह नमक उत्तर प्रदेश में सरकार की ओर से रियायती मूल्य पर मिलेगा। सरकार का दावा है कि यह नमक आयरन और आयोडीन युक्त बनाया गया है। सरकार का कहना है कि उनके द्वारा कराए गए सर्वे में गर्भवती महिलाओं व बच्चों की चिंताजनक तस्वीरें सामने आई हैं। सरकार ने यह महसूस किया है कि एनीमिया की जानकारी के अभाव में लोगों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है।
   जब देश में समाजवाद का झंडा थामे पुराने समाजवादियों पर तरह-तरह के आरोप लगने लगे तो मुख्यमंत्री बनने के बाद परिवार और वरिष्ठ नेताओं की वजह से तमाम आलोचना झेलने वाले अखिलेश यादव ने डॉ. राम मनोहर लोहिया की नीतियों पर चलते हुए समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया। गत दिनों  परिवार व पार्टी में मचे घमासान में विचारधारा को लेकर अपनाए गए अखिलेश यादव के रुख ने जो संदेश दिया उसने अच्छे से अच्छे राजनीतिज्ञों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
   वह अखिलेश यादव का समाजवाद ही था कि बाहुबली डीपी यादव को उन्होंने पार्टी में घुसने नहीं दिया। जब नेताजी व शिवपाल यादव ने बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय किया तो अखिलेश यादव ने इसका जमकर विरोध किया। यह उनकी जिद ही थी कि उनकी बात न मानी जाने पर वह गाजीपुर में हुई सपा की चुनावी रैली में नहीं गए। यह उनका दृढ़ संकल्प ही है कि विचारधारा और पार्टी के लिए उन्होंने जो स्टैंड लिया है, तमाम दबाव उसे डिगा नहीं पाए। जहां वह पार्टी के थिंकटैंक माने जाने वाले प्रो. रामगोपाल यादव को फिर से पार्टी में लाने में कामयाब रहे वहीं पार्टी से निष्कासित युवा नेताओं का निष्कासन भी वह समाप्त कराने वाले हैं। दूसरी ओर मंत्रिमंडल से हटाए गए किसी भी मंत्री को किसी भी दबाव में वापस न लेकर उन्होंने अपने को साबित भी दिखाया।
   समाजवादी विचारधारा की बात करें तो विदेश में ही भले कार्ल मार्क्स और लेनिन की विचारधारा को ज्यादा महत्व दिया जाता हो पर हमारे देश में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक नये समाजवाद को जन्म दिया। चाहे लोक नायक जयप्रकाश हों, आचार्य नरेंद्र देव हों, मधु लिमये हों,  मधु दंडवते हों, चौधरी चरण सिंह या फिर किशन पटनायक। लोहिया जी की भाषा शैली में इन सबसे अधिक धार थी। यही वजह रही कि चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद चंद्रशेखर सिंह का दामन थामने वाले नेताजी ने 5 नवम्बर 1992 डॉ. राम मनोहर लोहिया की नीतियों पर चलते हुए समाजवादी पार्टी की स्थापना की।  इन सबके बीच नेताजी पर तरह-तरह के आरोप लगे पर यह उनका संघर्ष ही था कि केंद्र में रक्षा मंत्री और तीन बार मुख्यमंत्री बनने बाद 2012 में उन्होंने पूर्ण बहुमत के साथ अपने पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया।
   ऐसा नहीं कि नोटबंदी पर ही नेताजी संघियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे हों। 1990 में जब राम मंदिर निर्माण के नाम पर संघियों की अगुआई में विवादित ढांचे को गिराने का प्रयास किया गया तो उस समय मुख्यमंत्री पद पर विराजमान नेताजी ने कारसेवकों पर गोलियां भी चलवा कर विवादित ढांचे को बचाया था। आज की तारीख में भले ही उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजवादियों की सरकार चल रही हो पर कुल मिलाकर देश में समाजवाद कमजोर हुआ है। यही वजह है कि कांग्रेस के कमजोर होने पर जिस जगह समाजवादियों को होना चाहिए था वहां आज संघी खड़े हैं।
   दरअसल जिस गैर कांग्रेसवाद का नारा आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दे रहे हैं, यह नारा किसी समय डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दिया था। इसमें भी दो राय नहीं कि कांग्रेस का विरोध करते-करते ही समाजवादी मजबूत हुए हैं। यही वजह है कि जब भी समाजवादी कांग्रेस से सटे हैं तभी वे कमजोर हुए। यह जानते हुए ही अखिलेश यादव ने 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से गठबंधन नहीं होने दिया।
