Friday, 25 October 2013

कहीं नई पीढ़ी के लिए कहानी न बनकर रह जाए खेत-खलिहान

    जिस तरह से नई पीढ़ी खेती में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। आधुनिकता की दौड़ में शामिल हो रहे युवाओं को खेती की बुनियादी जानकारी नहीं है। किसान का बेटा भी खेती से मुंह मोड़ रहा है। जोत के जमीन कम होती जा  रही है । ऐसे हालात में खेती को लाभ का कारोबार बनाकर युवा पीढ़ी को न रिझाया गया तो कहीं ऐसा न हो जाए कि नई पीढ़ी के लिए खेत-खलिहान कहानी बनकर ही रह जाए।  यह खेती के प्रति किसानों का बदलता नजररिया ही है कि अब वह या तो मजदूरों के बलबूते खेती कर रहा है या फिर अपनी जमीन बटाई पर दे देता है या फिर ठेके पर। यह सब किसान दिल से नहीं कर रहा है बल्कि खेती से उसकी लागत भी  न निकलने की वजह से उसे ऐसा करना पड़  रहा है । किसानों के बच्चों के सामने भी बड़ी परेशानी हैं कि गांव की राजनीति इतनी गन्दी हो चुकी है कि वहां रहना उनके लिए मुश्किल हो गया है। यही सब वजह है कि गावों के भी अधिकतर बच्चे शहरों में रहकर पढ़ रहे हैं, जो कुछ बच्चे गावों में हैं भी उनका दूर-दूर तक खेती से कोई वास्ता नहीं। ऐसा भी नहीं हैं कि किसानों के बच्चे खेती नहीं करना चाहते हैं। दरअसल देती में लगातार हो रहा घाटा उन्हें खेती से मोहभंग के लिए मजबूर कर रहा है। मेरा मानना है कि इन सबसे बावजूद किसान के बेटे को खेती से बिल्कुल ही कट नहीं जाना चाहिए। खेती उसके पूर्वजों की पहचान है।  जो कुछ जमीन भी बची है उसे संभाल के रखना है।
      एक समय था कि किसान का बेटा पढ़ने के साथ ही खेती में भी हाथ बंटाता था। उसका बचपन खेत-खलियान में ही बीतता था। कैसे फसल तैयार होती है, कैसे काटी जाती हैं। क्या-क्या परेशानी, उसे तैयार करने में आती है ये सब जानकारी उसे होती थी। यही सब कारण होते थे कि भले ही वह किसी क्षेत्र में चला जाए पर किसान की परेशानी नहीं भूलता था। आज के हालात में कहने को तो हर क्षेत्र में किसानों के बेटे हैं पर कोई किसानों के प्रति चिंतित नहीं दिखाई नहीं देता। ऐसा भी नहीं है कि किसानों से इन्हें कोई लगाव न रहा हो रहा हो। दरअसल इन्हें किसानों की समस्याओं के बारे में पता ही नहीं और न ही ये जानना  चाहते हैं। इसमें कहीं न कहीं अभिभावक भी दोषी हैं। आधुनिकता की दौड़ का हवाला देते हुए ये लोग बच्चों को गांव भेजते ही नहीं। आज के बच्चों के लिए फावड़ा, हल, कुदाल, खुरपी, दरांती जैसे खेती के यन्त्र अजीबो-गरीब शब्द हैं। रबी व खरीब की फसल में क्या-क्या पैदावार होती है। यह अच्छे से अच्छे पढ़े लिखे बच्चों को जानकारी नहीं। खेत व खलियान में क्या अंतर है, यह बच्चों से पूछकर देखो ? खेती के प्रति उनकी सोच का पता आपको चल जाएगा। खेती के प्रति नई पीढ़ी का मोहभंग सुनना भले ही आसान सा लग रहा हो  पर यदि समय रहते सरकार ने किसानों की समस्याओं पर ध्यान न दिया तो इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं।

