Saturday, 20 December 2014

अपनों के विरोध में दिल्ली को कैसे फतह करेंगे केजरीवाल ?


        अन्ना आंदोलन के बल पर राजनीतिक वजूद बनाने वाले अरविंद केजरीवाल भले ही मात्र दो साल के संघर्ष के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए थे। भले ही दिल्ली के गत विधानसभा चुनाव में लोगों ने उन्हें पलकों पर बैठाया था। भले ही पूरे में देश में वह चर्चा का विषय बन गए थे। पर जिस तरह से आम चुनाव में आम आदमी पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के साथ ही दिग्गजों का भी अरविंद केजरीवाल पर उपेक्षा का आरोप लगाना, उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री पद के लिए लालायित होना। वोटबैंक के लिए भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा साम्प्रदायिकता बताना। उनके खिलाफ आम आदमी सेना का गठन किया जाना। ये सब मुद्दे इन विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ी दिक्कतें लेकर आ रहे हैं। ऐसे में जब कुमार विश्वास, साजिया इल्मी, प्रभात कुमार जैसे दिग्गज  उनके खिलाफ हो गए हों। योगेंद्र यादव राजनीति में कुछ खास दिलचस्पी न ले रहे हों, तब वह कैसे दिल्ली फतह करेंगे यह समझ से बाहर है। वैसे भी आम चुनाव में जिस तरह से उन्होंने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर सेलिब्रिटी को तवज्जो दी थी उससे उनकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगना स्वभाविक है।
       इन चुनाव में यह बात मुख्य रूप से देखी जा रही है कि अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की गलती स्वीकार कर रहे हैं आैर इसके लिए लोगों से माफी भी मांग रहे हैं। दरअसल अरविंद केजरीवाल को अब तक की गई गलतियों का अहसास हो गया है। उनकी समझ में आ गया है कि उनकी अति महत्वाकांक्षा के चलते देश में जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी में राजनीति के प्रति रुझान पैदा हुआ था वह धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। उनकी समझ में आ गया है कि अन्ना आंदोलन के बाद उनकी गलतियों का फायदा भाजपा उठा ले गई। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में करारी शिकस्त के बाद उनकी समझ में आ गया कि संघर्ष के साथियों की उपेक्षा उन पर भारी पड़ी। उनकी समझ में आ गया है कि बिना समर्पित कार्यकर्ताओं आैर संगठन के राजनीति नहीं की जा सकती है। उनकी समझ में आ गया है कि काम को धरातल पर लाए बिना जनता का विश्वास लंबे समय तक कायम नहीं रखा जा सकता है। उनकी समझ में आ गया है कि कुछ विशेष लोगों के पार्टी को कब्जाने का नतीजा क्या होता है। उनकी समझ में आ गया है कि उनकी मनमानी के चलते योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास आैर साजिया इल्मी जैसे विचारवान नेताओं को उनकी नीतियों की आलोचना करनी पड़ी। उनकी समझ में आ गया है कि यदि पंजाब में उन्हें चार सीटें न मिली होती तो वह जनता का मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचते। उनकी समझ में आ गया है कि दिल्ली की सत्ता छोड़कर केंद्र की सत्ता की ललक ने दिल्ली के लोग भी उनसे नाराज कर दिए।
      ऐसे में प्रश्न उठता है कि अरविंद केजरीवाल पर से कम हुआ जनता का विश्वास फिर से कैसे बनाया जाएगा ? जिस व्यक्ति की नीतियों का विरोध अब उसके संगठन में ही होने लगा हो। जिस दल को छोड़कर कई नेता घर बैठ गए हों पर जिस दल के मुखिया पर तानाशाह का आरोप लगाकर बागी कार्यकर्ताओं ने आम आदमी सेना बना ली। जिस दल में दो  राष्ट्रीय नेता योगेंद्र यादव आैर नवीन जयहिंद का विवाद राजनीतिक गलियारे में गूंजा हो, जिस दल में योगेंद्र यादव पर अरविंद केजरीवाल के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले मनीष सिसोदिया ने खुले रूप से अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक रूप से खत्म करने का आरोप लगा दिया हो उस दल पर जनता अब कैसे विश्वास करेगी ?
