Saturday, 15 October 2016

मौत के सौदागर बने कोटा के कोचिंग सेंटर संचालक

इसे शिक्षा का व्यवसायीकरण कहें। युवा पीढ़ी का भटकाव या परिजनों की निगरानी में न रहना या फिर भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था में निराशा का माहौल वजह जो भी हो दूरदराज शहरों में भविष्य बनाने जा रहे युवाओं में से काफी मौत को गले लगा रहे हैं। रात-दिन मेहनत कर पैसे जुटाने वाले परिजन सदमे में जा रहे हैं। स्थिति यह है कि एजुकेशन हब के नाम से प्रसिद्ध हो चुके राजस्थान के कोटा में इस साल 16 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की है। ये बात और दर्दनाक है कि इनमें से अधिकतर बिहार के हैं। हाजीपुर के अंकित गुप्ता ने चंबल नदी में छलांग लगाकर इसलिए आत्महत्या कर ली। क्योंकि वह मेडिकल में अपने माता-पिता के सपने को पूरा नहीं कर पा रहा था। गत दिनों एक छात्र ने 500 फुट इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र भी दो साल से मेडिकल की तैयारी कर रहा था। बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में रहता था। अभी कुछ ही दिन पहले बिहार से डॉक्टर बनने का सपना लेकर कोटा आई एक छात्रा ने फंदे से लटकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्रा भी हॉस्टल में रहकर मेडिकल की कोचिंग कर रही थी। छात्रा स्वभाव से खुशमिजाज बताई जा रही है। पढ़ने में भी तेज बताई जा रही यह छात्रा सीन साल से मेडिकल की तैयारी कर रही थी। इस छात्रा की तीन साल से कोचिंग करने की वजह से या तो उसे परिजनों के खर्चे की चिंता सता रही हो या फिर साथियों या परिजनों/रिश्तेदारों के ताने। जिस वजह से उसने मौत को गले लगाया।
   बात कोटा की नहीं है कि विभिन्न शहरों में इस तरह की खबरे सुनने को मिल जाती है। गत दिनों नोएडा के एमिटी विश्वविद्यालय में एक छात्र ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसी उपस्थिति कम होने की वजह से उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इन सब बातों को देखते हुए प्रश्न उठता है कि जीवन को उच्च स्तर का बनाने वाली शिक्षा को गृहण करते करते युवा आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? मामला इतना गंभीर है कि इन मामलों पर मंथन बहुत जरुरी हो गया है। क्या इन शिक्षण संस्थानों का माहौल ऐसा विषाक्त कर दिया गया है कि युवा इस माहौल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। या फिर बच्चों पर परिजनों के उच्च शिक्षा थोप देने की प्रवृत्ति या फिर रोजगार न मिलने की असुरक्षा। या फिर बात-बात पर समझौता करने वाली प्रवृत्ति के चलते युवा में समस्याओं से जूझने का कम हो रहा माद्दा। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप में सत्र खत्म होने वाले सत्र में इस तरह के संवेदनशील मुद्दे नहीं उठाए जाते हैं। जो मां-बाप तरह-तरह की समस्याओं का सामना करते-करते बच्चों की परवरिश करते हैं। सीने पर पत्थर रखकर बच्चों कों अपने से दूर कर देते हैं। जब उनको बच्चों की मौत की खबर सुनने मिलती तो उनकी मनोदशा क्या होती होगी ? क्या इस बात को कभी शिक्षा का व्यापारियों ने समझने की कोशिश की है ? सरकारों को वोटबैंक की राजनीति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। ये लोग तो वोट के लिए कभी आरक्षण की पैरवी करते हैं तो कभी जातिवाद धर्मवाद की और कभी क्षेत्रवाद की। बच्चों की भविष्य कैसे संवरे ? कैसे बच्चों में भाईचारा बढ़े। इससे न सरकारों को सरोकार है और न ही राजनीतिक दलों को। जिस देश का भविष्य ही दम तोड़ने लगे उसका दशा क्या होने वाली है बताने की जरूरत नहीं। कहीं आरक्षण के नाम पर जातिवाद का जहर। तो कहीं पर भेदभाव और कहीं पर क्षेत्रवाद। कभी कश्मीर में बच्चों के मरने की खबर सुनने को मिलती है तो कभी कर्नाटक में और कभी दिल्ली में। कुछ दिन तक राजनीति होती है और बाद में मामला शांत। जिसके घर से गया झेलता तो वह है। कब सुधरेगी यह व्यवस्था।