   नरेंद्र मोदी ने भी आम चुनाव में इसी का फायदा उठाया था। आम चुनाव के प्रचार में उन्होंने लोहिया व जेपी की नीतियों का हवाला देते हुए समाजवादियों को जमकर निशाना साधा था। उसका उन्हें फायदा भी मिला। अब जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गैर संघवाद का नारा दिया तो वह इस नारे को ज्यादा हवा न दे पाए। समय की नजाकत को पहचानते हुए नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री की नोटबंदी की योजना का समर्थन कर रहे हैं। वह बात दूसरी है कि जदयू को छोड़कर पूरा विपक्ष इस योजना के विरोध में सड़कों पर आ गया है। ऐसे में कैसे गैर संघवाद का नारा बुलंद होगा और कैसे समाजवाद मजबूत होगा, इस पर समाजवादियों को मंथन की जरूरत है। यह सब अखिलेश यादव बखूबी समझ रहे हैं। वह जान गए हैं कि लंबी पारी खेलने के लिए उन्हें लोहिया की नीतियों पर आधारित समाजवाद का नारा बुलंद करना होगा।
   समाजवादियों को यह समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी ने तर्कों के साथ जनता को प्रभावित किया है। वह लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि जो समाजवादी गैर कांग्रेसवाद का नारा देकर आगे बढ़े थे, वे अपने स्वार्थ के लिए समय-समय पर कांग्रेस से सटते रहे हैं। संघी देश के बड़े आंदोलन में समाजवादियों के साथ रहे हैं।  दरअसल समाजवादियों की समय-समय पर हुई गलती से समाजवाद कमजोर हुआ है। इमरजेंसी के बाद देश में जनता पार्टी की सरकार बनने पर जिन चरण सिंह ने अपने गृहमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी कराई,  वह ही इंदिरा गांधी के सहयोग प्रधानमंत्री बन गए। कुछ ही दिन बाद कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और चरण सिंह देखते रह रहे। समाजवादियों के पक्ष में बना माहौल तो खराब हुआ ही साथ ही समाजवादी भी बिखर गए। जनता पार्टी में संघी भी समाजवादियों के साथ थे। 1989 में जब समाजवादियों के प्रयास से वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने तो संघियों ने सरकार को समर्थन दिया। राम मंदिर निर्माण आंदोलन में बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी होने पर जब भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया तो चंद्रशेखर सिंह ने राजीव गांधी क बहकावे में आकर कांग्रस के समर्थन से अपनी सरकार बना ली। कांग्रेस ने कुछ ही महीने बाद अपने स्वभाव के अनरूप सरकार से समर्थन वापस ले लिया तथा सरकार गिर गई। 1996 में भी यही हुआ समाजवादियों ने कांग्रेस की मदद से सरकार बनाई। इस बीच एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल दो प्रधानमंत्री ने पर समय पूरा नहीं कर पाए। कहना गलत न होगा कि ज्यों-ज्यों समाजवादी मजबूत हुए, त्यों-त्यों कांग्रेस ने उनको समर्थन देकर हाथ खींचा और कमजोर किया।
    अब देखना यह है कि 1980 में बनी पार्टी देश पर पूर्ण बहुमत के साथ राज कर रही है और समाजवादी नेता न तो चरण सिंह के लोकदल को आगे बढ़ा पाए और न ही कई दलों के विलय से बनी जनता पार्टी को और न ही जनता दल को। समाजवादी नेताओं ने एकजुट न होकर अपने-अपने दल बना लिए। राम विलास पासवान ने लोजपा, लालू प्रसाद यादव ने राजद तो शरद यादव और नीतीश कुमार ने जदयू पार्टियां बना लीं। जनसंघ से निकले नेताओं की एक ही पार्टी भारतीय जनता पार्टी रही। ऐसे में समाजवाद का कमजोर होना स्वभाविक था। यह भी कहा जा सकता है कि समाजवादी तो मजबूत हो गए पर समाजवाद कमजोर ही रहा। ऐसे में युवा समाजवादी नेता के रूप में राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर छाए अखिलेश यादव की जिम्मेदारी बन जाती है कि लोहिया जी नीतियों वाले समाजवाद का झंडा बुलंद  करें। 
   अखिलेश यादव का प्लस प्वांइट यह है कि पारिवारिक और वरिष्ठ नेताओं के दबाव में किए गए काम के चलते भले ही उन्हें तरह-तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा हो पर व्यक्तिगत रूप से उन्हें किसी ने गलत नहीं ठहराया। यही उनका लोहिया जी से प्रेरित समाजवाद है कि नेताजी के तमाम प्रयास के बावजूद वह अमर सिंह को पचाने को तैयार नहीं। अखिलेश यादव की रणनीति है कि प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में युवा समाजवादियों की एक बड़ी फौज तैयार की जाए। उत्तर प्रदेश का चुनाव भी वह इन्ही युवाओं के बल पर जीतने में लगे हैं।

Tuesday, 8 November 2016

अखिलेश को अपने दम पर लड़ना होगा चुनाव !