      अरविंद केजरीवाल के अब तक के राजनीतिक करियर की बात करें तो उनमें  राजनीतिक रूप से असुरक्षा की भावना देखी गई है। आम आदमी पार्टी से विभिन्न दलों के अच्छे छवि के लोग जुड़ना चाहते थे पर उन्होंने उन्हें सटाया तक नहीं। यदि इक्का-दुक्का लिए भी तो खास तवज्जो नहीं दी। जैसे कि कांग्रेस से छोड़कर आप में अलका लांबा को पार्टी में कोई खास तवज्जो नहीं दी गई। कभी भाजपा में रहे निर्दलीय पार्षद से आप में आकर विधायक बने विनोद कुमार बिन्नी को कितनी फजीहत झेलनी पड़ी। विनोद कुमार बिन्नी के मामले में किसी विधायक को लोकसभा का टिकट न देने की बात करने वाले अरविंद केजरीवाल खुद वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़े आैर राखी बिडलान को पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ाया। आवेदन के नाम पर टिकट देने का वादा करने वाले अरविंद केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने आम चुनाव में आवेदनों को कचरे की टोकरी में डालकर सेलिब्रिटी आैर विशेष लोगों को ही टिकट दिए। उनके पार्टी के ही कार्यकर्ताओं ने उन पर आरोप लगाए कि पार्टी के खड़ी होते ही वह पुराने साथियों को भूल गए आैर पैसे वाले नेताओं को तवज्जो देने लगे। मुंबई में उन्होंने 20,000 रुपए देने वाले लोगों के साथ डिनर किया। मुस्लिम वोटबैंक के लिए उन्हें साम्प्रदायिकता भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा दिखाई देने लगा। ऐसे में जनता को फिर से विश्वास में लेना अरविंद केजरीवाल के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी।

Friday, 21 November 2014

ये कैसा समाजवाद है नेताजी ?

    यदि आज कहीं से डॉ. राम मनोहर लोहिया रामपुर शहर को देख रहे होंगे तो निश्चित रूप से वे बहुत दुखी होंगे। वह सोच रहे होंगे कि उन्होंने देश को कैसे समाजवादी नेता दे दिए, जो जनता के दुख-दर्द को भूलकर जनता के खून-पसीने की कमाई फिजूलखर्ची पर उड़ा रहे हैं। जी हां मैं बात कर रहा हूं रामपुर में आजम खां द्वारा शाही अंदाज में मनाए जा रहे सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के जन्म दिन की।
     किसी बीमार प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया का शाही अंदाज में जन्मदिन मनाया जाना अपने आप में प्रश्न खड़ा करता है। एक ओर जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने का बकाया भुगतान न होने पर बड़े स्तर पर किसान अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं अपनी बेटियों की शादियां लगातार टाल रहे हैं। गुस्से में गन्ना जला रहे हैं। आत्मदाह का प्रयास कर रहे हैं। आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। रोजगार न मिलने पर बड़े स्तर पर युवा दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इसी क्षेत्र के एक मंत्री के जिले में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया का जन्म दिन शाही अंदाज में मनाया जा रहा है। अपने को लोहिया का अनुयायी बताने वाले उनके पुत्र प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूरे जोश-खरोश के साथ इस जश्न में शामिल हो रहे हैं।