   राजनीति के बढ़ते वर्चस्व के चलते हर कोई राजनीति में जाना चाहता है। देश व समाज की सेवा करने नहीं बल्कि देश को लूटने। इस व्यवस्था में कहीं पर बच्चे अपराध की दलदल में फंसे जा रहे हैं तो कहीं पर टूटकर आत्महत्या कर ले रहे हैं। सरकारों व राजनीतिक दलों के साथ नौकरशाह को बस चिंता है तो बस लूटखसोट की। जब कोटा एक साल में इतने बड़े स्तर पर आत्महत्या के मामले सामने आए हैं तो सरकारी स्तर पर कोई जांच क्यों नहीं बैठाई गई। बच्चों के पढ़ने के बाद रोजगार ढूंढते समय तो आत्महत्या के मामले सुन लेते थे पर पढ़ाई करते समय आत्महत्या के बढ़ इन मामलों पर मंथन के साथ संबंधित शिक्षण संस्थानों में जांच कमेटी बैठाने की जरूरत है जो ईमानदारी से जांच रिपोर्ट सौंपे।

Wednesday, 12 October 2016

खुद्दारी व संघर्ष के पर्याय थे लोहिया

                               (12 अक्टूबर-पुण्यतिथि पर विशेष)


    जब हमारे देश में समाजवाद की बात आती है तो डॉ. राम मनोहर लोहिया का नाम सबसे ऊपर आता है। वह लोहिया ही थे, जिन्होंने 50 के दशक में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। लोहिया के समाजवाद को आगे बढ़ाते हुए 70 के दशक में इमरजेंसी के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में समाजवादियों ने कांग्रेस शासन की अराजकता के खिलाफ मोर्चा संभाला था। वह लोहिया की ही विचारधारा थी कि बिहार से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे दिग्गज देश की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर छाए। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए अपने दम पर कई सालों तक उत्तर प्रदेश पर राज किया आैर आज उनके पुत्र अखिलेश यादव भी लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। वह बात दूसरी है कि अब उन पर परिवारवाद, जातिवाद व अवसरवाद का आरोप लग रहा है।
   आज की राजनीति में भले ही समाजवादी अपनी विचारधारा से भटक गए हों पर शुरुआती दौर के समाजवादी जितने खुद्दार थे, उतने ही ईमानदार भी। जहां तक डॉ. राममनोहर लोहिया की बात है वह कितने खुद्दार थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनके पिता का निधन हुआ तो वह 'भारत छोड़ो आंदोलन" के चलते आगरा जेल में बंद थे आैर इस विकट परिस्थिति में भी उन्होंने ब्रिाटिश सरकार की कृपा पर पेरोल पर छूटने से इनकार कर दिया। देशभक्ति व ईमानदारी लोहिया को विरासत में मिली थी। उनके पिता श्री हीरालाल एक सच्चे देशभक्त अध्यापक थे। समाजवाद व संघर्ष उनमें बचपन से ही शुरू हो गया था। जब लोहिया ढाई वर्ष के थे तो उनकी माता चंदादेवी का देहांत हो गया आैर उनकी दादी व नाइन ने उनका पालन-पोषण किया। गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का असर लोहिया पर बचपन से ही पड़ गया था, उनके पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे आैर जब उनसे मिलने जाते तो लोहिया को अपने साथ ले जाते। वैसे तो राजनीति का पाठ लोहिया ने गांधी जी से सीखना शुरू कर दिया था पर सक्रिय रूप से वे 1918 में अपने पिता के साथ पहली बार अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। पहली हड़ताल उन्होंने लोकमान्य गंगाधर तिलक की मृत्यु के दिन अपने विद्यालय के लड़कों के साथ 1920 में की। 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू से उनकी पहली मुलाकात हुई। युवाओं में लोहिया की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्त थी कि कलकत्ता (अब कोलकाता) में अखिल बंग विद्यार्थी परिषद के सम्मेलन में सुभाषचंद्र बोस के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता भी की।
