Friday, 27 September 2013

कहां है गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू!

      बात उन दिनों (1993 ) की है जब मैं नॉएडा में करियर बनाने आया था। नॉएडा से मोहननगर की बस देखता तो मन उसमें चढ़ लेने को करता। दरअसल मोहननगर से बिजनौर की बस मिलती थी।  जो सीधी मेरे गांव के पास होकर निकलती थी। जब कभी घर जाने का मौका मिल जाता तो मन करता कि हवा में उड़कर अपनों में पहुंच जाऊं और समय त्योहारों का हो तो उत्साह का  आलम यह होता कि बसों में कितनी भी भीड़ हो पर घर जाना जरुर होता था, वह भी परिजनों को लिए खरीदारी करके। मीडिया से जुड़ने के बाद भी लम्बे समय तक मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। पत्रकारिता के साथ समाजसेवा से जुड़ा रहने के चलते गांव-देहात से मेरा नाता नहीं टूटा।  गांवों की मिट्टी की सोंधी खुशबु मुझे बरबस अपनी ओर खींच ही लेती।
      कई बार तो ऐसा हुआ कि मैं जब बीमार पड़ता तो नॉएडा में सही होता ही नहीं। परेशान होकर गांव की ओर निकल पड़ता, यकीन कीजिये कि ज्यों-ज्यों मेरा गांव करीब आता जाता त्यों-त्यों मेरी तबीयत ठीक होती चली जाती। किसान परिवार में पैदा होने के कारण खेत-खलिहान से मेरा बड़ा लगाव रहा है पर कुछ दिनों से गांवों में भी आया परिवर्तन लगातार निराशा पैदा कर रहा है। मैं दूसरों की तो बता नहीं सकता पर मुझे जो लगा बता रहा हूं।  कई बार जब मैं अपने परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों से मिलने को आतुर रहता तो गांव चला जाता पर वहां के माहौल देखकर न केवल निराशा होती बल्कि पीड़ा भी। लोगों का रवैया ऐसा हो गया है कि शहरों की तरह ही गांवों में भी पैसों के लिए आपाधापी का माहौल है।
    प्यार-मोहब्बत की जगह द्वेष भावना ने ले ली है। रिश्ते स्वार्थ के होते जा रहे हैं। भाईचारा, चौपाल पर हंसी के ठहाके, बड़ों का सम्मान गांवों से भी खत्म होते जा रहे हैं। तीज त्योहारों पर गांवों में भी रोनक खत्म होती जा रही है। क्या यह महंगाई की मार है या फिर पैसों को कमाने की  मारामारी। सुख-चैन गांवों से भी खत्म  होता जा रहा है। मां का आंचल, पिता का संरक्षण, बड़े भाई का स्नेह, छोटे भाई का सम्मान, बहन की सुरक्षा, दोस्ती की कद्र जैसे शब्द हमारे समाज से लगभग खत्म होने लगे हैं । यह क्या मुझे ही लग रहा है या फिर वास्तव में समाज बरबादी की ओर अग्रसर है। देश का भविष्य माने जाने वाला युवा वर्ग अपने रास्ते से भटक गया लगता है। जहां इन लोगों को देश-समाज की सोचनी चाहिए वहां काफी संख्या में युवा ग्लैमर की चकाचौंध में खोकर गलत रास्ता पकड़ ले रहे हैं। ये  कहना गलत न होगा कि अब गांव की मिट्टी सोंधी खुशबु अपना अस्तित्व खोती जा रही है। महानगरों का क्या हाल है यह बताने की जरूरत नहीं हैं। तो क्या यह मान यह लिया जाए कि आपाधापी का यह आलम लगातार माहौल खराब करता रहेगा ?