   नेताजी यदि आपको याद हो तो लोहिया जी खाना भी कार्यकर्ताओं के साथ ही खाना पसंद करते थे। शाही अंदाज तो बहुत दूर की बात है। बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव आैर उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए लंदन से विक्टोरिया बग्घी मंगाई गई है। ग्यारह किलोमीटर ये दोनों इस बग्गी पर बैठकर जाएंगे। पूरे ग्यारह किलोमीटर तक कालीन बिछाई गई है, जगह-जगह उनके स्वागत की तैयारी है। फूलों की वर्षा इन नेताओं पर होगी। सपा के सभी विधायकों आैर सांसदों को इनके स्वागत में लगाया गया है। रामपुर को दुल्हन की  तरह सजाया गया है। नाच-गाने की पूरी व्यवस्था है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि इस जश्न में पानी की तरह बहाया जा रहा पैसा आखिरकार आया कहां से ? बात-बात पर किसानों, मजदूरों, व गरीबों की पैरवी करने का दावा करने वाले मुलायम सिंह यादव इस तरह से शाही अंदाज में जन्म दिन मनाकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं ? या फिर यदि उन्हें खुश करने के लिए आजम खां इतने बड़े स्तर पर फिजूलखर्ची कर रहे हैं तो उन्होंने प्रदेश के गरीबों का हवाला देते हुए इस फिजूलखर्ची को रोका क्यों नहीं ? यह मान भी लिया जाए कि यह खर्च मौलाना अली जौहर विवि उठा रहा है तो क्यों उठा रहा है ? क्या यह पैसा गरीब बच्चों का भविष्य संवारने के लिए खर्च नहीं हो सकता था। या यह माना जाए कि आजम खां अपनी पत्नी को राज्यसभा में भेजने का नेताजी का अहसान इस रूप में उतार रहे हैं। मुलायम सिंह यादव के ग्लैमर में डूबने के पीछे कभी उनके सारथी रहे अमर सिंह का नाम लिया जाता रहा है आैर ये ही आजम खां इसका खुला विरोध करते रहे हैं। अब इस शाही जश्न में ये ताम-झाम तो खुद आजम खां ही कर रहे हैं आैर वह अपने को खांटी समाजवादी भी मानते हैं।
     आज नेताजी के समाजवाद का यह रूप देखकर मैं यह लेख इसलिए भी लिख रहा हूं कि मैं खुद राजनीतिक रूप से मैं लोहिया जी का अनुयायी हूं। मैंने डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, मधु लिमये, चौधरी चरण सिंह पर काफी अध्ययन किया है। कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव लोहिया जी के संघर्ष आैर नीतियों से बहुत प्रभावित थे। चौधरी चरण सिंह ने खुद आपको राजनीतिक रूप से गढ़ा था। आपको चौधरी चरण सिंह का असली वारिश माना जाता है। अब जब आपको पूरी तरह से देश व समाज के लिए समर्पित हो जाना चाहिए था तब आप चाटुकारों से घिरकर विरोधियों को बोलने का मौका दे रहे हैं। मैंने पढ़ा है सुना है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया जी ने दो-कुर्ते पाजामे में अपनी पूरी जिंदगी काट दी आैर आज के कितने समाजवादी नेता ऐसे हैं जो उन्हीं की ही देन हैं।
    भले ही लोहिया जी ने शादी न की हो पर उन्होंने पूरे राजनीतिक जीवन में अपने किसी परिजन को सटाया तक नहीं। चौधरी चरण सिंह की 27 बीघा जमीन समाजसेवा में बिक गई थी। आचार्य नरेंद्र देव का आैर लोक नायक जयप्रकाश का संघर्ष भी सर्वविदित है। क्या इनमें से किस समाजवादी नेता ने अपना जन्मदिन इस तरह से शाही अंदाज में मनाया था ? आपको, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, शरद यादव, राम विलास पासवान को इन समाजवादियों ने तैयार किया। आज की तारीख में दूसरी लाइन के समाजवादी नेता अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, धर्मेंद्र यादव, चिराग पासवान, मीसा यादव, जयंत चौधरी, दुष्यंत चौटाला, उमर अब्दुल्ला माने जाते हैं। ये सब वंशवाद की देन हैं। क्या इन नेताओं के बलबूते जेपी आंदालन जैसा आंदोलन किया जा सकता है ?