Friday, 11 October 2013

खुद्दारी व संघर्ष के पर्याय थे लोहिया

(पुण्यतिथि 12 अक्टूबर पर विशेष)
        जब हमारे देश में समाजवाद बात होती है तो डा. राम मनोहर लोहिया का चेहरा आंखों के सामने आने लगता है। वह लोहिया ही थे, जिन्होंने 50 के दशक में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। डा. लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए 70  के दशक में इमरजेंसी के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश की अगुआई में समाजवादियों ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाला था। वह लोहिया की ही विचारधारा थी कि बिहार से लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे दिग्गज देश की राजनीतिक प्रष्ठभूमि पर छाए। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए अपने दम पर कई साल तक उत्तर प्रदेश पर राज किया और अब उनके पुत्र अखिलेश यादव पिता के साथ मिलकर समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि आजकल जहां समाजवादियों पर वंशवाद का आरोप लग रहा है वहीं लालू प्रसाद चारा घोटाले में जेल में बंद हैं।
        आज की राजनीति में भले ही समाजवादी अपनी विचारधारा से भटक गए हों पर शुरूआती दौर में समाजवादी जितने ईमानदार थे उतने ही खुद्दार भी। जहां तक डा. लोहिया की बात है वह कितने खुद्दार थे,  इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके पिता का निधन हुआ तो वह भारत छोड़ो आन्दोलन के चलते आगरा जेल में बंद थे। इस विकट परिस्तिथि में भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार की कृपा पर पेरोल पर छुटने से इनकार कर दिया था। देशभक्ति व  ईमानदारी लोहिया को विरासत में मिली थी। उनके पिता श्री हीरालाल एक सच्चे देशभक्त अध्यापक थे।  लोहिया का  समाजवाद व संघर्ष बचपन से ही शुरू हो गया था।  जब लोहिया ढाई वर्ष के थे तो उनकी माता चंदादेवी का देहांत हो गया और उनकी दादी व नैन ने उनका पालन-पोषण किया ।  गांधी जी के विराट व्यक्त्तिव का असर लोहिया पर बचपन से ही हो गया था। दरअसल उनके  पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे और जब उनसे मिलने जाते तो लोहिया को अपने साथ ले जाते।  वैसे तो राजनीति का पाठ लोहिया जी ने गांधी जी से बचपन से ही सिखाना शुरू कर दिया था पर सक्रिय रूप से वह 1918 में अपने पिता के साथ पहली बार अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए।  पहली हड़ताल उन्होंने लोकमान्य गंगाधर तिलक के निधन के दिन अपने विद्यालय के लड़कों के साथ 1920  में की। 1921 में फैजाबाद किसान आन्दोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरु से उनकी पहली बार मुलाक़ात हुई।  युवाओं में लोहिया की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्त थी कि कलकत्ता में अखिल बंग विधार्थी परिषद के सम्मलेन में  सुभाष चन्द्र बोश के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता की।
      लोहिया से उनका समाज इतना प्रभावित था कि 1930 को अपने कोष से उन्हें पढ़ने के लिया विदेश भेजा।  लोहिया पढ़ाई करने के  लिए बर्लिन गए। वह लोहिया ही थे कि जिन्होंने बर्लिन में हो रही लीक आफ नेशंस की बैठक में भगत सिंह को फांसी दिए जाने विरोध में सिटी बजाकर दर्शक दीर्घा से इसका विरोध प्रकट किया। लोहिया ने किन परिस्तिथियों ने देश और समाज के लिया संघर्ष किया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब 1933 में वह समुद्री जहाज से मद्रास के लिए चले तो रास्ते में ही उनका सामान जब्त कर लिया गया। मद्रास पहुंचने के बाद लोहिया हिन्दू अखबार के दफ्तर पहुंचे और दो लेख लिखकर 25 रूपये कमाए और इनसे कलकत्ता पहुंचे।  कलकत्ता से बनारस पहुंचकर उन्होंने मालवीय जी से मुलाकात की।  मालवीय जी ने उन्ही रामेश्वर दास बिडला से मिलाया, जिन्होंने लोहिया को नोकरी का प्रस्ताव दिया पर दो हफ्ते रहने के बाद उन्होंने बिडला जी का निजी सचिव बनने इनकार कर दिया।