Thursday, 26 September 2013

बेलगाम होते राजनीतिक दल



जनता को सुरक्षा का वादा देने के साथ विधानसभा व लोकसभा में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि खुद आपराधिक प्रवृत्ति के हों, इससे सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह स्थिति और ज्‍यादा भयावह है कि अदालत द्वारा सजा देने के बावजूद सरकार इनका बचाव करे। सरकार के जनप्रतिनिधि कानून में संशोधन करने के लिए कैबिनेट में अध्‍यादेश पास कराने से तो ऐसा ही लग रहा है। अब यह अध्‍यादेश राष्‍ट्रपति के पास जाना है। हालांकि राष्ट्रपति महोदय ने इस मामले में नाराजगी जताई है। लोकसभा में मुख्‍य विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा का भी इस मामले पर कोई ठोस रवैया नहीं है।

      बात जनप्रतिनिधि कानून में संशोधन की ही नहीं है। राजनीतिक दल तो हर व्‍यवस्‍था को अपनी ओर मोड़ने को आतुर हैं। भले ही देश व समाज हित में सर्वदलीय बैठक में एक राय न बनती हो पर जब बात राजनीतिक दलों के हितों की आती है तो सब एक हो जाते हैं। देश की सेवा करने के नाम पर स्‍वार्थ पूरे करने में लगे राजनीतिक दलों का आलम यह है कि वे किसी भी तन्‍त्र का अंकुश बर्दाश्‍त करने को तैयार नहीं हैं न तो चुनाव आयोग का न ही सूचना आयोग का और न ही उस जनता का, जिसके वोट से ये विधानसभा व लोकसभा तक पहुंचते हैं। यहां तक कि देश के सर्वोच्‍च न्‍यायालय सुप्रीम कोर्ट का भी। ये लोग न तो आरटीआई के दायरे में आने को तैयार हैं और न ही अपनी करतूतों पर किसी तरह का प्रतिबन्‍ध मानने को।

      सरकार की मनमानी देखिए कि राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम कसने के लिए न्‍यायपालिका की कोशिशों पर पानी फेरने के लिए दागी सांसदों व विधायकों की सदस्‍यता समाप्‍त करने के सुप्रीम कोर्ट के दस जुलाई के फैसले के खिलाफ दायर की गई पुनर्विचार याचिका पर खुद सुप्रीम कोर्ट के सख्‍त रवैये के बाद अब संशोधन अध्‍यादेश कैबिनेट में पास करा लिया गया है। सरकार का कहना है कि सांसदों या विधायकों को दोषी ठहराए जाते ही उनकी सदस्‍यता खत्‍म कर दी गई तो सदन को भंग करने की नौबत आ जाएगी और सदन का कार्यकाल पूरा करने के लिए दोषी करार दिए जाने के बावजूद सांसद या विधायक की सदस्‍यता बरकरार रखना जरुरी है। तो यह मान लिया जाए कि विधानसभा व लोकसभा अपराधियों से भरी हो? जनप्रतिनिधि कुछ भी करते रहें और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। उन पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध न लगे। देश उन्‍हें सब कुछ करने की आजादी दे दे भले ही वह हरकत कितनी घटिया और घिनौनी ही क्‍यों न हो। विपक्ष भी देखिए कि खाद्य सुरक्षा विधेयक व भूमि अधिग्रहण विधेयक के अलावा कितने मामलों में शोर मचाता रहा पर देश व समाज के हित में कोर्ट के लिए गए फैसले के विरोध में वह भी एक तरह से सत्‍तापक्ष के साथ है। यहां तक कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्‍द्र मोदी भी। तो यह मान लिया जाए कि अब ये दल अपने स्‍वार्थ के लिए किसी भी तंत्र को विफल करते रहेंगे।

      अभी हाल ही में चुनाव सुधार का समर्थन कर रहे एक एनजीओ ने पांच राज्‍यों में होने वाले विधानसभा चुनाव व आम चुनाव के मद्देनजर राष्‍ट्रव्‍यापी सर्वेक्षण में पाया कि करीब एक तिहाई सांसद व विधायकों पर आपराधिक आरोप हैं। लोकसभा में ५४३ सांसदों में से १६२ (३० फीसद) पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। ठीक इसी तरह ३१ फीसद विधायक आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं।

