Friday, 29 July 2016

उप्र चुनाव : मायावती को मिला मजबूत हथियार

स्वामी प्रसाद मौर्य व आरके चौधरी की बगावत के बाद लगातार दलितों के निशानों को झेल रहीं मायावती को भाजपा उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह के 'वेश्याÓ संबंधी बयान ने उत्तर प्रदेश चुनावी दंगल में जोर आजमाइश का एक मजबूत हथियार दे दिया है। जिस हथियार बल पर मायावती ने दलितों को एकजुट किया था, वही हथियार उनके हाथ में उस समय थमा दिया गया, जब दलितों के दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर उन पर पार्टी के संस्थापक कांशीराम की नीतियों से भटकने तथा टिकट बेचने का आरोप लगा रहे हैं।
   अपनों के आरोपों से जूझ रहे मायावती ने बड़ी चालाकी से दलितों के अपमान का हवाला देकर पार्टी से छिटके दलितों को सवर्णांे के खिलाफ भड़का दिया है। भले ही बसपा नेताओं ने दयाशंकर सिंह के परिजनों को भद्दी-भद्दी गालियां दे दी हों। भले ही नसीमुद्दीन सिद्धिकी की गिरफ्तारी को लेकर भाजपा सड़कों पर हो पर मायावती के दांव के सामने भाजपा के सभी दांव फेल होते नजर आ रहे हैं।
    भाजपा को यह सोचना होगा कि जो माहौल भाजपा दलित-बनाम सवर्ण बनाने का प्रयास कर रही है। वही कार्ड कांग्रेस ने भी खेला है। कांग्रेस ने जहां ब्राह्मण चेहरे के रूप में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का दावेदार बनाया है। वहीं ठाकुर चेहरा संजय सिंह को चुनाव समिति के चीफ बनाया है। प्रमोद तिवारी पहले ही एक ब्राह्मण चेहरा मौजूद है। सपा में भी ठाकुर व ब्राह्मण बहुतायत में हैं। इतना ही नहीं मायावती से टिकट मांगने वाली लाइन में सबसे अधिक सवर्ण ही हैं। ऐसे में इस प्रकरण से भाजपा को फायदा हो या न हो पर मायावती इस मुद्दे को कैश करा ले जाएंगी। मौके की नजाकत को भांपते हुए इस प्रकरण में दिलचस्पी ले रही सपा को भी कुछ सूझ नहीं रहा है।
     सपा ने ठाकुरों को रिझाने के लिए दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वामी सिंह के पक्ष में बलिया से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह के पुत्र नीरज शेखर को लगा दिया है। ये लोग यह भूल गए हैं कि ये वही मायावती हैं कि जिन्होंने 'तिलक तराजू और तलवार इनके मारो जूतें चारÓ का नारा देकर दलितों को एकजुट किया था। भले ही दयाशंकर के परिवार के साथ सपा नेता नीरज शेखर समेत कई सामाजिक संगठन आ गए हों पर दयाशंकर की एक भूल ने मायावती की पौ बारह कर दी है। मायावती अब इस मुद्दे को चुनाव में कैश कराने में युद्ध स्तर पर जुट गई हैं। अब वह दलितों के अपमान से जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश में रैलियां करने जा रही हैं। इसकी पहल वह आगरा से कर रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों की संख्या बहुतायत में है, जिन्हें उकसाने के लिए उनके लिए यह मुद्दा बहुत है।     
     भाजपाइयों को यह समझना होगा कि गुजरात में बच्चों व मध्य प्रदेश में महिलाओं की पिटाई मामले को मायावती ने पूरी तरह से सुलगाकर दलितों में मैसेज दे दिया है। समझने की बात यह है कि उत्तर प्रदेश चुनाव ही नहीं मायावती इस मामले को पंजाव व उत्तरांचल चुनाव में भी लेकर जाएंगी। भले ही दयाशंकर सिंह के परिवार की तहरीर पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया हो। बिहार में भी एक मामला दर्ज करा दिया गया हो पर इस वोटबैंक की राजनीति में मायावती ने बढ़त बना ली है।
    मायावती की चतुराई देखिए कि माहौल को देखते हुए उन्होंने दलितों की न कहकर अपने को गरीबों की देवी बताया। इस प्रकरण से जहां भाजपा के दलितों को संगठन से जोड़ने के अभियान को झटका लगा है वहीं आरएसएस के दलितों के रिझाने का प्रयास भी कमजोर हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए जो भाजपा दलित कार्ड खेलने के फिराक थी, मायावती ने उसकी हवा ही निकाल दी है। इसके लिए भाजपा हाईकमान की संगठन पर नियंत्रण न रहना भी कहा जा सकता है।
    भले ही अभी जल्दबाजी लग रही हो पर जो गलती आरएसएस ने बिहार चुनाव में आरक्षण का मुद्दा छेड़कर लालू प्रसाद को एक मजबूत हथियार दे दिया था। ठीक उसी तरह से दयाशंकर सिंह ने मायावती को लेकर आपत्तिजनक बयान देकर मायावती का एक मजबूत हथियार दे दिया है। आरक्षण वाला बयान भी भावनाओं से जुड़ा था और दयाशंकर का आपत्तिजनक बयान भी भावनाओं से जुड़ा है। भावनाओं से जुड़ा बयान दयाशंकर सिंह के परिजनों को गाली देना वाला भी है पर आज की तारीख में जो जागरूकता दलितों में वह सवर्ण में नहीं दिखाई दे रही है।
   उधर मायावती को फॉर्म में आती देख नेताजी के माथे पर भी बल पड़ गए हैं। कांशीराम की नीतियों से भटकने का आरोप लगाकर मायावती को कटघरे में खड़ा कर रहे दलित नेताओं के बयानों से जो नेताजी मन ही मन मुस्करा रहे थे, वे अब बसपाईयों के दलितों के अपमान का हवाला देकर आक्रामक रुख अपमाने पर असहज महसूस कर रहे हैं। जगजाहिर है कि देश में एकमात्र मायावती ही ऐसी नेता हैं जो अपने वोटबैंक को किसी भी पार्टी में कंवर्ट करा सकती हैं। कहना गलत न होगा कि मायावती ने एक दांव से ही उत्तर प्रदेश चुनाव में बढ़त बना ली है। भले ही संसद में भाजपा के दिग्गजों ने मायावती से माफी मांग ली हो। भले ही बसपाईयों के उग्र रूप धारण कर लेने पर भाजपा और सपा लगातार मायावती पर निशाना साध रही हो। भले ही दयाशंकर सिंह के परिवार मायावती के विरोध और दयाशंकर के पक्ष में सड़कों पर उतर आया हो पर मायावती ने अपनी गति पकड़ ली है। यदि चुनाव में सपा व भाजपा को कोई मजबूत मुद्दा न मिला तो मायावती की रफ्तार को रोकना मुश्किल लग रहा है।