    लोहिया से उनका समाज इतना प्रभावित था कि समाज ने 1930 जुलाई को अपने कोष से उन्हें पढ़ने के लिए विदेश भेजा। लोहिया पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड गए आैर फिर वहां से बर्लिन। यह अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ लोहिया की बगावत ही थी कि 23 मार्च, 1931 को लाहौर में भगत सिंह को फांसी दिए जाने विरोध में बर्लिन में हो रही 'लीग ऑफ नेशंस" की बैठक में सीटी बजाकर दर्शक दीर्घा से उन्होंने इसका विरोध प्रकट किया। लोहिया ने किन परिस्थितियों में देश आैर समाज के लिए संघर्ष किया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब 1933 में वह मद्रास पहुंचे तो रास्ते में उनका सामान जब्त कर लिया गया। लोहिया समुद्री जहाज से उतरकर 'हिन्दू" अखबार के दफ्तर पहुंचे आैर दो लेख लिखकर 25 रुपए कमाए आैर इनसे कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता  से बनारस पहुंचकर उन्होंने मालवीय जी से मुलाकात की। मालवीय जी ने उन्हें रामेश्वर दास बिड़ला से मिलाया, जिन्होंने लोहिया को नौकरी का प्रस्ताव दिया पर दो हफ्ते रहने के बाद उन्होंने बिड़ला जी का निजी सचिव बनने से इनकार कर दिया।
   17 मई 1934 को पटना में आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हॉल में इकट्ठे हुए, जहां समाजवादी पार्टी की स्थापना का निर्णय लिया गया। लोहिया जी ने समाजवादी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की आैर पार्टी के उद्देश्यों में उन्होंने पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य जोड़ने का संशोधन पेश किया पर उसे अस्वीकार कर दिया गया, बाद में 21 अक्टूबर 1934 को बम्बई (अब मुंबई) के 'रेडिमनी टेरेस" में 150 समाजवादियों ने इकट्ठा होकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए आैर पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए। 1935 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया। दक्षिण कलकत्ता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण देने पर 24 मई 1939 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कलकत्ता के चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के सामने लोहिया ने खुद अपने मुकदमे की पैरवी आैर बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया।
   दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में दिए भाषण के कारण 11 मई 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की धारा 38 के तहत उन्हंे दो साल की सजा हुई। लोहिया देश के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए थे कि उस समय गांधी जी ने कहा था कि 'जब तक राम मनोहर लोहिया जेल में हैं मैं खामोश नहीं रह सकता। उनसे ज्यादा बहादुर आैर सरल आदमी मुझे मालूम नहीं।" चार दिसम्बर 1941 को अचानक लोहिया को रिहा कर दिया गया।
   आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ ही लोहिया व नेहरू में मतभेद पैदा हो गए थे आैर 1942 में इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में यह बात जगजाहिर हो गई। इस अधिवेशन में लोहिया ने पंडित जवाहर लाल नेहरू का खुलकर विरोध किया। इसके बाद अल्मोड़ा में जिला सम्मेलन में लोहिया ने नेहरू को 'झट से पलटने वाला नट" कहा।
   1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन" छेड़ने पर 9 अगस्त 1944 को गांधी जी व अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लेने के बाद लोहिया ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन का नेतृत्व किया। 20 मई, 1944 को लोहिया को बंबई से गिरफ्तार कर लिया गया आैर लाहौर जेल की उस कोठरी में रखा गया, जहां 14 वर्ष पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी। 1945 में लोहिया को आगरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। लोहिया से अंग्रेज सरकार इतनी घबराई हुई थी कि द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने पर गांधी जी समेत अन्य कांग्रेस नेताओं को तो छोड़ दिया गया, पर लोहिया को नहीं छोड़ा गया। बाद में 11 अप्रैल, 1946 को लोहिया को भी रिहा कर दिया गया।