     17 मई 1934 को पटना में आचार्य  नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हाल में इकट्ठे हुए जहां पर समाजवादी पार्टी की स्थापना का निर्णय लिया गया। लोहिया जी ने समाजवादी आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की और पार्टी दे उद्देश्यों में पूर्ण स्वराज्य लक्ष्य को जोड़ने का संशोधन पेश किया पर उसे अस्वीकार कर दिया गया। बाद में 21 अक्टूबर 1934 को बम्बई के रेडिमनी टेरेस में 150 समाजवादियों  ने इकट्ठा होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना  की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए और पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए। 1935 में जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री  नियुक्त किया गया।  दक्षिण कलकत्ता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण देने पर 24 मई 1939 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।  कलकत्ता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट के सामने लोहिया ने खुद अपने मुकदमे की पैरवी और बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया।
    दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में विवादित भाषण का आरोप लगाकर 11 मई 1940 को  उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की 38 के तहत उन्हें दो साल की सजा हुई।  लोहिया देश के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए थे कि उस समय गांधी जी ने कहा था कि जब तक राम मनोहर लोहिया जेल में हैं तब तक खामोश नहीं रहा जा  सकता।  उनसे ज्यादा बहादुर और सरल आदमी मुझे मालुम नहीं। चार दिसंबर 1941 को लोहिया को रिहा कर दिया गया। 
    आन्दोलन के जोर पकड़ने के साथ ही लोहिया व नेहरु में मतभेद पैदा हो गए थे।1942 में इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में यह बात जगजाहिर हो गई। इस अधिवेशन में लोहिया ने पंडित जवाहर लाल नेहरु का खुलकर विरोध किया।  इसके बाद अल्मोड़ा में जिला सम्मेलन में लोहिया ने नेहरु को झट से पलटने वाला नट कहा।
    भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ने पर 9 अगस्त 1944 को गांधी जी व अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के बाद लोहिया ने भूमिगत रहते हुए आन्दोलन की अगुआई की।  20 मई 1944 को लोहिया को बम्बई से गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर जेल की उस कोठरी में रखा गया, जहां 14 वर्ष पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी।  1945 में लोहिया  को आगरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।  लोहिया से अंग्रेज सरकार इतने घबराई हुई थी की द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को तो छोड़ दिया गया, पर लोहिया को नहीं छोड़ा गया।  बाद में 11 अप्रैल , 1946 को लोहिया को भी रिहा कर दिया गया।
       15  जून को लोहिया ने गोवा के पंजिम में गोवा मुक्ति आन्दोलन की पहली सभा की।  लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आन्दोलन के शुरुआत में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 को जब देश में सांप्रदायिक  दंगे भड़के तो नवाखली, कलकत्ता, बिहार दिल्ली समेत की जगहों पर लोहिया गांधी जी के साथ मिलकर साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशीश करते रहे।  9  अगस्त, 1947 से ही हिंसा रोकने का प्रयास युद्धस्तर से शुरू हो गया।  14  अगस्त की रात  को हिन्दू मुस्लिम भाई-भाई के नारे के साथ लोहिया ने सभा की। स्वतंत्रता मिलने के बाद 31 अगस्त को वातावरण फिर से भड़क गया ।  गांधी जी अनशन पर बैठ गए।     उस समय लोहिया ने दंगाइयों के हथियार इकट्ठे कराए और उनके प्रयास से शांति समिति की स्थापना हुई चार सितम्बर  को गांधी जी ने अनशन  तोड़ दिया। देश में लोकतंत्र स्थापित करने में लोहिया का विशेष  योगदान रहा है। आजादी मिलने के बाद लोहिया की प्रेरणा से 650 रियासतों की समाप्ति का आन्दोलन समाजवादी चला थे ।  दो जनवरी 1948  को रीवा में हमें चुनाव चाहिए।  विभाजन रद्द करो के नारे के साथ आन्दोलन किया गया।
      1962 के आम चुनाव में लोहिया, नेहरु के विरुद्ध फूलपुर में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर  1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने तिब्बत  के सवाल को उठाया। 1963  को फरुखाबाद के  चुवाव में लोहिया 58 हजार मतों चुनाव जीते। उस समय लोकसभा में लोहिया की तीन आना बनाम पन्द्रह आना बहस बहुत चर्चित रही।  उन्होंने  कहा था कि 18 करोड़ आबादी  चार आने पर जिन्दगी काटने को मजबूर है तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च होते हैं।  9 अगस्त 1965  को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।
     30  सितम्बर 1967 लोहिया को नई  दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल जो आजकल डा. राम मनोहर लोहिया के नाम से जाने जाता है में पौरुष ग्रंथि के आप्रेशन के लिए भर्ती कराया गया।  इलाज के दौरान 12 अक्टूबर 1967 को  यह समाजवादी पुरोधा हमें छोड़कर चला गया।