      देश को आजाद कराने में भले ही कितने क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया हो। कितने नेताओं ने अपनी संपत्ति बेचकर देश की सेवा की हो। कितने नेता ईमानदारी व समर्पण की मिसाल बने हों। लेकिन आज की राजनीति का उद्देश्‍य किसी भी तरह से पॉवर व पैसा अर्जित करना रह गया है। भले ही इन्‍हें पैदा करने का तरीका कोई भी हो। यही वजह है कि विधानसभा व संसद में अधिकतर प्रॉपर्टी डीलर, बाहुबली व अपराधी किस्‍म के लोग विराजमान हैं। आज की तारीख में किसी भी तरह से पैसा कमाओ और चुनाव लड़कर बन जाओ जनप्रतिनिधि। कोई यह देखने को तैयार नहीं कि यह पैसा आया कहां से ?

    आरटीआई के दायरे में आने का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि हाल ही में एक अंतरराष्‍ट्रीय एनजीओ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि फ्रांस, इटली, जर्मनी एवं जापान समेत 40 देशों में राजनीतिक दलों को कानून के तहत अपनी आय के स्रोत, संपत्तियों एवं देनदारियों व अन्‍य रिकार्ड के साथ खुलासा करना होता है। कॉमनवेल्‍थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) की रिपोर्ट के अनुसार स्‍वीडन एवं तुर्की जैसे देशों में राजनीतिक दलों में स्‍वैच्छिक व्‍यवस्‍था है। इस रिपोर्ट के अनुसार आस्ट्रिया, भूटान, ब्राजील, बुल्‍गारिया, फ्रांस, घाना, यूनान, हंगरी, इटली, कजाकिस्‍तान एवं किर्गिस्‍तान में कानून के तहत यह व्‍यवस्‍था है कि राजनीतिक दलों को अपनी वित्‍तीय सूचनाओं का समय रहते ही लोगों के समक्ष खुलासा करना होता है। साथ ही नेपाल, पोलैंड, रोमानिया, स्‍लोवाकिया, सूरीनाम, स्‍वीडन, कजाकिस्‍तान, तुर्की, यूक्रेन एवं उज्‍बेकिस्‍तान में भी राजनीतिक दलों को अपने वित्‍त पोषण का सार्वजनिक खुलासा करना होता है।

