Friday, 27 November 2015

असहिष्णुता से खबरदार करने की जरूरत

    देश में इस समय असहिष्णुता को लेकर बवाल मचा हुआ है। जहां लेखक-साहित्यकार अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं, वहीं बालीवुड में भी भूचाल आ गया है। अभिनेता आमिर खान के  इस बयान के बाद कि 'असहिष्णुता से भयभीत मेरी पत्नी ने मुझे देश छोड़ने तक कह दिया था", वालीवुड की बड़ी हस्तियों के साथ ही भाजपा ने भी आमिर खान को निशाने पर ले लिया है। असहिष्णुता को लेकर प्रश्न उठता है कि जिस शब्द को लेकर देश का बड़ा वर्ग चर्चा में मशगूल है, उस शब्द को आम आदमी तो दूर की बात है, काफी संख्या में पढ़े-लिखे लोग भी नहीं समझ पा रहे हैं। इन हालात में बवाल मचाने से ज्यादा असहिष्णुता के बारे में लोगों को जाग्रत करने की जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि कैसे इस पर अंकुश लगाया जा सकता है ? कैसे यह समस्या बढ़ी है ? इस समस्या के बढ़ने में कौन-कौन से कारण व कौन लोग हैं?  असहिष्णुता के बढ़ने का दारोमदार किसी एक वर्ग या कौम पर नहीं है, यह बात साफ है। लोगों आैर सरकार को यह बताया भी जाना चाहिए कि इस ब्राहृपिशाच से मुक्ति कैसे आैर किस योजना के तहत मिल पाएगी।
   असहिष्णुता के विरोध के माध्यम से केंद्र सरकार बुद्धिजीवियों के निशाने पर है। यदि लेखकों व साहित्यकारों की बात करें तो उनके अनुसार गलत बात का विरोध करने पर समाज सेवकों, लेखकों व साहित्यकारों का दमन, उत्पीड़न व हत्या तक की जा रही है, जिसका जिम्मेदार ये लोग केंद्र सरकार को मानते हैं। एमएम कलबुर्गी, नरेंद्र दोभालकर आैर गोविंद पानसरे की हत्याओं को भी असहिष्णुता से जोड़कर देखा जा रहा है। असहिष्णुता देश में ऐसा मुद्दा बन गया है कि प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक को सफाई देने पड़ रही है। वैसे तो देश में अपने-अपने तरीके से असहिष्णुता का विरोध जताया जा रहा है पर सबसे अधिक मुखर वामपंथी लेखक व साहित्यकार हैं। स्थिति यह हो गई है कि गत दिनों बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ विरोध जता रहे भारतीय लेखकों पक्ष में वाशिंगटन में लेखकों के वैश्विक संघ ने केंद्र सरकार से अपील की कि इन लोगों को बेहतर सुरक्षा, अभिव्यक्ति व स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान किया जाए।
   कनाडा के क्यूबेक सिटी में हुई पेन इंटरनेशनल की 81वीं कांग्रेस में भाग लेने वाले 73 देशों के प्रतिनिधियों ने प्रतिष्ठित पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों व साहित्यकारों के साथ एकजुटता दिखाई। पेन इंटरनेशनल के अध्यक्ष जॉन राल्स्टन सॉल ने हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आैर साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर केंद्र  सरकार से लेखकों आैर कलाकारों समेत हर किसी के अधिकारों की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की है। असहिष्णुता का विरोध करने वाले लेखक, साहित्यकार, अभिनेता व अन्य लोग जो केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं, यदि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की बजाय समाज में असहिष्णुता को खत्म करने पर बल दें तो यह ज्यादा कारगर होगा। केंद्र सरकार को झुकना भी पड़ेगा। असहिष्णुता का विरोध करने वाले ये वे लोग हैं, जिनकी कलम व विचार से समाज परिवर्तित होता है। यह वर्ग  फिर क्यों केंद्र सरकार की ओर आशा भरी निगाह से देख रहा है? वैसे भी इस वर्ग की समाज के प्रति बड़ी जवाबदेही है -पुरस्कार लौटाने व बयानबाजी करने के बदले। यदि यह वर्ग इस काम को कर ले गया तो ये लोग जनता से असली रिवार्ड पाएंगे, जो कोई सरकार व संस्था नहीं दे सकती है।