मुख्यमंत्री बनने के बाद तमाम दबाव को झेलते हुए सरकार चलाने वाले अखिलेश यादव को न चाहते हुए भी कई तरह के समझौते करने पड़े। यही वजह रही कि विरोधी दल प्रदेश में चार मुख्यमंत्री होने की बात करने लगे थे। इसे अखिलेश यादव की विचारधारा कहें या फिर दृढ़ इच्छा कि सरकार के अंतिम दौर में उन्होंने पार्टी में जो स्टैंड लिया वह समाजवाद के लिए मिसाल बन गया। विचारधारा, पार्टी और प्रदेश के लिए वह न केवल व्यवस्था बल्कि अपने चाचा-पिता पार्टी के मुखिया से भी टकरा गए।
समय-समय पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के दबाव में समझौते करने की वजह फजीहत झेलने वाले अखिलेश यादव ने जब निर्णय लिया तो राजनीतिक जगत को भौचक्का कर दिया। निर्णय भी ऐसा कि किसी भी कीमत में वह अपनी विचारधारा से समझौता नहीं करेंगे। विचारधारा भी समाजवाद के प्रेरक डॉ. राम मनोहर लोहिया की। जिन परिस्थिति में अखिलेश यादव ने विचारधारा और व्यवस्था को लेकर दम भरा है, उनके इस निर्णय ने लोहिया जी के फैसलों की यादें ताजा कर दी। आजाद भारत में लोहिया जी के बाद अन्याय का इस हद तक यदि किसी ने विरोध किया है तो वह अखिलेश यादव हैं। भले ही नेताजी महागठबंधन की कवायद में लगे हों पर अखिलेश यादव का आत्मविश्वास ही है कि विचारधारा, जुझारूपन, प्रदेश का विकास और युवाओं के बल पर वह चुनाव जीतने निकल पड़े हैं।
5 नवम्बर को लखनऊ में मनाए गए समाजवादी पार्टी के स्थापना दिवस पर लोहिया जी के जब मैं मर जाऊंगा तब लोग मुझे याद करेंगे के कथन का हवाला देतेे हुए अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ लोग जब समझेंगे जब पार्टी में कुछ नहीं बचेगा तो उनकी सोच पर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्हें भेंट की गई तलवार के बारे में तलवार तो देते हो पर चलाने का अधिकार नहीं देते कहकर वह बहुत कुछ कह गए।
इन सब के बीच अखिलेश यादव को सोचना होगा कि उनके इस स्टैंड से जहां साफ-सुथरी छवि वाले समाजवादियों में उनके प्रति आस्था बढ़ी है वहीं राजनीतिक के क्षेत्र में करियर बनाने वाले युवा अखिलेश यादव की अगुआई में राजनीतिक सफर शुरू करने की सोचने लगे हैं। अखिलेश यादव को यह भी देखना होगा कि लंबे समय से पुराने समाजवादियों पर अपने पथ से भटकने के आरोप लग रहे हैं। ऐसे में उनपर बहुत कुछ निर्भर करता है। आज की तारीख में देश जिस हालात से जूझ रहा है। ऐसे में सच्ची समाजवादी विचारधारा ही है जो सभी वर्गों को साथ लेकर देश को विकास के रास्ते पर ले जा सकती है।
उत्तर प्रदेश में चल रही महागठबंधन कवायद से अखिलेश यादव को नुकसान ही नुकसान होगा। यदि यह महागठबंधन चुनाव जीतता है तो इस जीत का श्रेय विभिन्न पार्टियों के बड़े नेता ले जाएंगे और उनका कद घटेगा। महागठबंधन के रूप में चुनाव लड़ने से अपनी पार्टियों के समाजवाद से भटके नेताओं तथा अन्य दलों की वजह उनकी छवि भी धूमिल होगी। साथ ही जिन युवाओं का रुझान अखिलेश यादव के प्रति बढ़ा है वह भी प्रभावित होगा। अखिलेश यादव को लंबी पारी खेलने के लिए युवा समाजवादियों की अगुआई करते हुए अपने दम पर चुनाव लड़ना होगा। अखिलेश यादव की अगुआई में देश युवा समाजवादियों की बड़ी फौज खड़ी होने की पूरी संभावनाएं है। यदि अखिलेश यादव ने अपने चेहरे पर यह चुनाव जीत लिया तो आने वाले समय में पुराने समाजवादी भी अखिलेश यादव की अगुआई में समाजवाद का नारा बुलंद करते दिखाई देंगे और देश में एक नए समाजवाद की स्थापना होगी।