सदियों दिलों के अन्दर वो गूंजते रहेंगे

               जयंती (28 सितम्बर) पर विशेष 
    भगत सिंह का नाम आते ही हमारे जहन  में बंदूक से लैस किसी क्रांतिकारी की छवि उभरने लगती है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि २३ वर्ष की अल्पायु में भी वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंग्ला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ, चिन्तक और विचारक तो थे ही, समाजवाद के मुखर पैरोकार भी थे। आज की व्यवस्था और राजनेताओं की सत्तालिप्सा को देखकर लोग अक्सर यह कहते सुने  जाते हैं कि इससे तो  बेहतर ब्रितानवी हुकूमत थी पर भगत सिंह ने 1930  में यह बात महसूस कर ली थी।  उन्होंने कहा था कि हमें जो आजादी मिलेगी, वह सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही होगी।  गरीबी पर पर लोग भले ही महात्मा गांधी के विचारों को ज्यादा तवज्जो देते हों पर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में गरीबी को न केवल अभिशाप बताया था बल्कि पाप तक की संज्ञा दे दी थी।  भगत सिंह की शहादत को भले ही 82 साल बीत गए हों  पर आज भी वह अपने विचोरों की ताजगी से सामायिक  और प्रासंगिक ही लगते हैं।  आने वाले वक्त में भी वह उतने ही प्रासंगिक  रहेंगे क्योंकि मुश्किलों से  निजात पाने को हमने जो फार्मूला इजात किया,  उसमें हजारों-हजार चोर छेद हैं।
    भगत सिंह को अधिकतर लोग क्रांतिकारी देशभक्त के रूप में जानते हैं पर वह सिर्फ एक क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कला के धनी,  दार्शनिक, चिन्तक, लेखक और पत्रकार भी थे।  बहुत कम आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैंड  और रुस की क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था।  लाहौर के नेशनल कालेज से लेकर फांसी की कोठरी तक उनका यह अध्ययन लगातार जारी रहा कि और यही अध्ययन था जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है कि उन्हें हम और क्रांतिकारी दार्शनिक के रूप में जानते हैं।  भगत सिंह के भीतर एक प्रखर अखबारनवीस भी था, जिसकी बानगी हम प्रताप जैसे अख़बारों के सम्पादन में देख सकते हैं।  यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक महान विचारक के ये महत्वपूर्ण विचार देश के तथाकथित  कर्णधारों के षडयंत्र के फलस्वरूप अब तक उन लोगों तक नहीं पहुच पाए जिनके लिए वह शहीद हुए थे।
    सरकार का रवैया देखिये कि आजादी के लिए २३ साल की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे को  चूमने वाले शहीद आजम भगत सिंह को सरकार शहीद ही नहीं मानती है।  इस बात पर एक बारगी यकीन करना मुश्किल है पर सरकारी कागजों में यही दर्ज है। एक आरटीआई से इसका खुलासा भी हुआ है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल में गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं कि भगत सिंह को कभी शहीद घोषित किया गया था।

Friday, 20 September 2013

क्या प्यार इतना बड़ा गुनाह है ?