   15 जून को लोहिया ने गोवा के पंजिम में गोवा मुक्ति आंदोलन की पहली सभा की। लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आंदोलन के शुरूआत में ही गिरफ्तार कर लिया गया। 1946 को जब देश में सांप्रदायिक दंगे भड़के तो नवाखाली, कलकत्ता, बिहार दिल्ली समेत कई जगहों पर लोहिया, गांधी जी के साथ मिलकर सांप्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशिश करते रहे। 9 अगस्त, 1947 से हिंसा रोकने का काम युद्धस्तर से शुरू हो गया। 14 अगस्त की रात को 'हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई" के नारे के साथ लोहिया ने सभा की। स्वतंत्रता मिलने के बाद 31 अगस्त को वातावरण फिर बिगड़ गया। गांधी जी अनशन पर बैठ गए। उस समय लोहिया ने दंगाइयों के हथियार इकट्ठे कराए आैर उनके प्रयास से 'शांति समिति" की स्थापना हुई आैर चार सितम्बर को गांधी जी ने अनशन तोड़ दिया। देश में लोकतंत्र स्थापित करने में भी लोहिया का विशेष योगदान रहा है। आजादी मिलने के बाद लोहिया की प्रेरणा से 650 रियासतों की समाप्ति का आंदोलन समाजवादी चला रहे थे। दो जनवरी 1948 को रीवा में 'हमें चुनाव चाहिए विभाजन रद्द करो" के नारे के साथ आंदोलन किया गया।
   1962 के आम चुनाव में लोहिया, नेहरू के विरुद्ध फूलपुर में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर 1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने तिब्बत के सवाल को उठाया। 1963 को फरुखाबाद के लोकसभा उप चुनाव में लोहिया 58 हजार मतों से चुनाव जीते।  लोकसभा में लोहिया की 'तीन आना बनाम पंद्रह आना" बहस बहुत चर्चित रही। उस समय उन्होंने 18 करोड़ आबादी के चार आने पर जिंदगी काटने तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च करने का आरोप लगाया। 9 अगस्त 1965 को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया।
   30 सितम्बर 1967 को लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल, जो आजकल डॉ. राममनोहर लोहिया के नाम से जाना जाता है में पौरुष ग्रंथि के ऑपरेशन के लिए भर्ती कराया गया, जहां 12 अक्टूबर 1967 को उनका निधन हो गया।

Wednesday, 28 September 2016

हर मां को पैदा करना होगा भगत सिंह

   भले ही देश की सत्ता बदल चुकी हो पर व्यवस्था नहीं बदली है। आज भी मुट्ठी भर लोगों ने देश की व्यवस्था ऐसे कब्जा रखी है कि आम आदमी सिर पटक-पटक रह जाता है पर उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती। जनता भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी से जूझ रही है अौर देश को चलाने का ठेका लिए बैठे राजनेता वोटबैंक की राजनीति करने में व्यस्त हैं। मेरा मानना है कि यह व्यवस्था बदल सकती है तो देशभक्ति से बदल सकती है। लोगों के मरते जा रहे जमीर को जगाकर कर बदल सकती है। जब देशभक्ति की बात आती है तो सरदार भगत सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अब पड़ोसियों के घर में भगत सिंह के पैदा होने की सोच से काम नहीं चलेगा। अब देश के लिए हर मां को भगत सिंह पैदा करना होगा। भगत सिंह ऐसे नायक थे, जिनकी सोच यह थी कि उनकी शहादत के बाद ही युवाओं में देश की आजादी के प्रति जुनून जगेगा। हुआ भी यही भगत सिंह के फांसी दिए जाने के बाद देश का युवा अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतर आया और अंग्रेजों को खदेड़ कर ही दम लिया। 