Tuesday, 18 October 2016

नेताजी पर भारी अखिलेश की विचारधारा

      डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुयाई तथा चौधरी चरण सिंह के सबसे प्रिय शिष्य रहे जिद्दी स्वभाव के मुलायम सिंह यादव ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके राजनीतिक जीवन में ऐसा दिन भी आएगा कि उनका खुद का बेटा उन्हें अपनी बात मनवाने क लिए मजबूर कर देगा। जिस बेटे को उन्होंने देश के सबसे बड़े व सियासी प्रदेश उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाया उसी बेटे से उनका वैचारिक मतभेद हो जाएगा। मतभेद भी ऐसा कि पिता-पुत्र दो खेमे में बंट जाएं। हुआ जो भी हो। किसी भी कारण से हो। अखिलेश यादव ने दिखा दिया कि उनके अंदर भी नेताजी वाला ही कलेजा है। यह अखिलेश यादव की छवि ही है कि चुनाव के बाद विधायकों के चुनने पर ही मुख्यमंत्री बनाने वाले पार्टी मुखिया को अंतत: अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करना ही पड़ा।
     बात वैचारिक मतभेद और पिता व पुत्र की हो रही है तो समय, हालात,  सही, गलत और नीतियां, सिद्धांत व उसूलों की भी होनी चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि मुलायम सिंह का जीवन विभिन्न संघर्षांे से होते हुए गुजरा है। इसमें भी दो राय नहीं कि अखिलेश यदि आज इस बुलंदी पर पहुंचे हैं तो अपने पिता के संघर्ष के बल पर। हां यदि आज के हालात की बात करें तो लोकप्रियता व छवि के मामले में अखिलेश यादव अपने पिता से आगे निकल गए हैं।
     समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव लोहिया जी की नीतियों पर चलने को मानते रहे हैं। यदि बात समाजवाद की हो। लोहिया की नीतियों की हो। ईमानदारी की हो। कर्त्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं को सम्मान देने की हो। उत्तर प्रदेश को साफ-सुथरी सरकार देने की हो तो आज की तारीख में अखिलेश यादव की विचारधारा व तर्क मुलायम सिंह यादव पर भारी पड़ रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि लंबे समय तक मुलायम सिंह यादव के साथ सारथी के रूप में काम करने वाले अमर सिंह का पार्टी को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान रहा है पर उनके दोबारा पार्टी में आने के बाद जो घटनाक्रम हुए। उन सब पर नजर डालें तो मुलायम सिंह का अमर सिंह को अपने लेटरपेड से महासचिव बना देना। दीपक सिंघल को पहले मुख्य सचिव पद से हटवाना और फिर बनवाने के लिए दबाव डालना। गायत्री प्रजापति को पहले हटवाना अखिलेश यादव के विरोध के बावजूद फिर बनवाने की बातें बाजार में आना। अखिलेश यादव के मुखर विरोध के बावजूद बाहुबलि मुख्तार अंसारी को पार्टी में लेना। अखिलेश यादव की वजह से प्रधनामंत्री न बन पाने की बात कहना लोहिया की नीतियों के ठीक विपरीत है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने न कभी गलत लोगों को आगे बढ़ाया और न ही कभी किसी पद की लालसा रखी। खुद मुलायम सिंह यादव भी विभिन्न मंचों से कहते रहे हैं कि असली समाजवादी कभी किसी पद की लालसा नहीं रखता है। कार्यकाल की बात करें अखिलेश यादव का कार्यकाल नेताजी के सभी कार्यकालों पर भारी पड़ता दिख रहा है। नेताजी के कार्यकाल विभिन्न विवादों से घिरे रहे हैं पर अखिलेश यादव के कार्यकाल में पारिवारिक हस्तक्षेप के चलते भल ही उनको कई बार कटघरे में खड़ा किया गया हो पर व्यक्तिगत रूप से अखिलेश यादव को किसी ने गलत नहीं बताया।
