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Sunday, 23 May 2021

जनता मूर्ख बन रही है और मोदी बना रहे हैं!

 


वैसे तो हर सरकार ने किसी न किसी रूप में जनता को ठगा ही है, पर मोदी सरकार ने ऐसा बेवकूफ बनाया कि कहीं न छोड़ा। उनको भी जिनके बलबूते पर सत्ता का मजा लूटते रहे। क्या रोजी-रोटी स्वयंभू हिन्दुओं की नहीं गई है ? क्या कोरोना कहर से ये लोग अछूते रह गये हैं ? क्या आज के हालात में इन लोगों के बच्चों का भी भविष्य और जान खतरे में नहीं है ? जमीनी हकीकत तो यह है कि हिन्दुत्व का राग अलापने वाली मोदी सरकार ने सबसे अधिक हिन्दुओं की भावनाओं से ही खिलवाड़ किया है।  ये जो नदियों में शव बह रहे हैं किन लोगों के हैं ? ये जो शवों के आसपास कपड़े दिखाई दे रहे है किस धर्म के लोगों के हैं ?

शुक्र है कि धर्म के नाम पर सत्ता हथियाने वाले लोगों को मुस्लिम समाज के खिलाफ कुछ नहीं मिल रहा है नहीं तो गत साल की तरह इस बार भी कोरोना कहर के लिए मुस्लिमों को ही जिम्मेदार ठहरा देते। विपदा या महामारी में बड़े स्तर पर जान और माल का नुकसान होता है पर क्या कोरोना महामारी में लोग मरे हैं ? क्या उन लोगों की हत्या नहीं हुई है। कौन लोग हैं इन हत्याओं के जिम्मेदार ? क्या आक्सीजन की कमी मरने वालों की स्वभाविक मौत हुई है ? क्या उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में जबर्दस्ती धकेले गये शिक्षकों की मौत हत्या नहीं है ? क्या इन शिक्षकों ने इलाहाबाद कोर्ट और योगी सरकार से कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए चुनाव को टालने की गुहार नहीं लगाई थी। हां संक्रमण रोकने का सरकारों के पास बस एक ही उपाय है, वह है लॉक डाउन।


यह देश की विडंबना ही है कि इतना झेलने के बावजूद देश का एक बड़ा तबका जमीनी हकीकत समझने को तैयार ही नहीं। उसे देश और समाज के साथ ही अपने बच्चों के भविष्य और जान से चिंता  भाजपा के सत्ता के स्वंभू हिन्दुत्व की है। इन लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि तीसरी लहर का डर बच्चों में इतना बैठ गया है कि वे डिस्प्रेशन में आ रहे हैं। ये लोग समझने को तैयार नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिलाधिकारियों की बैठक में जिन गांवों में कोरोना को हराने की बात कर रहे हैं, वहां की स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमराई हुई हैं। क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के आदेश को योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट पलटवा दिया। क्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कोरोना संक्रमण से मरे लोगों के बारे में ‘मुक्त हो जाने’ वाले बयान को व्यवहारिक कहा जा सकता है।


लोग कह रहे हैं कि मोदी सरकार क्या करे। राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी बनती है अरे भाई प्रधानमंत्री तो वाहवाही लूटने के लिए सब कुछ हथियाकर रखना चाहते हैं। इन्हीं महाशय ने सांसदों से गांवों को गोद लेने की अपील की थी। तो इन सांसदों द्वारा गोद लिये गये गांवों ही स्वास्थ्य सेवाएं देख लीजिए। चलो प्रधानमंत्री के साथ ही सांसदों दूसरे मंत्रियों की ही बात छोड़ दीजिए। खुद स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्धवर्धन ने जिस गांवों को गोद लिया था, उनका ही हाल देख लीजिए।