Sunday, 3 July 2016

दांव पर चरण सिंह की राजनीतिक विरासत


   उत्तर भारत में मजबूत पकड़ बनाने वाले चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत संभाल रहे अजित सिंह की राजनीतिक हैसियत का हाल यह हो गया कि राज्यसभा के लिए वह कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। आलम यह है कि वह जिस दल से गठबंधन की बात करते हैं वह उनकी पार्टी का अपने में विलय चाहता है। यह अजित सिंह का गिरता राजनीतिक स्तर ही है कि उन्हें उस पार्टी से मिलने से कोई उरेज नहीं कि जो उनके हरित प्रदेश के मुद्दे के सख्त खिलाफ है। कभी जदयू तो कभी भाजपा आैर कभी सपा से गठबंधन करने को बेताब अजित सिंह का हाल त्रिशंकू वाला हो गया है। आम चुनाव में अस्तित्व बचाने में नाकाम रहे छोटे चौधरी की सत्तालोलुपता के चलते देश के समाजवादियों को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाले चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत दांव पर लग गई है।
   संघमुक्त भारत का नारा देकर देश को विकल्प देने देने निकले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चौधरी चरण सिंह का नाम भुनाने के लिए अजित सिंह को साथ लेना चाहा। मामले को लेकर कई दौर की वार्ता भी चली। उत्तर प्रदेश चुनाव में जयंत चौधरी को चेहरा बनाने की तैयारी थी। खतरे को भांपकर नीतीश कुमार का खेल बिगाड़ने के लिए अमित शाह ने अजित सिंह को राज्यसभा का लालच दिया। जब अजित सिंह नीतीश कुमार से अलग होकर भाजपा से सट गए तो उन्होंने रालोद के भाजपा में विलय की शर्त रख दी। भाजपा में बात न बनती देख अजित सिंह मुलायम की शरण में गए। सपा महासचिव शिवपाल सिंह यादव से उनकी कई दौर की वार्ता चली। अजित सिंह की फितरत से वाकिफ मुलायम सिंह ने भी विलय के बाद ही राज्यसभा भेजने की बात कही। अजित सिंह का राजनीतिक इतिहास रहा है कि सत्ता के लिए उन्होंने किसी भी दल से गठबंधन किया तथा किसी का भी साथ छोड़ दिया। यही वजह रही कि चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत लगातार सिमटती गई।
जगजाहिर है कि मुलायम सिंह को अपना सबसे प्रिय शिष्य मानने वाले चरण सिंह अंतिम समय में पुत्र मोह के चलते अपनी राजनीतिक विरासत अजित सिंह को सौंप गए थे।  अजित सिंह की संगठन पर पकड़ इतनी ढीली थी कि 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे पर विधायकों ने मुलायम सिंह को अपना नेता चुना। वह बात दूसरी है कि 1992 में मुलायम सिंह यादव अलग होकर अपनी पार्टी (सपा) बना ली। यह समय की नजाकत ही है कि जिस अजित सिंह को मुलायम सिंह यादव अपने में मिलाना चाहते हैं उनके ता चौधरी चरण सिंह की स्वीकार्यता व लोकप्रियता का आलम यह है कि यादव बहुल आजमगढ़ जिले से उनके भारतीय क्रांति दल को सन 1969 में 14 में से 14 विधानसभा सीटें मिली थी।
आज जो भाजपा चरण सिंह की राजनीतिक विरासत को अपने में मिलाने की बात कर रही है इसके गठन से पहले ही चरण सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। वह चरण सिंह ही थे जिन्होंने कांग्रेस के ब्रााह्मण, मुस्लिम व दलित वोटबैंक के विरोध में 'अजगर" बनाने का आह्वान किया। उन्होंने तर्क दिया कि अहीर, जाट, राजपूत व गुर्जरों का मुख्य पेशा खेती है तो इन लोगों के एकजुट होने ने किसान हित की लड़ाई लड़ना आसान हो जाएगा। आज के दौर में भले ही पिछड़ों की राजनीति आरक्षण व जातिवाद पर टिकी हो पर चौधरी चरण सिंह ने लोगों से रोजी-बेटी का रिश्ता