Saturday, 8 November 2014

आखिर कब तक पिसते रहेंगे किसान

    भले ही केंद्र सरकार अच्छे दिन के कितने दावे करती फिरे। भले ही प्रधानमंत्री अमरीका तक भारत के झंडे गाड़ने की बात करें। भले ही महात्मा गांधी जयंती पर स्वच्छ भारत का अभियान छेड़ा जाए। भले ही पटेल जयंती पर राष्ट्रीय एकता की बात की जाए। भले ही नेहरू जयंती पर बाल स्वच्छता कार्यक्रम की बात कही जा रही हो। भले ही केेंद्र के साथ ही राज्य सरकारें अपनी उपलब्धियों पर एेंठती फिर रही हों पर जमीनी हकीकत यह है कि तमाम योजनाओं के बावजूद देश के किसानों का कोई भला होता नहीं दिख रहा है।
     रात दिन मेहनत करने के बाद भी फसल की लागत नहीं निकल पा रही है। तमाम दावों के बावजूद किसानों की आत्महत्याओं में कमी नहीं हो पा रही है। अभी तक तो आंध्र प्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड में ही आत्महत्या की बातें ज्यादा सामने आती थीं पर आजकल तो खेती के मामले में सम्पन्न क्षेत्र माने जाने वाले वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश आैर हरियाणा में भी इस तरह के मामले देखने को मिल रहे हैं। गत दिनों मेरठ के एक किसान ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि एक निजी चीनी मिल पर तीन लाख बकाया भुगतान न होने की वजह से वह अपनी बहन के कैंसर का इलाज नहीं करवा पा रहा था। हरियाणा के करनाल में भी एक किसान ने आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या कर ली। किसानों का भला करने वाली भाजपा सरकार में धान गत साल से भी कम दाम पर खरीदी जा रही है।
     गन्ना किसानों की हालत तो कुछ ज्यादा ही खराब है। तमाम आंदोलनों के बावजूद किसानों का कई साल का बकाया भुगतान नहीं हो पा रहा है। देश की व्यवस्था देखिए कि चीनी मिलों के यूपीए सरकार से 6600 करोड़ आैर राजग से 2400 करोड़ बयाज मुक्त ऋण लेने के बावजूद किसानों का भुगतान तक नहीं किया गया है। उत्तर प्रदेश में तो किसान दोहरी मार झेलने को मजबूर हैं,  एक ओर उनका बकाया भुगतान नहीं हो पा रहा है तो दूसरी ओर गन्ना तैयार होने के बावजूद पेराई सत्र अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। स्थिति यह है कि अभी तक तो गन्ना मूल्य को लेकर ही कोई हल नहीं निकला है।
    योजनाओं के नाम पर किसानों को कैसे बेवकूफ मनाया जाता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में यूपीए सरकार में लाई गई कर्ज माफी योजना में कैग के 52,000 करोड़  की गड़बड़ी का खुलासा करने के बावजूद न तो बैंकों का कुछ बिगड़ा है आैर न ही गलत तरीका अपनाकर योजना का लाभ उठाने वालों का। किसान जो ठगे गए उसका तो कोई जवाब किसी के पास है ही नहीं। किसी कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता है कि देश का किसान खेती से मुंह मोड़ने लगा है। प्रधानमंत्री भले ही विभिन्न समारोह में किसानों के भले की बात कर रहे हों पर अभी तक किसानों के हित में कोई खास जमीनी कदम नहीं उठाया गया है। अब तक उनकी हर योजना हर काम पूंजीपतियों के इर्द-गिर्द घूमते नजर आ रहे हैं। यह सरकार किसानों की हितैषी है या फिर पूंजीपतियों की यह बात इससे ही समझ में आ जाती है कि लगभग छह लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त सब्सिडी की व्यवस्था कारपोरेट के लिए की जा रही है, जबकि किसानों के लिए आम बजट में मात्र 30 हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। सरकार की कार्यशैली तो देखिए कि सरकार ने श्रमेव जयते कार्यक्रम शुरू तो किया पर उसमें श्रमिकों को नहीं बल्कि पूंजीपतियों को बुलाया गया था।