2014 में प्रधानमंत्री के आह्वान पर डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के धीरपुर और घोगा गांव को गोद लिया था। 2018 में उन्होंने सिंघोला गांव को भी गोद ले लिया। वह बात दूसरी है कि गांवों को गोद लेना मात्र औपचारिकता ही रह गया है। डॉ. हर्षवर्धन ने गोद लेने के बाद उधर पलटकर भी नहीं देखा। आज सिंघोला गांव की स्थिति यह है कि वहां 90 फीसद लोग संक्रमित हुए और घर पर ही ठीक हो गये। जो लोग अस्पताल में भर्ती हुए उन्होंने से अधिकतर दम तोड़ गये। जहां तक जांच की बात तो इस गांव में न कोई जांच हुई और न कोई हाल जानने के लिए आया। यह हाल स्वास्थ्य मंत्री द्वारा गोद लिये गये गांव का है। फिर लोग कहते सुने जा रहे हैं कि देश में मोदी का विकल्प नहीं है। मतलब 130 करोड़ के देश में एक बेहरुपिया के सामने लोगों को देश चलाने वाला ही नहीं दिखाई दे रहा है। मैं मानता हूं कि देश में विपक्ष नाकारा है। अधिकतर स्थापित नेता वंशवाद या परिवारवाद के बल पर बड़े नेता बने हुए हैं पर क्या देश को ऐसे ही बर्बाद होते देखते रहें। क्या लोगों को ऐसे ही मरते देखते रहें। क्या ऐसे ही बच्चों का भविष्य बर्बाद होते देखते रहें। क्या ऐसे ही आने वाली पीढ़ी की बर्बादी को देखकर भी अनदेखा कर दें।


हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है कि बेवकूफ बनाना वाला चाहिए बनने के लिए तो लोग तैयार बैठे हैं। देश के लोगों की इस कमजोरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बखूबी पहचाना है। वह भलीभांति जानते हैं कि देश के लोगों को सपने दिखाते जाओ और उन पर राज करते जाओ। प्रधानमंत्री को संक्रमण में आई कमी तो दिखाई दे रही है पर बढ़ती मौतों की संख्या नहीं दिखाई दे रही है। देश में कोरोना महामारी खत्म नहीं हुई कि ब्लैक फंगस महामारी आ गई पर प्रधानमंत्री को अब हालात सुधरते दिखाई दे रहे हैं। उनके द्वारा बनाये गये माहौल में उनके प्रवक्ता के रूप में स्थापित टीवी चैनल भी भरपूर साथ दे रहे है। मतलब लोगों को बरगलाकर जमीनी हकीकत से दूर ले जाओ। सुविधाओं कुछ मत दो बस बातों से ही उन्हें छका दो। जिनके घर में मौत हुई है, उन्हें मुक्ति का उपदेश देकर सकारात्मक सोचने के लिए कहो। मतलब किसी भी तरह से लोगों का बेवकूफ बनाते रहो।


वैसे भारतीय लोगों के बारे में उनकी यह धारणा एक तरह से ठीक भी है। नोटबंदी में कितने लोग परेशान हुए, सब भूल गये। जीएसटी की परेशानी को सब भूल गये। देश में प्रधानमंत्री कितने स्मार्ट सिटी बनवा रहे थे, कहां वे स्मार्ट सिटी ? सब भूल गये। कितने स्मार्ट विजेज बनवा जा रहे थे, सब भूल गये। भाजपा सांसदों ने कितने गांव गोद लिये और उनका कितना विकास किया, सब भूल गये।  2014 में इनता काला धन विदेश से लाने की बात कर रहे थे कि प्रत्येक आदमी के खाते में 15 लाख रुपये आ रहे थे, सब भूल गये। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दे रहे थे कि लोग सब भूल गये। नये किसान कानून लाकर किसानों ही नहीं बल्कि सभी लोगों के हाथ से रोटी छिनने की व्यवस्था प्रधानमंत्री ने कर दी है पर लोगों को जनता के लिए सर्दी, गर्मी और बारिश को झेलते हुए देश की राजधानी के चारों ओर लड़ाई लड़ रहे किसानों में भी आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही और नकली किसान नजर आ रहे हैं।


श्रम कानून में संशोधन कर नयी पीढ़ी को मानसिक रूप से बीमार बनाने की पटकथा प्रधानमंत्री लिख चुके हैं पर लोगों को अपने बच्चों का भविष्य और स्वास्थ्य देखने के बजाय मोदी में करिश्मा दिखाई दे रहा है। अब जब कोरोना की दूसरी लहर में डॉक्टर आक्सीजन की कमी से लाखों संक्रमित लोग दम तोड़ गये। लोग रेमडेसिविर इंजेक्शन और आक्सीजन के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहे। मोदी सरकार वैक्सीन लगाने की बात तो करती रही पर वैक्सीन बनाने की कंपनियों को पैसे देने के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। अब जब वैक्सीन की किल्लत हो गई तो दूसरी दोज की मियाद बढ़ा दी गई। एक-दो महीने में शायद वैक्सीन लगवाने की जरूरत ही महसूस न की जाए। यदि लोगों ने देश की वैक्सीन विदेश में भेजने के पोस्टर छपवा कर चस्पा दिये तो उनकी गिरफ्तारी कर ली गई। इन सबके बावजूद लोगों को लगता है कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर मोदी सरकार और भाजपा शासित सरकारों को कुछ करने की जरूरत ही क्या है ?