जोड़ने को कहा। इसकी पहल उन्होंने स्वयं से की थी। यही वजह थी कि एक बेटी को छोड़ उन्होंने सभी बेटियों का विवाह अंतरजातीय किया। भले ही आज पिछड़ों के हितैषी होने का दंभ मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, शरद यादव व नीतीश भर रहे हों पर यादवों के उत्थान की पैरवी सबसे पहले चौधरी चरण सिंह ने  की थी। यही वजह थी कि उन्हें तबके पूर्वांचल के कद्दावर नेता बनारस, गाजीपुर आैर आजमगढ़ समेत कई जिलों में चौधरी चरण सिंह यादव कहकर नारे लगाते थे।
गुर्जर भले ही रामचंद्र विकल को अपना नेता मानते हों पर गुर्जरों के उत्थान के लिए रामचंद्र विकल से ज्यादा चरण सिंह ने किया। सन 1969 में विधानसभा चुनाव में पश्चिम उत्तर प्रदेश से चरण सिंह की बीकेडी से 11 विधायक गुर्जर बिरादरी से बने थे। यह चरण सिंह की विचारधारा ही थी कि वर्तमान की उत्तर प्रदेश की सपा सरकार चरण सिंह की नीतियों पर चलने का दंभ भर  रही है तो उनके पुत्र आैर रालोद प्रमुख अजीत सिंह उनके नाम का सुख भोग रहे हैं। आज भले ही उनके शिष्य जातिवाद व परिवारवाद की चपेट मे आ गए हों। इनके समाजवाद पर अवसरवाद आैर पूंजीवाद हावी होता दिख रहा है पर चौधरी चरण सिंह पूंजीवाद आैर परिवारवाद के घोर विरोधी थे। हालांकि उन पर भी अंत समय में पुत्र मोह के जागने का आरोप लगता रहा है। वह चरण सिंह ही थे कि उत्तर प्रदेश में नक्सलवाद जड़ंे न जमा सका। जमींदारी उन्मूलन कानून से उन्होंने जमीन का सामाजिक बंटवारा किया। वह राजनीतिक लड़ाई संकल्पों के सहारे जीतने का माद्दा रखते थे, यही वजह रही कि उन्होंने कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त करने का जो संकल्प लिया तो उसे पूरा भी किया। शून्य से शिखर पर पहुंचकर भी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
चरण सिंह के वजूद की बात करें तो सत्तर के दशक में जेपी आंदोलन में अग्रिम भूमिका निभाने वालों में से चरण सिंह भी एक थे। 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो कांग्रेस के खिलाफ सारे समाजवादियों ने एकजुट होकर आंदोलन छेड़ा। इन समाजवादियों का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण कर रहे थे। मोरारजी देसाई, मधु लिमये के साथ चौधरी चरण सिंह जयप्रकाश के कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन की अगुआई की। इसी आंदोलन की बदौलत 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी आैर मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री। हालांकि बाद में संजय गांधी ने ने राज नारायण आैर चौधरी चरण सिंह को बरगलाकर समाजवादियों में फूट डाल दी। राजनीतिक जानकार चौधरी चरण सिंह की यह पहली आैर अंतिम गलती मानते हैं। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री तो बन गए पर वह संसद में नहीं जा सके।
चरण सिंह के संघर्ष का असर अजित सिंह से ज्यादा सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पर पड़ा। अजित सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सिमट कर रह गए आैर मुलायम सिंह तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने आैर अब उनके पुत्र अखिलेश यादव प्रदेश की बागडोर संभाले हुए हैं। नेताजी चौधरी चरण सिंह की वजह से अजित सिंह को भी साथ लेकर चलते रहे हैं पर अजित सिंह की सत्तालोलुपता के चलते हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ऐसे में नेताजी अजित सिंह को कोई मौका देने को तैयार नहीं।