Tuesday, 17 November 2015

धर्मनिरपेक्षता का मजाक बनाना रहा बिहार चुनाव परिणाम

    लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में काबिज होने वाली भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सहारे कई प्रदेश कब्जाए पर अति उत्साह में दिल्ली के बाद बिहार में मिली जबर्दस्त शिकस्त ने केंद्र सरकार की विफलता को उजागर कर दिया। प्रधानमंत्री भी देशवासियों की उम्मीदों को दरकिनार कर विदेशी दौरे में व्यस्त रहें। सरकार महंगाई आैर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के बजाय भावनात्मक से जुड़े मुद्दे उठाती रही आैर हिन्दुत्व में इतनी खो गई कि धर्मनिरपेक्षता उसके लिए मजाक बन रह गई।
   बात बिहार चुनाव की हो तो वह बिहार जहां से महात्मा गांधी से लेकर लोक नायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का बिगुल फूंका हो। जहां के गांधी मैदान ने कई समाजवादी नेता दिए हों। खुद नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक रैल की हो। वहां के चुनाव के बारे में देश की राजनीति की दिशा तय करने की बात कहना कहीं से गलत नहीं थी। जब नरेंद्र मोदी कांग्रेस की 40 सीटों को अपनी ही झोली में आने की बात कर रहे हों, जब वह समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को हल्के में ले रहे हों। ऐसे में ये परिणाम कहीं से आश्चर्यजनक नहीं लग रहे है। बिहार चुनाव के बारे में कहा जा रहा है कि आरएसएस सर संचालक मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान ने भाजपा की लूटिया डुबोई।
  आरक्षण हटने का डर दिखाकर लालू प्रसाद व नीतीश कुमार ने अति दलित व पिछड़ों को अपने पक्ष में लामबंद कर लिया। दादरी में हुए गो-मांस को लेकर हुई एक वृद्ध की हत्या के बाद नीतीश कुमार व लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्ष माहौल बनाने में कामयाब रहे। ये सब बातें तो है ही साथ ही भाजपा देश में जो हिन्दुत्व का माहौल बना रही थी उसे लोगों ने नकारते हुए धर्मनिरपेक्षता में आस्था जताई है। दरअसल जनता सामाजिक संतुलन चाहती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के भाजपा के हारने के बाद पाकिस्तान में जश्न मनाने के बयान ने भी लोगों को सोचने को मजबूर किया।
    मोदी यहां पर गलत रहे कि भाजपा के कई नेता उजूल-फिजूल बयान देते रहते हैं पर वह कुछ नहीं बोले। असहिष्णुता को लेकर सरकार के खिलाफ लेखक-साहित्याकार लामबंद हो गए। अपने अवार्ड लौटाने लगे पर प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। उल्टे उनके मंत्री गैरजिम्ेमदोराना बयानबाजी करने लगे। यदि चुनाव प्रचार की बात की जाए तो इन्हीं नरेंद्र मोदी ने आम चुनाव में पटना गांधी मैदान में हो रही रैली में बम विस्फोट के बाद कहा था कि हिन्दू-मुस्लिम को एक-दूसरे से लड़ने के बजाय गरीबी से लड़ना चाहिए। जब भाजपा नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम को लेकर बयानबाजी की तो नरेंद्र मोदी चुप्पी साधे बैठे रहे। दादरी में गो मांस को लेकर हुए वृद्ध की हत्या पर मोदी ने यह मामला राज्य सरकार का है कहकर पल्ला झाड़ लिया। यह नरेंद्र मोदी जनता की जवाबदेही से बचना ही था। जब देश महंगाई व भ्रष्टाचार से जूझ रहा हो आैर सरकार भावनात्मक मुद्दों तक ही सिमट रह गई है।
   आज के दौर में भले ही समाजवादियों पर जातिवाद-परिवारवाद व अवसरवाद का आरोप लग रहा हो पर यह जमीनी हकीकत है कि देश आज भी समाजवाद के सहारे ही चल रहा है। समाजवाद किसी विशेष नेता के बजाय समाज में व्याप्त है। नरेंद्र मोदी विदेश में भी जाकर धर्मनिरपेक्षता का मजाक बनाने से नहीं माने। वह एक विशेष दल पर निशाना साधते हुए धर्मनिरपेक्षता को टारगेट बनाते रहे। सर्वविदित है कि देश की बुनियाद धर्मनिरपेक्ष है। इस ढांचे को यह हिलाने का प्रयास किया गया तो हलचल होना स्वाभाविक है। मोदी के अब तक के कार्यकाल में ऐसा कहीं से नहीं लगा तो उन्हें गरीब आदमी की फिक्र है। चाहे मोदी विदेश में घूम रहे हों या फिर देश में बैठकें कर रहे हों। अब तक के कार्यकाल में उन्होंने कोई बैठक किसान व मजदूरों के साथ नहीं की। इसमें दो राय नहीं कि नीतीश कुमार ने बिहार में काम किया है।