   भगत सिंह का नाम आते ही हमारे जहन में बंदूक से लैस किसी क्रांतिकारी की छवि उभरने लगती है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि २३ वर्ष की अल्पायु में भी वह हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंग्ला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ, चिन्तक और विचारक तो थे ही, समाजवाद के मुखर पैरोकार भी थे। आज की व्यवस्था और राजनेताओं की सत्तालिप्सा को देखकर लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि इससे तो बेहतर ब्रितानवी हुकूमत थी पर भगत सिंह ने 1930 में यह बात महसूस कर ली थी। उन्होंने कहा था कि हमें जो आजादी मिलेगी, वह सत्ता हस्तांतरण के रूप में ही होगी। गरीबी पर पर लोग भले ही महात्मा गांधी के विचारों को ज्यादा तवज्जो देते हों पर भगत सिंह ने छोटी सी उम्र में गरीबी को न केवल अभिशाप बताया था बल्कि पाप तक की संज्ञा दे दी थी। आज भी भगत सिंह अपने विचोरों की ताजगी से सामायिक और प्रासंगिक ही लगते हैं।
   भगत सिंह को अधिकतर लोग क्रांतिकारी देशभक्त के रूप में जानते हैं पर वह सिर्फ एक क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कला के धनी, दार्शनिक, चिन्तक, लेखक और पत्रकार भी थे। बहुत कम आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैंड और रुस की क्रांतियों का गहन अध्ययन किया था। लाहौर के नेशनल कालेज से लेकर फांसी की कोठरी तक उनका यह अध्ययन लगातार जारी रहा कि और यही अध्ययन था जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करता है कि उन्हें हम और क्रांतिकारी दार्शनिक के रूप में जानते हैं। भगत सिंह के भीतर एक प्रखर अखबारनवीस भी था, जिसकी बानगी हम प्रताप जैसे अख़बारों के सम्पादन में देख सकते हैं। यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि एक महान विचारक के ये महत्वपूर्ण विचार देश के तथाकथित कर्णधारों के षडयंत्र के फलस्वरूप अब तक उन लोगों तक नहीं पहुच पाए जिनके लिए वह शहीद हुए थे।
   सरकार का रवैया देखिये कि आजादी के लिए २३ साल की छोटी सी उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह को सरकार शहीद ही नहीं मानती है। इस बात पर एक बारगी यकीन करना मुश्किल है पर सरकारी कागजों में यही दर्ज है। एक आरटीआई से इसका खुलासा भी हुआ है। आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल में गृह मंत्रालय ने साफ किया है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं कि भगत सिंह को कभी शहीद घोषित किया गया था।

Friday, 16 September 2016

अमर बेल की चपेट में मुलायम परिवार

  किसी समय समाजवादी पार्टी में पूरी तरह से दखल रखने वाले राज्यसभा सदस्य अमर सिंह की दूसरी पारी में नहीं चल पा रही है तो वह कुछ न कुछ तो जरूर करेंगे। कैसे पार्टी में उनका हस्तक्षेप बढ़े, कैसे वह पुराना रुतबा कायम करें। इसी उधेड़बुन में वह पूरी से लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने जहां कभी उनके सबसे ज्यादा मुखर विरोधी रहे शिवपाल सिंह यादव साधा है वहीं नेताजी पर भी पूरी तरह से पकड़ बना ली है। यही वजह रही कि जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनसे फोन पर बात नहीं की तो इस मलाल को लेकर वह मीडिया के सामने आ गए। अखिलेश का 'चाचा से ही बात करता रहूंगा तो काम कब करूंगा।Ó के बयान ने आग में घी डालने का काम किया।
     हर जगह घुसपैठ रखने वाले अमर सिंह को जब गायत्री प्रजापति पर सीबीआई का शिकंजा कसने की खबर पहुंची तो उन्होंने इस बारे में तत्कालीन मुख्य सचिव दीपक सिंघल से नेताजी को कहलवाया। नेताजी के कहने पर अखिलेश यादव ने गायत्री प्रजापति व किशोर सिंह को मंत्री पद से हटा दिया। क्योंकि गायत्री प्रजापति नेताजी के करीबी थे तो तरह-तरहके कयास लगाए गए। गायत्री प्रजापति के नेताजी के मिलने पर उन्होंने दीपक सिंघल की बात का हवाला दिया।