Saturday, 28 May 2016

लोहिया के 'कांग्रेस मुक्त भारत" के नारे को पूरा करते संघी

   एक समय प्रख्यात समाजवादी डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 'कांग्रेस मुक्त भारत" का नारा दिया था तो आज की राजनीति में देश को विकल्प देने निकले उनके अनुयाई नीतीश कुमार ने 'संघ मुक्त भारत" का नारा दिया है। नीतीश कुमार का नारा कब पूरा होगा यह तो समय बताएगा पर लोहिया का नारा पूरा होते दिखाई देने लगा है। दिलचस्प बात यह है कि इस नारे को उनके अनुयाई पूरा नहीं कर रहे हैं बल्कि वे संघी कर रहे हैं जिनसे उनके अनुयाई देश को मुक्त कराना चाहते हैं। खुद नीतीश कुमार कांग्रेस की मदद से बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। जेपी आंदोलन को छोड़ दें तो अधिकतर समाजवादी किसी न किसी रूप में कांग्रेस से उपकृत होकर उसे मजबूत करते रहे हैं। हां संघियों ने जहां कांग्रेस के खिलाफ लड़ी जाने वाली हर लड़ाई में समाजवादियों का साथ दिया वहीं न कभी कांग्रेस की मजबूती में सहयोग दिया आैर न ही कांग्रेस की मदद ली। चाहे देश को विकल्प देने का दावा कर रहे नीतीश कुमार हों, प्रधानमंत्री पद का सपना संजोए नेताजी हों या फिर नेताजी के प्रधानमंत्री बनने में रोड़ा अटकाने वाले राजद प्रमुख लालू प्रसाद या फिर समय-समय पर कांग्रेस को कोसने वाले वामपंथी, ये सब कभी न कभी कांग्रेस से सटे हैं। वामपंथियों ने तो पश्चिमी बंगाल में इसका खामियाजा भी भुगत लिया। कांग्रेस से गठबंधन क्या किया कि कांग्रेस से ही पिछड़ गए, जिस तरह से कांग्रेस ने पहले दिल्ली खोई आैर अब पूर्वोत्तर में असम व केरल भी उसके हाथ से निकल गए। कांग्रेस की दुर्दशा से तो ऐसा ही लग रहा है कि आने वाले समय में कहीं उत्तरांचल व कर्नाटक भी कांग्रेस के हाथ से न निकल जाए।
    कांग्रेस के विरोध की बात करें तो आजादी की लड़ाई में भी कांग्रेसियों की सत्ता ललक से नाराज डॉ. राम मनोहर लोहिया ने समाजवादियों का एकजुट करना शुरू कर दिया था। यही वजह रही कि उन्होंने आजाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की नीतियों का जमकर विरोध किया तथा 'कांग्रेस मुक्त भारत" का नारा दिया। यह लोहिया की समाजवादी विचारधारा ही थी कि वह अंतिम समय तक कांग्रेस की नीतियों से टकराते रहे। 70 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अराजकता के खिलाफ डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथी रहे लोक नायक जयप्रकाश के नेतृत्व में समाजवादी एकजुट हुए आैर देश में बड़ा आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में संघियों ने आगे बढ़कर समाजवादियों का साथ किया। हां इमरजेंसी में कुछ संघियों पर इंदिरा गांधी से माफी मांगकर जेल से बाहर आने के आरोप भी लगे थे। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो संघी भी सरकार में शामिल हुए। दरअसल जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया। जनता पार्टी व संघ की दोहरी सदस्यता पर विवाद होने पर 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। यह संघियों का कांग्रेस से खिलाफत ही थी कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स का मुद्दा उठा तो संघियों ने फिर से समाजवादियों के साथ दिया। 1989 में जब जनता दल की सरकार की सरकार बनी तो संघियों ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने पर आरक्षण के खिलाफ भड़के आंदोलन को भारतीय जनता पार्टी ने कैश कराया तथा मौके की नजाकत को भांपते हुए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण का मुद्दा सुलगा दिया तथा मंदिर निर्माण के लिए देश में रथयात्रा निकालने चल पड़े। यात्रा के बिहार में प्रवेश करने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के रथयात्रा रोक देने पर भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। 1996 में समाजवादियों ने कांग्रेस की मदद से फिर सरकार बनाई मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए।
    दरअसल कामरेड सुरजीत सिंह ने मुलायम सिंह का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए रखा तो लालू प्रसाद ने इसका विरोध कर दिया। बाद में एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया। मुलायम सिंह को रक्षामंत्री पद पर संतोष करना पड़ा। जहां तक कांग्रेस की मदद की बात है तो लालू प्रसाद भी कांग्रेस की मदद से रेलमंत्री रहे हैं। नीतीश कुमार भारत को संघमुक्त करने के लिए कांग्रेस से भी मदद मांग रहे हैं। कुल मिलाकर समाजवादी भले ही अपने को लोहिया का अनुयाई बताते घूम रहे हों पर ये लोग लोहिया के नारे को भूल गए हैं। जिन पंडित जवाहर लाल नेहरू को लोहिया पानी पी-पीकर गाली देते थे, उन नेहरू की तारीफ में अपने लोहिया का असली अनुयाई कहने वाले मुलायम सिंह यादव कसीदे पढ़ चुके हैं।
    लो
हिया वंशवाद, जातिवाद व पूंजीवाद के खिलाफ थे पर आज के तथाकथित समाजवादियों में ये खूबियां बखूबी देखी जा रही हैं। यही वजह रही कि 2014 का आम चुनाव को जीतने के लिए नरेंद्र मोदी ने लोहिया व जेपी की नीतियों का हवाले देते हुए समाजवादियों पर जमकर निशाना साधा था। उसका उन्हें फायदा भी हुआ। माहौल को भांपकर कर ही उन्होंने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया था। नीतीश कुमार को समझना होगा कि भले ही उन्होंने संघमुक्त भारत का नारा दे दिया हो पर नरेंद्र मोदी लोहिया के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे का हवाला देते हुए समाजवादियों फिर से कटघरे में खड़ा करेंगे। जिस तरह से मोदी गांधी परिवार को दरकिनार कर देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले क्रांतिकारियों को सम्मान दिलवा रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि नरेंद्र मोदी ने भाजपा में भी एक नया समाजवाद पैदा किया है। जहां वह आजादी की लड़ाई में गरम दल के नेताओं को तवज्जो दे रहे हैं वहीं प्रख्यात समाजवादियों का भी जमकर गुणगान करते देखे जा रहे हैं। भले ही दिखावा हो रहा हो पर राष्ट्रवाद के नाम पर देश में देश पर मर-मिटने वालों के नामों पर भी चर्चा होने लगी है।