प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 04:31 No comments:
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Wednesday, 9 December 2020

किसान कानून : मोदी सरकार की नीयत में खोट बता रहा पानीपत में 100 एकड़ जमीन पर बन रहा अडानी का गोदाम!

 



देश का किसान चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि मोदी सरकार ये जो किसान कानून लाई है ये कॉरपोरेट घरानों के भले के और उनकी बर्बादी के हैं। पर मोदी सरकार और उनके समर्थक हैं कि वे इन कानून से किसानों को मालामाल करने की रट लगाई हुए हैं। वह बात दूसरी है कि मोदी सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले किसानों या उनके नेताओं से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा। यह अपने आप में एक सवाल है कि कानून लाये गये किसानों से संबंधित और प्रधानमंत्री ने बैठक की कॉरपोरेट घरानों के साथ। जो लोग जानबूछ कर  अनजान बन हुए हैं उनको तो कोई नहीं समझा सकता है पर अब अंधे आदमी की भी समझ में आने लगा है कि ये कानून कॉरपोरेट घरानों को किसानों की जमीन हथियाने देने का षड्यंत्र हैं। कानून में एमएसपी मेनशन न करना, उद्योगपतियों को फसलों के भंडारण की छूट देना और सीधे किसानों की फसल खरीदना का अधिकार ये सब कॉरपोरेट घरानों का हित देखते हुए किया गया है। यही वजह रही है कि मोदी सरकार ने इन कानून में किसानों का कोर्ट जाने का भी अधिकार छीन लिया है। कानून में किसान के किसी शिकायत को लेकर एसडीएम के पास जाने की ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या एसडीएम की औकात है कि अडानी और अंबानी जैसे शीर्षस्थ उद्योगपतियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर दे वह भी जब वह जानता हो कि ये दोनों उद्योगपति देश के प्रधानमंत्री के घनिष्ठ मित्र हैं। बताया जा रहा है कि अडानी ग्रुप ने विभिन्न राज्यों में खाद्यान्न गोदाम बनाने की पूरी व्यवस्था कर ली है। न्यूज ख्ब् पर भाकियू महासचिव युद्धवीर सिंह ने बाकायदा क्ब् राज्यों में अडानी के गोदाम बनने की बात कही है। यह अपने आप में दिलचस्प है कि एक ओर सरकार सरकारी गोदामों में एमएसपी के अनुसार 1 लाख 90 हजार करोड़ का अनाज पड़ा बता रही है तो दूसरी ओर अडानी ग्रुप विभिन्न राज्यों में गोदाम बना रहा है। मतलब यदि ये कानून वापस नहीं होते हैं तो देश में आम मंडियां समाप्त हो जाएंगी और अडानी की मंडियों का राज चलेगा।
जिन लोगों को अभी भी ये कानून किसान हित में लग रहे है। जिन्हें मोदी सरकार किसान हितैषी दिखाई दे रही हो वे हरियाणा के पानीपत जिले के नौल्था गांव में जाकर इन कानून को लेकर अडानी ग्रुप की तैयारी देख लें। मोदी सरकार अडानी पर कितनी मेहरबान रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पानीपत जिले के इसराना तहसील के गांव नौल्था में अडानी ग्रुप ने 100 एकड़  जमीन दो साल पहले यानी कि मोदी के पहले ही कार्यकाल में खरीद ली थी। आजकल इस जमीन पर  रेलवे ट्रैक, सडक़ व मंडी का कार्य चल रहा है।  बताया जा रहा है कि यह जमीन इस बहाने अधिग्रहीत की गई कि गांव में रेलवे के डिब्बे (कोच) बनाने का कारखाना बनेगा। दरअसल रेलवे के डिब्बे बनाने के नाम पर रोजगार का लालच देकर किसानों ने यह जमीन खरीदी गई थी।  गांव वालों को बताया गया कि यह जमीन सरकार खरीद रही है। लोगों को लगा कि यदि वे जमीन नहीं देंगे तो जमीन जबर्दस्ती जमीन ले लेगी। इस लिहाज से उन्होंने यह जमीन दी थी।