     उधर अखिलेश यादव पार्टी ने पार्टी की छवि साफ-सुथरी बनाए रखने के लिए जहां बाहुबलि डीपी यादव को पार्टी में नहीं आने दिया वहीं मुख्तार अंसारी का लगातार विरोध करते रहे। पिता के पार्टी के मुखिया होने के बावजूद अखिलेश यादव ने राजनीति में आते ही संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया। युवा प्रकोष्ठों के अध्यक्ष बनने पर भी उन्होंने युवाओं के कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी में काम किया।
    2012 के चुनाव में अखिलेश यादव ने साइकिल रैली निकालकर चुनावी माहौल बनाया तथा पूर्ण बहुमत की सरकार बनने पर ईमानदार मुख्यमंत्री के रूप में काम किया। हां अपने पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल सिंह यादव, तुनकमिजाज आजम खां व दूसरे चाचा रामगोपाल यादव की वजह से उन्हें कई बार तरह-तरह के समझौते करने पड़े। कानून व्यवस्था समेत कई मामले में उनको फजीहत का भी सामना करना पड़ा। जब प्रदेश में चार मुख्यमंत्री बताए जा रहे थे तो किसी तरह से अखिलेश यादव इस चक्रव्यू से बाहर निकले और प्रदेश के विकास में ऐतिहासिक फैसले लिए। मैं उनकी सरकार की उपलब्धि तो नहीं गिनवाऊंगा पर प्रदेश में दिखाई दे रहे विकास कार्य खुद उनकी उपलब्धियां बखान कर रहे हैं।
     सरकार को पांच साल पूरे होने जा रहे हैं पर अखिलेश सरकार में चारों ओर से दबाव के बावजूद कोई घोटाला न होना अखिलेश को मजबूत इरादे वाला नेता दर्शाता है। आज की तारीख में जिस तरह से अखिलेश यादव पार्टी की छवि को साफ-सुथरी रखने के लिए न केवल पार्टी महासचिव अमर सिंह चाचा शिवपाल सिंह यादव बल्कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव से भी मोर्चा ले रहे हैं यह संघर्ष उनके राजनीतिक कद को बहुत आगे ले जा रहा है।
   ऐसे नाजुक मोड़ पर देश की किसी भी पार्टी में कोई भी नेता पार्टी के लिए इतना बड़ा साहस नहीं दिखा पा रहा है। भले ही लंबे समय तक मुलायम सिंह यादव में पार्टी को खींचने का माद्दा रहा है पर आज की तारीख में अखिलेश यादव ही हैं जो पार्टी के खेवनहार बन सकते हैं।

Saturday, 15 October 2016

मौत के सौदागर बने कोटा के कोचिंग सेंटर संचालक

इसे शिक्षा का व्यवसायीकरण कहें। युवा पीढ़ी का भटकाव या परिजनों की निगरानी में न रहना या फिर भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था में निराशा का माहौल वजह जो भी हो दूरदराज शहरों में भविष्य बनाने जा रहे युवाओं में से काफी मौत को गले लगा रहे हैं। रात-दिन मेहनत कर पैसे जुटाने वाले परिजन सदमे में जा रहे हैं। स्थिति यह है कि एजुकेशन हब के नाम से प्रसिद्ध हो चुके राजस्थान के कोटा में इस साल 16 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की है। ये बात और दर्दनाक है कि इनमें से अधिकतर बिहार के हैं। हाजीपुर के अंकित गुप्ता ने चंबल नदी में छलांग लगाकर इसलिए आत्महत्या कर ली। क्योंकि वह मेडिकल में अपने माता-पिता के सपने को पूरा नहीं कर पा रहा था। गत दिनों एक छात्र ने 500 फुट इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र भी दो साल से मेडिकल की तैयारी कर रहा था। बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में रहता था। अभी कुछ ही दिन पहले बिहार से डॉक्टर बनने का सपना लेकर कोटा आई एक छात्रा ने फंदे से लटकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्रा भी हॉस्टल में रहकर मेडिकल की कोचिंग कर रही थी। छात्रा स्वभाव से खुशमिजाज बताई जा रही है। पढ़ने में भी तेज बताई जा रही यह छात्रा सीन साल से मेडिकल की तैयारी कर रही थी। इस छात्रा की तीन साल से कोचिंग करने की वजह से या तो उसे परिजनों के खर्चे की चिंता सता रही हो या फिर साथियों या परिजनों/रिश्तेदारों के ताने। जिस वजह से उसने मौत को गले लगाया।