     अमर सिंह ये सब कर अपने को पार्टी का हितैषी दिखाने का प्रयास कर रहे थे। अपने को मुलायमवादी कहने वाले अमर सिंह ने फाइव स्टार पार्टी में आज के समाजवाद का तड़का लगाने के लिए लोहियावादी मुलायम सिंह को बुलाया। शिवपाल सिंह भी पूरे अधिकार के साथ पार्टी में पहुंचे। समय-समय पर मुस्लिम चेहरा आजम खां और प्रवक्ता रामगपोल यादव का विरोध झेलने वाले अमर सिंह को अखिलेश यादव की उपेक्षा इतनी परेशान कर रही थी कि उन्होंने पार्टी में सरकार के फैसले को लेकर अखिलेश की बुराई शुरू कर दी। पार्टी में मौजूद मुख्य सचिव दीपक ङ्क्षसघल ने अपने को उनका करीबी जताने के लिए उनके सुर में सुर मिलाए तो मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह ने रात में दीपक सिंघल को उनके पद से हटा दिया। मामले से तिलमिला अमर सिंह के कहने पर जब नेताजी ने अखिलेश यादव को दीपक सिंघल को उनके पद पर बहाल करने दबाव बनाया तो मुख्यमंत्री ने गलत संदेश जाने की बात कहकर उनकी बात न मानी। इन सबके बीच अमर सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधे। इन सबके बीच अमर सिंह ने एक गांव खेला कि अखिलेश पर मुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष पद होने का हवाला देते हुए  अध्यक्ष पद शिवपाल सिंह को दिलवा दिया। यह फैसला करा अमर सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधे। एक से उन्होंने अखिलेश यादव को नीचा दिखा दिया दूसरे से अब संगठन में उनका हस्तक्षेप बढ़ जाएगा।
    चुनाव के समय संगठन में पकड़ का क्या महत्व होता है, यह अखिलेश बखूबी जानते हैं। इसी वजह से अध्यक्ष पद जाने के बाद उन्होंने बिना पार्टी मुखिया के पूछे शिवपाल सिंह यादव से उनके मंत्री पद छीन लिए। इस प्रकरण पर अमर सिंह का अखिलेश यादव को अपना बेटा कहते हुए 'यदि अखिलेश उनके थप्पड़ भी मार दे तो वह उसके हाथ में चोट के बारे में चिंतित होंगे।Ó कहना जले पर नमक छिड़कना था। अखिलेश की बाहरी आदमी का दखल कहते हुए नाराजगी व्यक्त करना मामले को उजागर कर रहा है।
    पार्टी महासचिव व प्रवक्ता रामगोपाल यादव का अखिलेश को अध्यक्ष पद हटाना नेताजी की गलती बताना अखिलेश के पाले में खड़ा कर रहा है । अमर सिंह का सियासी दलाल कहने वाले आजम खां मामले में तटस्थ की भूमिका निभाते हुए तमाशबीन की भूमिका में हैं। ये सब बातें अपनी-अपनी लॉबी को मजबूत करती दिख रही हैं। इन सबके बीच फंस गए हैं नेताजी। वैसे नाराजगी दिखाने व मनाने का दौर राजनीति में चलता रहता है।
    दरअसमल सपा में दो लॉबी बन गई हैं। एक में शिवपाल सिंह यादव व अमर सिंह दूसरी में अखिलेश यादव व रामगोपाल यादव। नेताजी के राजनीतिक करियर का यह समय सबसे चुनौतीपूर्ण है। मामले बेटे व भाई के बीच का है। नेताजी को जहां अपने बेटे के वजूद का ध्यान रखना और भाई की भावनाओं का भी। साथ विधानसभा चुनाव सिर पर। इस प्रकरण ने यह तो साफ कर दिया कि नेताजी पर अमर सिंह की पकड़ फिर से मजबूत हो गई है। आजकल वह रामगोपाल यादव व मो. आजम खां से अधिक बातें अमर सिंह की मान रहे हैं। यही वजह है कि अमर िसिंह ने मुलायम सिंह पार्टी, अखिलेश व अपना बाप तक कह दिया। पार्टी में इतने बड़े स्तर पर उभर कर आई इस तल्खी में पार्टी व सरकार फिर मुलायम सिंह के भरोसे है। मुलायम सिंह यादव ही हैं, अभी भी जिनका प्रभाव अखिलेश यादव व शिवपाल सिंह दोनों पर है। अमर सिंह की अति महत्वाकांक्षा का क्या होगा ? अमर सिंह चाह रहे हैं या तो पार्टी में उनका रुतबा मुलायम सिंह सरकार जैसा हो या फिर एक लॉबी को वह लीड करें। वह नेताजी व शिवपाल सिंह को अपने साथ देख रहे हैं। यही वजह है कि वह खुलकर खेल रहे हैं।
    हां खेल बहुत खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। मामला बाप-बेटे की प्रतिष्ठा का बन गया है। इस खेल के बाद घटते घटनाक्रम से देखने से तो यही लग रहा है कि कम से कम अखिलेश यादव अब अमर सिंह का चेहरा तो देखना नहीं चाहते। अमर सिंह भी मुलायम सिंह व शिवपाल सिंह के माध्यम से अखिलेश यादव को अपना वजूद दिखाने में लगे हैं।