किसानों तब जाकर पता चला कि  उनकी ज़मीनें अडानी ग्रुप ले रहा है  जब तक 40-50 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली गई थी। जब किसानों ने अपनी ज़मीनें देने से इनकार किया तो इन बचे किसानों को मोटा लालच देकर यानी कि डेढ़ से ख् करोड़ का भाव देकर उनकी जमीन खरीद ली गई। मतलब ये पूंजीपति किसानों को मोटा लालच देकर उनकी जमीन हथियाने में माहिर होते हैं।
 इस जमीन पर अडानी ग्रुप फसलों के भंडारण के लिए अपना गोदाम बना रहा है। गोदाम कितना बड़ा होगा यह बात गोदाम तक बिछने वाली रेलवे लाइन ही बता रही है। मतलब इस गोदाम से खाद्यान्न दूसरे राज्यों ही नहीं बल्कि विदेश तक जाएगा। हो सकता है कि अडानी देश का खाद्यान्न मोटे मुनाफे पा विदेश में जाकर बेच दे। मतलब देश में खाद्यान्न संकट की पूरी तैयारी मोदी सरकार न इन कानूनों के माध्यम से कर दी है। वैसे भी उद्योगपतियों को तो बस अपना मुनाफा चाहिए।  देश और समाज से उनका कोई लेना देना नहीं होता है। पता चला है कि पहले भी पहले भी कारपोरेट घरानों के लिए  जमीन अधिग्रहीत की गई है। मतलब अब आढ़तियों की मंडी की जगह कारपोरेट घरानों की मंडी होंगी। बताया जा रहा है कि नौल्था गांव में मिट्टी खोदना या फैक्ट्री लगाने की आज्ञा नहीं है। उसके बावजूद ये सारा काम हुआ है। मतलब मामला अडानी ग्रुप का है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अडानी का एसडीएम तो क्या करेगा ? मुख्य सचिव भी कुछ नहीं कर सकता है। अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए नौल्था गांव को स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाया गया है। मतलब यहां हरियाणा या केंद्र का कानून नहीं चलेगा यहां पर अडानी का कानून चलेगा। कोई कोर्ट भी नहीं जा सकेगा। किसानों का कहना है कि यह  क्षेत्र में ऐसी चर्चा कि नौल्था गांव में अडानी निजी  मंडी लगाने जा रहा है।  यह जमीन जीटी रोड पानीपत रोहतक से इस गांव को जोड़ती है। इस ज़मीन पर अडानी इनीशिएटिव का बोर्ड भी लगा दिया गया है। अडानी ग्रुप के इस प्रोजेक्ट के लिए हजारों पेड़ ्काट दिय गये हैं। कारपोरेट घरानों के लिए मोदी सरकार क्या-क्या खेल खेलेगी। यह इस मामले में भी दिखाई दे रही है। दरअसल अडानी एग्री लॉजिस्टिक पानीपत की ओर से नौल्था और जोंधन कलान में अधिग्रहीत जमीन का लैंड-यूज बदल कर गोदाम (कृषि उत्पाद) स्थापित करने की परमिशन मांगने के तुरंत बाद इसे मान लिया गया।
दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव  में एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद हेलीकॉप्टर से लेकर चुनावी रैलियों तक का सारा खर्च अडानी के उठाने की चर्चा आम रही है। मीडिया को मेनेज करन के साथ ही लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए बनाए गये तंत्रों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालका को पंगू बनाने के लिए अडानी और अंबानी के पैसों का के इस्तेमाल करने की बात भी आम हो गई है।  वैसे भी मुकेश अंबानी के अधिकतर मीडिया हाउस में शेयर हैं। मोदी सरकार के प्रवक्ता की भूमिका निभा रहा जी न्यूज ग्रुप सांसद सुभाषा चंद्रा का है।
किसान कानूनों के साथ ही श्रम कानून में संशोधन भी इन शीर्षस्थ उद्योगपतियों क एहसान उतारने और उनके दबाव में लिया गया फैसला माना जा रहा है। 