हम आधुनिकता की बातें चाहे जितनी कर भी लें। कुरीतियों व रूढ़िवादिता को खत्म करने की जितनी भी कसम खा लें,  गांवों में आए परिवर्तन की चाहे जितनी भी डुगडुगी पीट लें। सच तो यह है कि परिवर्तन की राह पर हम उतने आगे नहीं बढ़ पाए हैं जितना अपेक्षित था। क्या गांव क्या शहर, प्रेम करना आसानी से लोग पचा नहीं पाते और इस अपाच्य का शिकार होते हैं युगल। लोग झूठी शान के लिए कुछ भी कर बैठते हैं, कानून को ताक पर रखकर अपने बच्चों का कत्ल भी। गत दिनों हरियाणा के रोहतक जिले के गरनावठी गांव में एक प्रेमी युगल के शादी कर लेने पर परिजनों के हत्या कर देना इसका जीता-जागता उदाहरण है । इंतहा तो तब हो गई जब समाज में भय का मैसेज देने के लिए लड़के के शव के टुकड़ों को उसके ही घर के सामने फ़ेंक दिया गया।
    वैसे तो झूठी शान के लिए हत्या जैसे मामले पूरे उत्तर भारत में हो रहे हैं पर हरियाणा, प. उत्तर प्रदेश, दिल्ली व  पंजाब में इस  तरह की वारदात आम बात हो गई है। यहां खुले विचारों के लिए स्पेस कम से कम है। अक्सर लड़कियों की आजादी को लेकर पंचायतों में तरह-तरह के फरमान जारी दिए जाते हैं । मसलन, जींस न पहनो, मोबाईल का इस्तेमाल हरगिज न करों और पार्क में सुबह या शाम हवाखोरी को अकेले बिल्कुल मत जाओ।  प्रेम-प्रसंग को लोग अपनी इज्जत से जोड़कर देखने लगते हैं।  जहां जरा सा मामला हुआ कि निकल गई तलवारें।  भले ही कानून के अनुसार २१ वर्ष की उम्र में लड़के व १८ वर्ष में लड़की अपनी पसंद से शादी करने के हकदार माने जाते हों पर कितने मामले ऐसे हुए कि प्रेम को गुनाह मानते हुए सर कलम कर दिए गए।  कहीं लड़के, कहीं लड़की तो कहीं दोनों को अपनी जान गंवानी पड़ी।  ऐसे मामलों में अक्सर देखने में आता है कि लड़की पक्ष के लोग ही वारदात को अंजाम देते हैं।  हरियाणा व प. उत्तर प्रदेश  में भले ही एक विशेष वर्ग सगोत्र को लेकर बवाल मचाता हो पर हाल ही में एक सामाजिक संगठन के किये गए सर्वे के अनुसार इस तरह के मामलों में ७२ फीशद  अंतरजातीय विवाह, १५ अपनी ही जाति के, तीन फीसद  सगोत्र और एक फीसद  अंतर्धार्मिक शादियां कारण रहीं।
     अक्सर देखने में आता है कि एक विशेष वर्ग में सगोत्र विवाह के खिलाफ तालिबानी झंडा बुलंद कर दिया जाता है।  दरअसल इस तरह के लोग आज भी रूढ़िवादी समाज का हिस्सा बने हुए हैं।  ये लोग आधुनिक समाज की बदलती विचारधारा में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं। हरियाणा, दिल्ली व  प. उत्तर प्रदेश में लिंगानुपात की स्थिति ख़राब है। रूढ़िवादी लोग तर्क देते हैं कि सगोत्र में जन्में सभी व्यक्ति एक ही आदि पुरुष की संताने हैं।  वे समगोत्री विवाह को वर्जित मानते हैं।  ऐसे लोगों को देखना चाहिए कि 1950 में बंबई उच्च न्यायालय में हरिलाल कनिया और गजेंदर गडकर की दो सदस्यीय पीठ ने सगोत्र हिन्दू विवाह को कुछ शर्तों के साथ वैध ठहराया था।
सगोत्र विवाह का विरोध खप पंचायतों में जयादा देखने को मिलता है।  ये पंचायतें हर्षवर्धन के काल में सातवीं शताब्दी में अस्तित्व में आयी थीं।  प्राचीनकाल में प. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का व्यक्ति ही पंचायत का महामंत्री हुआ करता था। अंग्रेजी हुकूमत में सबसे बड़ी खाप पंचायत मुजफ्फरनगर की ही हुआ करती थी। खाप पंचायतों ने देश में बड़ी पंचायतें कर देश व समाज हित में भी निर्णय लिए हैं। युद्ध के दौरान भी खाप पंचायतों ने देशभक्ति की मिसाल पेश की थी। प्राचीनकाल में भी इन महापंचायतों ने युद्ध के दौरान राजाओं-महाराजाओं की मदद की। हां देश में परिवार की इज्जत के लिए कत्ल की परिपाटी पुरानी है। भले ही हमारे समाज में इस तरह के मामले रोकने के लिए तरह-तरह के कानून बने हों पर समाज का संवेदनशील मुद्दा होने के कारण सरकारें  भी इन मामलों में हस्तक्षेप करने से कतराती रही हैं।  हमें यह भी देखना होगा कि समाज के ठेकेदार भले ही महिलाओं के अधिकार के लिए तरह-तरह के दावे करते हों पर आज भी पुरुष प्रधान समाज में लड़की के अपने जीवन साथी चुनने पर परिजन इसे अपनी इज्जत के साथ खिलवाड़ मानते हैं। ऐसा भी नहीं हैं कि ऐसी वारदात को रोकने के लिए देश में कोई प्रयास नहीं हो रहा है।  सरकार के स्तर पर अंतरजातीय अथवा दूसरे धर्म में विवाह करने वाले लोगों के लिए विशेष विवाह अधिनियम के तहत दी जाने वाले ३० दिनों की नोटिस अवधि को भी समाप्त करने पर विचार किया जा रहा है।  हॉल ही में प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने  पी. चिदंबरम की अगुआई में इस बाबत आठ सदस्यीय मंत्री समूह का गठन किया है।  केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय अलग से एक विशेष समिति का गठन कर रहा है।