Friday, 27 September 2013

कहां है गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू!

      बात उन दिनों (1993 ) की है जब मैं नॉएडा में करियर बनाने आया था। नॉएडा से मोहननगर की बस देखता तो मन उसमें चढ़ लेने को करता। दरअसल मोहननगर से बिजनौर की बस मिलती थी।  जो सीधी मेरे गांव के पास होकर निकलती थी। जब कभी घर जाने का मौका मिल जाता तो मन करता कि हवा में उड़कर अपनों में पहुंच जाऊं और समय त्योहारों का हो तो उत्साह का  आलम यह होता कि बसों में कितनी भी भीड़ हो पर घर जाना जरुर होता था, वह भी परिजनों को लिए खरीदारी करके। मीडिया से जुड़ने के बाद भी लम्बे समय तक मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। पत्रकारिता के साथ समाजसेवा से जुड़ा रहने के चलते गांव-देहात से मेरा नाता नहीं टूटा।  गांवों की मिट्टी की सोंधी खुशबु मुझे बरबस अपनी ओर खींच ही लेती।
      कई बार तो ऐसा हुआ कि मैं जब बीमार पड़ता तो नॉएडा में सही होता ही नहीं। परेशान होकर गांव की ओर निकल पड़ता, यकीन कीजिये कि ज्यों-ज्यों मेरा गांव करीब आता जाता त्यों-त्यों मेरी तबीयत ठीक होती चली जाती। किसान परिवार में पैदा होने के कारण खेत-खलिहान से मेरा बड़ा लगाव रहा है पर कुछ दिनों से गांवों में भी आया परिवर्तन लगातार निराशा पैदा कर रहा है। मैं दूसरों की तो बता नहीं सकता पर मुझे जो लगा बता रहा हूं।  कई बार जब मैं अपने परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों से मिलने को आतुर रहता तो गांव चला जाता पर वहां के माहौल देखकर न केवल निराशा होती बल्कि पीड़ा भी। लोगों का रवैया ऐसा हो गया है कि शहरों की तरह ही गांवों में भी पैसों के लिए आपाधापी का माहौल है।
    प्यार-मोहब्बत की जगह द्वेष भावना ने ले ली है। रिश्ते स्वार्थ के होते जा रहे हैं। भाईचारा, चौपाल पर हंसी के ठहाके, बड़ों का सम्मान गांवों से भी खत्म होते जा रहे हैं। तीज त्योहारों पर गांवों में भी रोनक खत्म होती जा रही है। क्या यह महंगाई की मार है या फिर पैसों को कमाने की  मारामारी। सुख-चैन गांवों से भी खत्म  होता जा रहा है। मां का आंचल, पिता का संरक्षण, बड़े भाई का स्नेह, छोटे भाई का सम्मान, बहन की सुरक्षा, दोस्ती की कद्र जैसे शब्द हमारे समाज से लगभग खत्म होने लगे हैं । यह क्या मुझे ही लग रहा है या फिर वास्तव में समाज बरबादी की ओर अग्रसर है। देश का भविष्य माने जाने वाला युवा वर्ग अपने रास्ते से भटक गया लगता है। जहां इन लोगों को देश-समाज की सोचनी चाहिए वहां काफी संख्या में युवा ग्लैमर की चकाचौं में खोकर गलत रास्ता पकड़ ले रहे हैं। ये  कहना गलत न होगा कि अब गांव की मिट्टी सोंधी खुशबु अपना अस्तित्व खोती जा रही है। महानगरों का क्या हाल है यह बताने की जरूरत नहीं हैं। तो क्या यह मान यह लिया जाए कि आपाधापी का यह आलम लगातार माहौल खराब करता रहेगा ?