   बात कोटा की नहीं है कि विभिन्न शहरों में इस तरह की खबरे सुनने को मिल जाती है। गत दिनों नोएडा के एमिटी विश्वविद्यालय में एक छात्र ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसी उपस्थिति कम होने की वजह से उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इन सब बातों को देखते हुए प्रश्न उठता है कि जीवन को उच्च स्तर का बनाने वाली शिक्षा को गृहण करते करते युवा आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? मामला इतना गंभीर है कि इन मामलों पर मंथन बहुत जरुरी हो गया है। क्या इन शिक्षण संस्थानों का माहौल ऐसा विषाक्त कर दिया गया है कि युवा इस माहौल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। या फिर बच्चों पर परिजनों के उच्च शिक्षा थोप देने की प्रवृत्ति या फिर रोजगार न मिलने की असुरक्षा। या फिर बात-बात पर समझौता करने वाली प्रवृत्ति के चलते युवा में समस्याओं से जूझने का कम हो रहा माद्दा। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप में सत्र खत्म होने वाले सत्र में इस तरह के संवेदनशील मुद्दे नहीं उठाए जाते हैं। जो मां-बाप तरह-तरह की समस्याओं का सामना करते-करते बच्चों की परवरिश करते हैं। सीने पर पत्थर रखकर बच्चों कों अपने से दूर कर देते हैं। जब उनको बच्चों की मौत की खबर सुनने मिलती तो उनकी मनोदशा क्या होती होगी ? क्या इस बात को कभी शिक्षा का व्यापारियों ने समझने की कोशिश की है ? सरकारों को वोटबैंक की राजनीति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। ये लोग तो वोट के लिए कभी आरक्षण की पैरवी करते हैं तो कभी जातिवाद धर्मवाद की और कभी क्षेत्रवाद की। बच्चों की भविष्य कैसे संवरे ? कैसे बच्चों में भाईचारा बढ़े। इससे न सरकारों को सरोकार है और न ही राजनीतिक दलों को। जिस देश का भविष्य ही दम तोड़ने लगे उसका दशा क्या होने वाली है बताने की जरूरत नहीं। कहीं आरक्षण के नाम पर जातिवाद का जहर। तो कहीं पर भेदभाव और कहीं पर क्षेत्रवाद। कभी कश्मीर में बच्चों के मरने की खबर सुनने को मिलती है तो कभी कर्नाटक में और कभी दिल्ली में। कुछ दिन तक राजनीति होती है और बाद में मामला शांत। जिसके घर से गया झेलता तो वह है। कब सुधरेगी यह व्यवस्था।
   राजनीति के बढ़ते वर्चस्व के चलते हर कोई राजनीति में जाना चाहता है। देश व समाज की सेवा करने नहीं बल्कि देश को लूटने। इस व्यवस्था में कहीं पर बच्चे अपराध की दलदल में फंसे जा रहे हैं तो कहीं पर टूटकर आत्महत्या कर ले रहे हैं। सरकारों व राजनीतिक दलों के साथ नौकरशाह को बस चिंता है तो बस लूटखसोट की। जब कोटा एक साल में इतने बड़े स्तर पर आत्महत्या के मामले सामने आए हैं तो सरकारी स्तर पर कोई जांच क्यों नहीं बैठाई गई। बच्चों के पढ़ने के बाद रोजगार ढूंढते समय तो आत्महत्या के मामले सुन लेते थे पर पढ़ाई करते समय आत्महत्या के बढ़ इन मामलों पर मंथन के साथ संबंधित शिक्षण संस्थानों में जांच कमेटी बैठाने की जरूरत है जो ईमानदारी से जांच रिपोर्ट सौंपे।