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प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 23:40 No comments:
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दुनिया की मशहूर पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने कहा- मोदी भारत में खत्म कर रहे हैं लोकतंत्र

 
जेपी सिंह
पौने दो सौ साल पुरानी लंदन की द इकोनॉमिस्ट (The Economist) ने अपने ताज़ा अंक में भारत पर एक लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि नरेंद्र मोदी भारत में लोकतंत्र ख़त्म कर रहे हैं। दूसरी और नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीइओ) अमिताभ कांत को भारत का लोकतंत्र पसंद नहीं है।
द इकोनॉमिस्ट समाचार पत्रिका विश्व पत्रकारिता का जाना माना नाम है। इसकी साख न्यूयार्क टाइम्स और वाल स्ट्रीट जनरल से भी ऊपर है। इसके ताजा अंक में भारत पर India’s diminishing democracy, Narendra Modi threatens to turn India into a one-party state, An increasingly dominant prime minister and the ongoing erosion of checks and balances शीर्षक से एक लंबी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है।
रिपोर्ट का सार ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में लोकतंत्र ख़त्म कर रहे हैं। पत्रिका कहती है कि मोदी सत्ता के भूखे हैं और सारे नियम क़ानून ताख पर रख कर भारत में विरोधी पार्टियां खत्म कर रहे हैं। रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया के उन चार देशों में सबसे ख़राब हाल में है जहाँ लोकतंत्र को ख़तरा है। बाक़ी तीन देश हैं पोलैंड, हंगरी और तुर्की।
द इकोनोमिस्ट की रिपोर्ट में उच्चतम न्यायालय को भी लोकतंत्र विरोधी बताया गया है। लिखा है कि उच्चतम न्यायालय अर्णब गोस्वामी को चौबीस घंटे में जमानत दे देती है, लेकिन तिरासी साल के फ़ादर स्टैन स्वामी को पानी पीने के लिए स्ट्रॉ तक नहीं देती है। रिपोर्ट कहती है कि दसियों हज़ार अल्पसंख्यक जेल में सड़ रहे हैं, मगर उच्चतम न्यायालय के कान पर जूं नहीं रेंगती है। साथ ही अदालत ने इलेक्टोरल बांड्स क़ानून, सीएए से लेकर कश्मीर तक के मुक़दमों को लटका रखा है। रिपोर्ट में यूएपीए, आरटीआई, जनरल बिपिन रावत, चीनी अधिक्रमण पर मोदी की नींद, चुनाव आयोग, बिकाऊ मीडिया, कपिल मिश्रा, दिल्ली पुलिस द्वारा मुसलमानों की गिरफ़्तारियां इत्यादि पर भी तीख़ी टिप्पणी की गई है।
जब देश में लोकतंत्र अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है, तब नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीइओ) अमिताभ कांत को भारत का लोकतंत्र पसंद नहीं है। उन्हें चीन पसंद है जहां लोकतंत्र नहीं है। अमिताभ कांत ने मंगलवार को कहा था कि भारत में कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है, जिसके कारण यहां कड़े सुधारों को लागू करना कठिन होता है। उन्होंने एक ऑनलाइन कार्यक्रम में कहा कि भारत में कड़े सुधार नहीं लाए जा सकते हैं, क्योंकि हमारे यहां बहुत ज्यादा लोकतंत्र है।
अभिताभ कांत के इस कमेंट को लेकर सरकार को कई सवालों का सामना करना पड़ा। नतीजतन डैमेज कंट्रोल के लिए केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को आगे आना पड़ा। उन्होंने कहा कि हमें अपने लोकतंत्र पर गर्व है।