     केंद्र सरकार ने फसल विविधीकरण की ओर प्रोत्साहित करने का तर्क देते हुए जिस तरह से राज्य सरकारों को इस साल गेहूं आैर धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बोनस की घोषणा न करने के निर्देश दिए हैं, उसमें भले ही किसानों का हित जुड़ा हो पर तरीका गलत लग रहा है। केंद्र सरकार के इस निर्देश ने न केवल राज्यों सरकारों पर दबाव बनाया है बल्कि किसानों को भी परेशानी में डाल दिया है। इसे केंद्र की चेतावनी ही माना जाएगा कि यदि विकेंद्रित खरीद करने वाले राज्य चावल आैर गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस की घोषणा करते हैं तो केद्र सिर्फ उतने ही अनाज की खरीद के लिए सब्सिडी प्रदान करेगा, जितनी जरूरत सार्वजनिक वितरण प्रणाली आैर लोक कल्याण की योजनाओं के लिए है। केंद्र की इस चेतावनी का उत्तर प्रदेश सरकार पर असर भी पड़ा। उत्तर प्रदेश सरकार ने गत दिनों विधानसभा में एक सवाल के दौरान बताया कि सरकार 1400 रुपए प्रति क्विंटल की दर से किसानों से सीधे गेहूं खरीदेगी आैर उस पर बोनस नहीं देगी। मध्य प्रदेश सरकार तो गेहूं पर प्रति क्विंटल 200 रुपए बोनस दे रही थी। इससे वहां पर खेती का फीसद भी बढ़ा था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि फसलों का विविधिकरण तो जब होगा तब होगा पर किसानों को तो इस साल से ही नुकसान होना शुरू हो गया है। जबकि होना यह चाहिए कि पहले देश के हर क्षेत्र में मिट्टी की जांच हो तथा जहां की मिट्टी जिस फसल के लिए उपजाऊ हो, उस फसल के लिए वहां के किसानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए आैर उन्हें प्रशिक्षण देकर संसाधन उपलब्ध कराने के बाद धीरे-धीरे फसल का विविधीकरण किया जाए। स्थिति यह है कि एक ओर सरकार 100 स्मार्ट सिटी बनाने की बात कर रही है तो दूसरी ओर जोत का रकबा लगाातार कम हो रहा है।

Sunday, 12 October 2014

खुद्दारी व संघर्ष के पर्याय थे लोहिया

पुण्यतिथि  (12 अक्टूबर) पर विशेष
        जब हमारे देश में समाजवाद बात होती है तो डा. राम मनोहर लोहिया का चेहरा आंखों के सामने आने लगता है। वह लोहिया ही थे, जिन्होंने 50 के दशक में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। डा. लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए 70  के दशक में इमरजेंसी के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश की अगुआई में समाजवादियों ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाला था। वह लोहिया की ही विचारधारा थी कि बिहार से लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे दिग्गज देश की राजनीतिक प्रष्ठभूमि पर छाए। मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए अपने दम पर कई साल तक उत्तर प्रदेश पर राज किया और अब उनके पुत्र अखिलेश यादव पिता के साथ मिलकर समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि आजकल समाजवादियों पर वंशवाद का आरोप लग रहा है
        आज की राजनीति में भले ही समाजवादी अपनी विचारधारा से भटक गए हों पर शुरूआती दौर में समाजवादी जितने ईमानदार थे उतने ही खुद्दार भी। जहां तक डा. लोहिया की बात है वह कितने खुद्दार थे,  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके पिता का निधन हुआ तो वह भारत छोड़ो आन्दोलन के चलते आगरा जेल में बंद थे। इस विकट परिस्तिथि में भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार की कृपा पर पैरोल पर छुटने से इनकार कर दिया था। देशभक्ति व ईमानदारी लोहिया को विरासत में मिली थी। उनके पिता श्री हीरालाल एक सच्चे देशभक्त अध्यापक थे।  लोहिया का  समाजवाद व संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था।  