Sunday, 11 October 2015

खुद्दारी व संघर्ष के पर्याय थे लोहिया

                               (12 अक्टूबर-पुण्यतिथि पर विशेष)

    जब हमारे देश में समाजवाद की बात आती है तो डॉ. राम मनोहर लोहिया का नाम सबसे ऊपर आता है। वह लोहिया ही थे, जिन्होंने 50 के दशक में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। लोहिया के समाजवाद को आगे बढ़ाते हुए 70 के दशक में इमरजेंसी के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में समाजवादियों ने कांग्रेस शासन की अराजकता के खिलाफ मोर्चा संभाला था। वह लोहिया की ही विचारधारा थी कि बिहार से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे दिग्गज देश की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर छाए। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए अपने दम पर कई सालों तक उत्तर प्रदेश पर राज किया आैर आज उनके पुत्र अखिलेश यादव भी लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। वह बात दूसरी है कि अब उन पर परिवारवाद, जातिवाद व अवसरवाद का आरोप लग रहा है।
   आज की राजनीति में भले ही समाजवादी अपनी विचारधारा से भटक गए हों पर शुरुआती दौर के समाजवादी जितने खुद्दार थे, उतने ही ईमानदार भी। जहां तक डॉ. राममनोहर लोहिया की बात है वह कितने खुद्दार थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके पिता का निधन हुआ तो वह 'भारत छोड़ो आंदोलन" के चलते आगरा जेल में बंद थे आैर इस विकट परिस्थिति में भी उन्होंने ब्रिाटिश सरकार की कृपा पर पेरोल पर छूटने से इनकार कर दिया। देशभक्ति व ईमानदारी लोहिया को विरासत में मिली थी। उनके पिता श्री हीरालाल एक सच्चे देशभक्त अध्यापक थे। समाजवाद व संघर्ष उनमें बचपन से ही शुरू हो गया था। जब लोहिया ढाई वर्ष के थे तो उनकी माता चंदादेवी का देहांत हो गया आैर उनकी दादी व नाइन ने उनका पालन-पोषण किया। गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का असर लोहिया पर बचपन से ही पड़ गया था, उनके पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे आैर जब उनसे मिलने जाते तो लोहिया को अपने साथ ले जाते। वैसे तो राजनीति का पाठ लोहिया ने गांधी जी से सीखना शुरू कर दिया था पर सक्रिय रूप से वे 1918 में अपने पिता के साथ पहली बार अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। पहली हड़ताल उन्होंने लोकमान्य गंगाधर तिलक की मृत्यु के दिन अपने विद्यालय के लड़कों के साथ 1920 में की। 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू से उनकी पहली मुलाकात हुई। युवाओं में लोहिया की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्त थी कि कलकत्ता (अब कोलकाता) में अखिल बंग विद्यार्थी परिषद के सम्मेलन में सुभाषचंद्र बोस के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता भी की।
    लोहिया से उनका समाज इतना प्रभावित था कि समाज ने 1930 जुलाई को अपने कोष से उन्हें पढ़ने के लिए विदेश भेजा। लोहिया पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड गए आैर फिर वहां से बर्लिन। यह अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ लोहिया की बगावत ही थी कि 23 मार्च, 1931 को लाहौर में भगत सिंह को फांसी दिए जाने विरोध में बर्लिन में हो रही 'लीग ऑफ नेशंस" की बैठक में सीटी बजाकर दर्शक दीर्घा से उन्होंने इसका विरोध प्रकट किया। लोहिया ने किन परिस्थितियों में देश आैर समाज के लिए संघर्ष किया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब 1933 में वह मद्रास पहुंचे तो रास्ते में उनका सामान जब्त कर लिया गया। लोहिया समुद्री जहाज से उतरकर 'हिन्दू" अखबार के दफ्तर पहुंचे आैर दो लेख लिखकर 25 रुपए कमाए आैर इनसे कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता  से बनारस पहुंचकर उन्होंने मालवीय जी से मुलाकात की। मालवीय जी ने उन्हें रामेश्वर दास बिड़ला से मिलाया, जिन्होंने लोहिया को नौकरी का प्रस्ताव दिया पर दो हफ्ते रहने के बाद उन्होंने बिड़ला जी का निजी सचिव बनने से इनकार कर दिया।