स्वराज्य पत्रिका के कार्यक्रम को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए कांत ने जोर देकर कहा था कि देश को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए और बड़े सुधारों की जरूरत है। पहली बार केंद्र ने खनन, कोयला, श्रम, कृषि समेत विभिन्न क्षेत्रों में कड़े सुधारों को आगे बढ़ाया है। अब राज्यों को सुधारों के अगले चरण को आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के संदर्भ में कड़े सुधारों को लागू करना बहुत मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि चीन के विपरीत हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। हमें वैश्विक चैंपियन बनने पर जोर देना चाहिए। आपको इन सुधारों (खनन, कोयला, श्रम, कृषि) को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है और अभी भी कई सुधार हैं, जिन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि कड़े सुधारों को आगे बढ़ाए बिना चीन से प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं है।
नीति आयोग के सीईओ ने कहा कि अगर 10-12 राज्य उच्च दर से वृद्धि करेंगे, तब इसका कोई कारण नहीं कि भारत उच्च दर से विकास नहीं करेगा। हमने केंद्र शासित प्रदेशों से बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण के लिए कहा है। वितरण कंपनियों को अधिक प्रतिस्पर्धी होना चाहिए और सस्ती बिजली उपलब्ध करानी चाहिए।
मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के किसानों के नये कृषि कानूनों को लेकर विरोध-प्रदर्शन पर कांत ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सुधार की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व्यवस्था बनी रहेगी, मंडियों में जैसे काम होता है, वैसे ही होता रहेगा। किसानों के पास अपनी रुचि के हिसाब से अपनी उपज बेचने का विकल्प होना, चाहिए क्योंकि इससे उन्हें लाभ होगा। हालांकि नीति आयोग के सीईओ ने बाद में पलटी मार दी कि देश में अधिक लोकतंत्र का बयान नहीं दिया।
अब अमिताभ कांत से कोई पूछे की जब द इकोनोमिस्ट जैसी अंतररष्ट्रीय पत्रिका में ब्लैक एंड व्हाइट में लिखा जा रहा है कि भारत में लोकतंत्र को खत्म किया जा रहा है और इसके समर्थन में तमाम मामलों का भी उल्लेख किया गया है। फिर भी उन्हें क्यों लगता है भारत में ज़्यादा लोकतंत्र है!
दरअसल अमिताभ कांत का ये बयान ऐसे वक़्त में आया है जब मुल्क के अंदर देश का किसान दिल्ली बॉर्डर पर आकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहा है। उसे अपने हक़ की लड़ाई लड़ने का ये अधिकार आज़ाद भारत के संविधान ने दिया है।
अमिताभ कांत के बयान से किसानों के आंदोलन के सन्दर्भ में यह ध्वनि निकल रही है कि सरकार की नीतियों, उसके फ़ैसलों पर बोलने की आज़ादी किसी को भी नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता अपना जनप्रतिनिधि चुनती है शासक नहीं। लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और सरकार उसकी नुमाइंदगी करती है। नौकरशाह सरकार के नौकर होते हैं, जिन्हें जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले टैक्स से वेतन मिलता है। लोकतंत्र में नौकरशाहों को यह हक संविधान ने भी नहीं दिया है कि वे संविधान के खिलाफ विषवमन करें।
प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 23:34 No comments:
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Saturday, 28 September 2019