Thursday, 26 September 2013

बेलगाम होते राजनीतिक दल



जनता को सुरक्षा का वादा देने के साथ विधानसभा व लोकसभा में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि खुद आपराधिक प्रवृत्ति के हों, इससे सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह स्थिति और ज्‍यादा भयावह है कि अदालत द्वारा सजा देने के बावजूद सरकार इनका बचाव करे। सरकार के जनप्रतिनिधि कानून में संशोधन करने के लिए कैबिनेट में अध्‍यादेश पास कराने से तो ऐसा ही लग रहा है। अब यह अध्‍यादेश राष्‍ट्रपति के पास जाना है। हालांकि राष्ट्रपति महोदय ने इस मामले में नाराजगी जताई है लोकसभा में मुख्‍य विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा का भी इस मामले पर कोई ठोस रवैया नहीं है।

      बात जनप्रतिनिधि कानून में संशोधन की ही नहीं है। राजनीतिक दल तो हर व्‍यवस्‍था को अपनी ओर मोड़ने को आतुर हैं। भले ही देश व समाज हित में सर्वदलीय बैठक में एक राय न बनती हो पर जब बात राजनीतिक दलों के हितों की आती है तो सब एक हो जाते हैं। देश की सेवा करने के नाम पर स्‍वार्थ पूरे करने में लगे राजनीतिक दलों का आलम यह है कि वे किसी भी तन्‍त्र का अंकुश बर्दाश्‍त करने को तैयार नहीं हैं न तो चुनाव आयोग का न ही सूचना आयोग का और न ही उस जनता का, जिसके वोट से ये विधानसभा व लोकसभा तक पहुंचते हैं। यहां तक कि देश के सर्वोच्‍च न्‍यायालय सुप्रीम कोर्ट का भी। ये लोग न तो आरटीआई के दायरे में आने को तैयार हैं और न ही अपनी करतूतों पर किसी तरह का प्रतिबन्‍ध मानने को।