    दरअसल लड़ाई भले ही दिखाई दे रही हो अखिलश व शिवपाल के बीच की पर लड़ाई है अखिलेश यादव व अमर सिंह के बीच। अखिलेश की समझ में यह आ गया है कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। जब से अमर सिह पार्टी में आए हैं तब से शिवपाल सिंह ज्यादा मुखर हुए हैं। भले ही शिवपाल सिंह ने नेताजी की बात मानते हुए मुख्यमंत्री की बात मानने की बात कही है पर संगठन के माध्यम से वह अपना वजूद दिखाने तथा अखिलेश को नीचा दिखाने से बाज नहीं आएंगे। राजनीति का माहिर खिलाड़ी रहे नेताजी इतनी आसानी से पार्टी के दो फाड़ नहीं होने देंगे पर पार्टी में बन चुकी दो लॉबियों में नेताजी की क्या भूमिका है ? अब देखना यह है कि मुलायम सिंह इन लॉबियों को खत्म करते हैं या फिर खुद भी एक लॉबी में खड़े हो जाते हैं। वैसे शिवपाल सिंह को लेकर नेताजी संगठन को लेकर अखिलेश पर अपना गुस्सा जता चुके हैं।
    राजनीति में चतुर खिलाड़ी माने जाने वाले अमर सिंह आने वाले समय में अपने हिसाब से इस प्रकरण को जोड़ेंगे। यदि पार्टी में दो फाड़ होकर परिवार में बगावत होती है तो अपने अपमान का बदला लेने की बात कहते हुए अपनी भड़ास निकालने से बाज नहीं आएंगे। हां यदि इस प्रकरण से अखिलेश यादव का कद और बढ़ा तो अमर सिंह नई कहानी गढ़ सकते हैं। उस स्थिति में अमर सिंह पुन: सरकार बनाने के लिए अखिलेश यादव के चेहरे को निखारने के लिए यह सब रणनीति का हिस्सा बताते फिरेंगे। वैसे भी अखिलेश के हाथों वह अपमानित होना गलत नहीं मान रहे हैं।
    इस नए राजनीतिक प्रकरण से यह बात भी समझ में आ रही है कि नेताजी के वृद्ध होने की वजह से उनका उत्तराधिकारी बनाने की सियासी तैयारी चल रही हो। ये सब अखिलेश को पार्टी की बागडोर देने के लिए चल रहा हो। इतिहास बताता है कि राजनीति में पुत्र के सामने भाईयों का अस्तित्व कम हो जाता है। तो मुलायम सिंह अखिलेश यादव के सामने रामगोपाल या शिवपाल को पार्टी की बागडोर नहीं देना चाहेंगे।
उधर मो. आजम खां भी समय-समय पर अपने तेवर दिखाते रहते हैं। अमर सिंह भी जानते हैं कि अखिलेश यादव मुखिया की वजह से भले ही न माने पर पिता के नाते मुलायम सिंह यादव की बात नहीं टालेंगे। इस प्रकरण पर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही है पर सब कुछ दूसरी बार सरकार बनाने को लेकर हो रही कवायद का हिस्सा है। यदि अखिलेश यादव इतने बड़ी निर्णय लेने वाले थे तो पहले क्यों नहीं लिए। अब चुनाव के समय ही उन्हें ये सब दिखाई दे रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुलायम सिंह अमर सिंह की लिखी स्प्रिप्ट में गायत्री प्रजापति, किशोर सिंह, दीपक सिंघल, शिवपाल सिंह यादव, अखिलेश यादव, रामगोपाल सिंह विभिन्न पात्रों की भूमिका में हैं।
    इसमें दो राय नहीं कि पार्टी को यहां तक पहुंचान में मुलायम सिंह और अमर सिंह की जोड़ी का अहम रोल रहा है। भले ही संगठन में बड़े स्तर पर अमर सिंह के अलोचक रहे हों पर नेताजी ने अमर सिंह को हमेशा से ही अपने दिल के करीब बताया है। नेताजी जानते हैं कि पार्टी के आगे बढ़ाने में अमर सिंह  क्या योगदान ? ऐसे ही नेताजी ने अमर ङ्क्षसह के कहने पर बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर, मो. आजम खां जैसे कद्दावर नेताओं को पार्टी से निकाल दिया था। वह बात दूसरी है कि बेनी प्रसाद वर्मा और आजम खां फिर से पार्टी में आ गए हैं।
    हां अमर सिंह को यह भी नहीं भू्लना चाहिए कि नेताजी कभी भी किसी के भी उकसावे में अपने परिवार के किसी सदस्य को पार्टी से नहीं निकाल सकते। अखिलेश यादव तो उनका प्रिय पुत्र और उनका उत्तराधिकारी है। अमर सिंह को याद करना होगा कि रामगोपाल सिंह को पार्टी से निकलवाने के चक्कर में उन्हें खुद पार्टी से हाथ धोना पड़ा था ।