जब लोहिया ढाई वर्ष के थे तो उनकी माता चंदादेवी का देहांत हो गया और उनकी दादी व नैन ने उनका पालन-पोषण किया ।  गांधी जी के विराट व्यक्त्तिव का असर लोहिया पर बचपन से ही हो गया था। दरअसल उनके  पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे और जब उनसे मिलने जाते तो लोहिया को अपने साथ ले जाते।  वैसे तो राजनीति का पाठ लोहिया जी ने गांधी जी से बचपन से ही सिखाना शुरू कर दिया था पर सक्रिय रूप से वह 1918 में अपने पिता के साथ पहली बार अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए।  पहली हड़ताल उन्होंने लोकमान्य गंगाधर तिलक के निधन के दिन अपने विद्यालय के लड़कों के साथ 1920  में की। 1921 में फैजाबाद किसान आन्दोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू से उनकी पहली बार मुलाक़ात हुई।  युवाओं में लोहिया की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्त थी कि कलकत्ता में अखिल बंग विधार्थी परिषद के सम्मलेन में  सुभाष चन्द्र बोश के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता की।
      लोहिया से उनका समाज इतना प्रभावित था कि 1930 को अपने कोष से उन्हें पढ़ने के लिया विदेश भेजा।  लोहिया पढ़ाई करने के  लिए बर्लिन गए। वह लोहिया ही थे कि जिन्होंने बर्लिन में हो रही लीक आफ नेशंस की बैठक में भगत सिंह को फांसी दिए जाने विरोध में सिटी बजाकर दर्शक दीर्घा से इसका विरोध प्रकट किया। लोहिया ने किन परिस्तिथियों ने देश और समाज के लिया संघर्ष किया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब 1933 में वह समुद्री जहाज से मद्रास के लिए चले तो रास्ते में ही उनका सामान जब्त कर लिया गया। मद्रास पहुंचने के बाद लोहिया हिन्दू अखबार के दफ्तर पहुंचे और दो लेख लिखकर 25 रूपये कमाए और इनसे कलकत्ता पहुंचे।  कलकत्ता से बनारस पहुंचकर उन्होंने मालवीय जी से मुलाकात की।  मालवीय जी ने उन्ही रामेश्वर दास बिडला से मिलाया, जिन्होंने लोहिया को नोकरी का प्रस्ताव दिया पर दो हफ्ते रहने के बाद उन्होंने बिडला जी का निजी सचिव बनने इनकार कर दिया।
     17 मई 1934 को पटना में आचार्य  नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हाल में इकट्ठे हुए जहां पर समाजवादी पार्टी की स्थापना का निर्णय लिया गया। लोहिया जी ने समाजवादी आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की और पार्टी दे उद्देश्यों में पूर्ण स्वराज्य लक्ष्य को जोड़ने का संशोधन पेश किया पर उसे अस्वीकार कर दिया गया। बाद में 21 अक्टूबर 1934 को बम्बई के रेडिमनी टेरेस में 150 समाजवादियों  ने इकट्ठा होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना  की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए और पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए। 1935 में जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री  नियुक्त किया गया।  दक्षिण कलकत्ता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण देने पर 24 मई 1939 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।  कलकत्ता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट के सामने लोहिया ने खुद अपने मुकदमे की पैरवी और बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया।
    दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में विवादित भाषण का आरोप लगाकर 11 मई 1940 को  उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की 38 के तहत उन्हें दो साल की सजा हुई।  लोहिया देश के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए थे कि उस समय गांधी जी ने कहा था कि जब तक राम मनोहर लोहिया जेल में हैं तब तक खामोश नहीं रहा जा  सकता।  उनसे ज्यादा बहादुर और सरल आदमी मुझे मालुम नहीं। चार दिसंबर 1941 को लोहिया को रिहा कर दिया गया। 