   17 मई 1934 को पटना में आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हॉल में इकट्ठे हुए, जहां समाजवादी पार्टी की स्थापना का निर्णय लिया गया। लोहिया जी ने समाजवादी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की आैर पार्टी के उद्देश्यों में उन्होंने पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य जोड़ने का संशोधन पेश किया पर उसे अस्वीकार कर दिया गया, बाद में 21 अक्टूबर 1934 को बम्बई (अब मुंबई) के 'रेडिमनी टेरेस" में 150 समाजवादियों ने इकट्ठा होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए आैर पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए। 1935 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया। दक्षिण कलकत्ता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण देने पर 24 मई 1939 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कलकत्ता के चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के सामने लोहिया ने खुद अपने मुकदमे की पैरवी आैर बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया।
   दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में दिए भाषण के कारण 11 मई 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की धारा 38 के तहत उन्हंे दो साल की सजा हुई। लोहिया देश के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए थे कि उस समय गांधी जी ने कहा था कि 'जब तक राम मनोहर लोहिया जेल में हैं मैं खामोश नहीं रह सकता। उनसे ज्यादा बहादुर आैर सरल आदमी मुझे मालूम नहीं।" चार दिसम्बर 1941 को अचानक लोहिया को रिहा कर दिया गया।
   आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ ही लोहिया व नेहरू में मतभेद पैदा हो गए थे आैर 1942 में इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में यह बात जगजाहिर हो गई। इस अधिवेशन में लोहिया ने पंडित जवाहर लाल नेहरू का खुलकर विरोध किया। इसके बाद अल्मोड़ा में जिला सम्मेलन में लोहिया ने नेहरू को 'झट से पलटने वाला नट" कहा।
   1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन" छेड़ने पर 9 अगस्त 1944 को गांधी जी व अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के बाद लोहिया ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन का नेतृत्व किया। 20 मई, 1944 को लोहिया को बंबई से गिरफ्तार कर लिया गया आैर लाहौर जेल की उस कोठरी में रखा गया, जहां 14 वर्ष पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी। 1945 में लोहिया को आगरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। लोहिया से अंग्रेज सरकार इतनी घबराई हुई थी कि द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को तो छोड़ दिया गया, पर लोहिया को नहीं छोड़ा गया। बाद में 11 अप्रैल, 1946 को लोहिया को भी रिहा कर दिया गया।
   15 जून को लोहिया ने गोवा के पंजिम में गोवा मुक्ति आंदोलन की पहली सभा की। लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आंदोलन के शुरूआत में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 को जब देश में सांप्रदायिक दंगे भड़के तो नवाखाली, कलकत्ता, बिहार दिल्ली समेत कई जगहों पर लोहिया, गांधी जी के साथ मिलकर सांप्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशिश करते रहे। 9 अगस्त, 1947 से हिंसा रोकने का काम युद्धस्तर से शुरू हो गया। 14 अगस्त की रात को 'हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" के नारे के साथ लोहिया ने सभा की। स्वतंत्रता मिलने के बाद 31 अगस्त को वातावरण फिर बिगड़ गया। गांधी जी अनशन पर बैठ गए। उस समय लोहिया ने दंगाइयों के हथियार इकट्ठे कराए आैर उनके प्रयास से 'शांति समिति" की स्थापना हुई आैर चार सितम्बर को गांधी जी ने अनशन तोड़ दिया। देश में लोकतंत्र स्थापित करने में भी लोहिया का विशेष योगदान रहा है। आजादी मिलने के बाद लोहिया की प्रेरणा से 650 रियासतों की समाप्ति का आंदोलन समाजवादी चला रहे थे। दो जनवरी 1948 को रीवा में 'हमें चुनाव चाहिए विभाजन रद्द करो" के नारे के साथ आंदोलन किया गया।
   1962 के आम चुनाव में लोहिया, नेहरू के विरुद्ध फूलपुर में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर 1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने तिब्बत के सवाल को उठाया। 1963 को फरुखाबाद के लोकसभा उप चुनाव में लोहिया 58 हजार मतों से चुनाव जीते।  लोकसभा में लोहिया की 'तीन आना बनाम पंद्रह आना" बहस बहुत चर्चित रही। उस समय उन्होंने 18 करोड़ आबादी के चार आने पर जिंदगी काटने तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च करने का आरोप लगाया। 9 अगस्त 1965 को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।
   30 सितम्बर 1967 को लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल, जो आजकल डॉ. राममनोहर लोहिया के नाम से जाना जाता है में पौरुष ग्रंथि के ऑपरेशन के लिए भर्ती कराया गया, जहां 12 अक्टूबर 1967 को उनका निधन हो गया।