देश को पूंजीवाद के पंजे से छुड़ाने के लिए भगत सिंह जैसे विचार की जरूरत


देश के जो हालात हैं। ऐसे में शहीद-ए-आजम भगत सिंह का याद आना लाजिमी है। जिस तरह से राजनीति का व्यवसायीकरण हुआ है। धंधेबाजों के हाथ में देश की बागडोर है। सियासत का मतलब बस एशोआराम, रूतबा और कारोबार रह गया है। देशभक्ति के नाम पर दिखाया है। युवा वर्ग देश व समाज के प्रति उदासीन और पथ से भटका हुआ है। किसान और जवान सत्ता के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द बनकर रह गये हैं। जमीनी मुद्दे देश से गायब हैं। रोजी-रोटी का देश पर बड़ा संकट होने के बावजूद दूर-दूर तक क्रांति की कोई चिंगारी नहीं दिखाई दे रही है। यदि कहीं से विरोध के स्वर उभरते भी हैं तो जाति और धर्म के नाम पर। या फिर कोई उस आवाज को इस्तेमाल कर रहा होता है। देश में विचारवान क्राङ्क्षतकारियों का घोर अभाव है। भले ही देश में लोकतंत्र स्थापित हुए सत्तर दशक बीत गये हों पर व्यवस्था के नाम पर अंग्रेजों के शासन से कोई खास सुधार देश के शासन में नहीं हुआ है। कहना गलत न होगा कि देश आजाद भी हुआ और समय समय पर सत्ता भी बदलती रही है पर व्यवस्था आज भी राजतंत्र और अंग्रेजी शासन वाली ही है। आज भी मु_ी भर लोगों ने देश की व्यवस्था पूरी तरह से से कब्जा रखी है। आम आदमी आज भी सिर पटक-पटक रह जा है पर उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं। संविधान की रक्षा के लिए बना गये तंत्र राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट और पूंजीपतियों की कठपुतली नजर आ रहे हैं। जनता भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी से जूझ रही है और देश को चलाने का ठेका लिए बैठे राजनेता वोटबैंक की राजनीति से आगे बढ़ने को तैयार नहीं। इसका बड़ा कारण यह है कि देश में देशभक्ति का घोर अभाव है। त्याग, बलिदान और समर्पण जैसे शब्द तो समाज के शब्दकोष में दूर-दूर तक नहीं नजर नहीं ही नहीं आ रहे हैं।
     हमारे देश में जब देशभक्ति की बात की जाती है तो सरदार भगत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। भगत सिंह ऐसे नायक हुए हैं। जिन्होंने युवाओं में आजादी का जज्ब पैदा करने के लिए अपनी शहादत देने का संकल्प लिया और तमाम मनाने के बावजूद उन्होंने शहादत दी। उनका मानना था कि उनकी शहादत के बाद ही युवाओं में देश की आजादी के प्रति जुनून जगेगा। हुआ भी यही भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बाद देश में इंकलाब आ गया और देश का युवा अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर ऐसे उतरा कि उन्होंने अंग्रेजों को खदेड़ कर ही दम लिया।  यही कारण रहा कि आजादी की लड़ाई में भगत सिंह के समर्पण के सामने दूसरे क्राङ्क्षतकारी बौने नजर आते हैं। वह भगत सिंह थे जिन्होंने उस दौर में इतनी कम उम्र में पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस की तुलना करते हुए एक लेख लिखा था। अंग्रेजों के साथ ही हमारी सरकारों ने भगत सिंह की छवि हमारे मन में ऐसी बना रखी हुई है कि उनका नाम आते ही लोगों के जहन में बंदूक से लैस किसी क्रांतिकारी की छवि उभरने लगती है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि 23 वर्ष की अल्पायु में भी वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंग्ला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ, चिन्तक और विचारक तो थे ही साथ ही समाजवाद के मुखर पैरोकार भी थे। आज की व्यवस्था और राजनेताओं की सत्तालिप्सा को देखकर लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि इससे तो बेहतर ब्रितानवी हुकूमत थी पर भगत सिंह ने 1930 में यह बात महसूस कर ली थी। उन्होंने कहा था कि हमें जो आजादी मिलेगी, वह सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही होगी। गरीबी पर पर लोग भले ही महात्मा गांधी के विचारों को ज्यादा तवज्जो देते हों पर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में गरीबी को न केवल अभिशाप बताया था बल्कि पाप तक की संज्ञा दे दी थी। आज भी भगत सिंह अपने विचोरों की ताजगी से सामायिक और प्रासंगिक ही लगते हैं। भगत सिंह को अधिकतर लोग क्रांतिकारी देशभक्त के रूप में जानते हैं पर वह सिर्फ एक क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कला के धनी, दार्शनिक, चिन्तक, लेखक और पत्रकार भी थे।
    बहुत कम आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैंड और रुस की क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था। लाहौर के नेशनल कालेज से लेकर फांसी की कोठरी तक उनका यह अध्ययन लगातार जारी रहा। उनका यही अध्ययन था जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है कि उन्हें हम और क्रांतिकारी दार्शनिक के रूप में जानते हैं। भगत सिंह के भीतर एक प्रखर अखबारनवीस भी था, जिसकी बानगी हम प्रताप जैसे अख़बारों के सम्पादन में देख सकते हैं। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक महान विचारक के ये महत्वपूर्ण विचार देश के तथाकथित कर्णधारों के षडयंत्र के फलस्वरूप अब तक उन लोगों तक नहीं पहुच पाए जिनके लिए वह शहीद हुए थे।
    सरकार का रवैया देखिये कि आजादी के लिए 23 साल की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह को सरकार शहीद ही नहीं मानती है। इस बात पर एक बारगी यकीन करना मुश्किल है पर सरकारी कागजों में यही दर्ज है। एक आरटीआई से इसका खुलासा भी हुआ है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल में तत्कालीन गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं कि भगत सिंह को कभी शहीद घोषित किया गया था।
प्रस्तुतकर्ता charansinghrajput पर 04:25 No comments:
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