    आन्दोलन के जोर पकड़ने के साथ ही लोहिया व नेहरु में मतभेद पैदा हो गए थे।1942 में इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में यह बात जगजाहिर हो गई। इस अधिवेशन में लोहिया ने पंडित जवाहर लाल नेहरू का खुलकर विरोध किया।  इसके बाद अल्मोड़ा में जिला सम्मेलन में लोहिया ने नेहरू को झट से पलटने वाला नट कहा।
    भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ने पर 9 अगस्त 1944 को गांधी जी व अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के बाद लोहिया ने भूमिगत रहते हुए आन्दोलन की अगुआई की।  20 मई 1944 को लोहिया को बम्बई से गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर जेल की उस कोठरी में रखा गया, जहां 14 वर्ष पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी।  1945 में लोहिया  को आगरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।  लोहिया से अंग्रेज सरकार इतने घबराई हुई थी की द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को तो छोड़ दिया गया, पर लोहिया को नहीं छोड़ा गया।  बाद में 11 अप्रैल , 1946 को लोहिया को भी रिहा कर दिया गया।
       15  जून को लोहिया ने गोवा के पंजिम में गोवा मुक्ति आन्दोलन की पहली सभा की।  लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आन्दोलन के शुरुआत में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 को जब देश में सांप्रदायिक  दंगे भड़के तो नवाखली, कलकत्ता, बिहार दिल्ली समेत की जगहों पर लोहिया गांधी जी के साथ मिलकर साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशीश करते रहे।  9  अगस्त, 1947 से ही हिंसा रोकने का प्रयास युद्धस्तर से शुरू हो गया।  14  अगस्त की रात  को हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई के नारे के साथ लोहिया ने सभा की। स्वतंत्रता मिलने के बाद 31 अगस्त को वातावरण फिर से भड़क गया ।  गांधी जी अनशन पर बैठ गए।     उस समय लोहिया ने दंगाइयों के हथियार इकट्ठे कराए और उनके प्रयास से शांति समिति की स्थापना हुई चार सितम्बर  को गांधी जी ने अनशन  तोड़ दिया। देश में लोकतंत्र स्थापित करने में लोहिया का विशेष  योगदान रहा है। आजादी मिलने के बाद लोहिया की प्रेरणा से 650 रियासतों की समाप्ति का आन्दोलन समाजवादी चला थे ।  दो जनवरी 1948  को रीवा में हमें चुनाव चाहिए।  विभाजन रद्द करो के नारे के साथ आन्दोलन किया गया।
      1962 के आम चुनाव में लोहिया, नेहरु के विरुद्ध फूलपुर में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर  1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने तिब्बत  के सवाल को उठाया। 1963  को फरुखाबाद के  चुवाव में लोहिया 58 हजार मतों चुनाव जीते। उस समय लोकसभा में लोहिया की तीन आना बनाम पन्द्रह आना बहस बहुत चर्चित रही।  उन्होंने  कहा था कि 18 करोड़ आबादी  चार आने पर जिन्दगी काटने को मजबूर है तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च होते हैं।  9 अगस्त 1965  को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।
     30  सितम्बर 1967 लोहिया को नई  दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल जो आजकल डा. राम मनोहर लोहिया के नाम से जाने जाता है में पौरुष ग्रंथि के आप्रेशन के लिए भर्ती कराया गया।  इलाज के दौरान 12 अक्टूबर 1967 को  यह समाजवादी पुरोधा हमें छोड़कर चला गया।