      सरकार की मनमानी देखिए कि राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम कसने के लिए न्‍यायपालिका की कोशिशों पर पानी फेरने के लिए दागी सांसदों व विधायकों की सदस्‍यता समाप्‍त करने के सुप्रीम कोर्ट के दस जुलाई के फैसले के खिलाफ दायर की गई पुनर्विचार याचिका पर खुद सुप्रीम कोर्ट के सख्‍त रवैये के बाद अब संशोधन अध्‍यादेश कैबिनेट में पास करा लिया गया है। सरकार का कहना है कि सांसदों या विधायकों को दोषी ठहराए जाते ही उनकी सदस्‍यता खत्‍म कर दी गई तो सदन को भंग करने की नौबत आ जाएगी और सदन का कार्यकाल पूरा करने के लिए दोषी करार दिए जाने के बावजूद सांसद या विधायक की सदस्‍यता बरकरार रखना जरुरी है। तो यह मान लिया जाए कि विधानसभा व लोकसभा अपराधियों से भरी हो? जनप्रतिनिधि कुछ भी करते रहें और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। उन पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध न लगे। देश उन्‍हें सब कुछ करने की आजादी दे दे भले ही वह हरकत कितनी घटिया और घिनौनी ही क्‍यों न हो। विपक्ष भी देखिए कि खाद्य सुरक्षा विधेयक व भूमि अधिग्रहण विधेयक के अलावा कितने मामलों में शोर मचाता रहा पर देश व समाज के हित में कोर्ट के लिए गए फैसले के विरोध में वह भी एक तरह से सत्‍तापक्ष के साथ है। यहां तक कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्‍द्र मोदी भी। तो यह मान लिया जाए कि अब ये दल अपने स्‍वार्थ के लिए किसी भी तंत्र को विफल करते रहेंगे।

      अभी हाल ही में चुनाव सुधार का समर्थन कर रहे एक एनजीओ ने पांच राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनाव व आम चुनाव के मद्देनजर राष्‍ट्रव्‍यापी सर्वेक्षण में पाया कि करीब एक तिहाई सांसद व विधायकों पर आपराधिक आरोप हैं। लोकसभा में ५४३ सांसदों में से १६२ (३० फीसद) पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। ठीक इसी तरह ३१ फीसद विधायक आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं।

      देश को आजाद कराने में भले ही कितने क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया हो। कितने नेताओं ने अपनी संपत्ति बेचकर देश की सेवा की हो। कितने नेता ईमानदारी व समर्पण की मिसाल बने हों। लेकिन आज की राजनीति का उद्देश्‍य किसी भी तरह से पॉवर व पैसा अर्जित करना रह गया है। भले ही इन्‍हें पैदा करने का तरीका कोई भी हो। यही वजह है कि विधानसभा व संसद में अधिकतर प्रॉपर्टी डीलर, बाहुबली व अपराधी किस्‍म के लोग विराजमान हैं। आज की तारीख में किसी भी तरह से पैसा कमाओ और चुनाव लड़कर बन जाओ जनप्रतिनिधि। कोई यह देखने को तैयार नहीं कि यह पैसा आया कहां से ?

    आरटीआई के दायरे में आने का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि हाल ही में एक अंतरराष्‍ट्रीय एनजीओ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि फ्रांस, इटली, जर्मनी एवं जापान समेत 40 देशों में राजनीतिक दलों को कानून के तहत अपनी आय के स्रोत, संपत्तियों एवं देनदारियों व अन्‍य रिकार्ड के साथ खुलासा करना होता है। कॉमनवेल्‍थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की रिपोर्ट के अनुसार स्‍वीडन एवं तुर्की जैसे देशों में राजनीतिक दलों में स्‍वैच्छिक व्‍यवस्‍था है। इस रिपोर्ट के अनुसार आस्ट्रिया, भूटान, ब्राजील, बुल्‍गारिया, फ्रांस, घाना, यूनान, हंगरी, इटली, कजाकिस्‍तान एवं किर्गिस्‍तान में कानून के तहत यह व्‍यवस्‍था है कि राजनीतिक दलों को अपनी वित्‍तीय सूचनाओं का समय रहते ही लोगों के समक्ष खुलासा करना होता है। साथ ही नेपाल, पोलैंड, रोमानिया, स्‍लोवाकिया, सूरीनाम, स्‍वीडन, कजाकिस्‍तान, तुर्की, यूक्रेन एवं उज्‍बेकिस्‍तान में भी राजनीतिक दलों को अपने वित्‍त पोषण का सार्वजनिक खुलासा करना होता है।