Tuesday, 15 September 2015

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने ने लिए खड़े हो जाओ

साथियों,
             लंबे समय से सरकारों के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रति चले आ रहे उपेक्षित रवैये के खिलाफ अब खड़ा होना जरूरी हो गया है। जब तक यह क्षेत्र अलग प्रदेश नहीं बनेगा तब तक यहां के लोगों का भला नहीं हो सकता। फाइट फॉर राइट व पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी ने यह बीड़ा उठाया है आैर हम लोग इस क्षेत्र को अलग प्रदेश बनवा कर ही दम लेंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 28 जिले, 29 लोकसभा व 135 विधानसभा क्षेत्र हैं। एक विशेष क्षेत्र के लोग नहीं चाहते कि यह क्षेत्र अलग प्रदेश के रूप में जाना जाए। उसका कारण इस क्षेत्र को लूटकर अपना घर भरना तथा सरकार को मिलने वाला 70-80 फीसद राजस्व है। 24 हजार करोड़ तो अकेला गौतमबुद्धनगर जिला देता है। इतना राजस्व देने के बावजूद यहां पर मात्र 15-20 फीसद विकास होता है। रोजगार के नाम पर यहां के युवाओं को ठेंगा दिखाया रहा है। अब समय आ गया है कि हर वर्ग के लोग अलग प्रदेश बनवाने के लिए उठें आैर इस आंदोलन में शामिल हों।
     पहला स्वतंत्रता संग्राम हमारे क्षेत्र मेरठ से ही शुरू हुआ। स्वभाविक है कि हमारे पूर्वज खुद्दार, स्वाभिमानी पराक्रमी आैर अत्याचार का विरोध करने वाले थे। हम लोगों को दबाने के लिए तरह-तरह से हमें परेशान किया गया। एक षड¬ंत्र के तहत लंबी दूरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट आैर लखनऊ राजधानी बनाई गई थी। यह क्षेत्र अलग प्रदेश बन जाएगा तो हाईकोर्ट व राजधानी भी हमारे क्षेत्र में होंगे तथा जो वकील भाई हाईकोर्ट की ब्राांच की मांग कर रहे हैं उनकी समस्या अपनेआप खत्म हो जाएगी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश गन्ना किसानों के नाम जाना जाता है। गन्ना किसानों की बेबसी देखिए कि वह कर्जा लेकर रात-दिन मेहनत कर फसल तैयार करते हैं आैर उसे चीनी मिल पर डाल आते हैं। भुगतान के लिए उन्हें आंदोलन करना पड़ता है। लाठी खानी पड़ती है। इन सबके बावजूद किसानों को उनका बकाया भुगतान नहीं हो पा रहा है। खरबों रुपए ब्याजमुक्त कर्जा लेने के बावजूद चीनी मिल मालिक किसानों को चक्कर कटवा रहे हैं। किसानों के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई है कि सम्पन्न क्षेत्र के नाम से जाने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी किसान आत्म-हत्या करने लगे हैं। चौधरी चरण सिंह का अलग प्रदेश बनवाने का सपना रहा है। उनके पुत्र अजीत सिंह व पौत्र जयंती चौधरी उनके नाम से राजनीति कर रहे हैं, पर जब अलग प्रदेश की बात आती है तो वह सत्तामोह में फंस जाते हैं। चौधरी चरण सिंह का असली वारिश बताने वाले मुलायम सिंह यादव अलग प्रदेश का विरोध कर रहे हैं।
साथियों पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग बनवाने की मांग 1930 में गोलमेज सम्मेलन में भी उठी थी। महात्मा गांधी, अली जिन्ना व भाई परमानंद ने इसका समर्थन किया था। 1953 में जब राज्य पुनर्गठन आयोग बना तो 97 विधायकों ने आयोग के सामने अलग राज्य की मांग उठाई थी। आयोग ने सहमति भी दी थी पर सत्तारूढ़ नेताओं ने निजी कारणों के चलते अलग राज्य नहीं बन पाया। 1978 में सोहनवीर तोमर ने अलग राज्य की मांग उठायी थी। भले ही आज सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनवाने का विरोध कर रहे हों पर 1995 में उन्होंने खुद इसकी पैरवी की थी। 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश को चार राज्य में बांटकर राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव यूपीए सरकार को भेजा था पर कुछ स्वार्थी नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य नहीं बनने दे रहे हैं। अब हमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनवाने के लिए हर कुर्बानी को तैयार रहना है आैर हम लोग अलग राज्य बनवा का ही रहेंगे।
                                     आपका अपना
                                     चरण सिंह राजपूत
                                     राष्ट्रीय अध्यक्ष, फॉइट फॉर राइट
                    राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रवक्ता, पश्चिमी उत्तर प्रदेश विकास पार्टी