Sunday, 22 May 2016

... तो 'पीके" चलाएगा देश

    जुझारू, जमीनी, कत्र्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं के बल पर चुनाव जीतने का दावा करने वाले नेता कहने को तो चुनावी रणनीति बनाने के लिए तरह-तरह की कमेटी बनाते हैं। एक से बढ़कर एक अनुभवी नेता को चुनाव जीतने के लिए लगाया जाता है। कार्यकर्ताओं को संगठन की रीढ़ बताया जाता है। सत्तारूढ़ दल काम के बल पर चुनावी समर में जाते हैं पर आज के बदलते राजनीतिक दौर में जिस तरह से मैनेज कर चुनाव लड़े जा रहे हैं उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि जैसे दलों को कार्यकर्ताओं व काम की जरूरत कम मैनेजरों की ज्यादा है।
   देश की राजनीति में 'पीके" एक ऐसा नाम जुड़ गया है जो सभी दलों के सांगठनिक ढांचे पर भारी पड़ दिखाई दे रहा है। राजनीतिक अनुभव को चिढ़ाता प्रतीत हो रहा है। कहा जा रहा है कि भाजपा ने आम चुनाव पीके के संचालन में जीता, उसके बाद बिहार में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने में भी पीके का अहम रोल रहा। अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 'पीके" को हायर किया है। भले ही उप चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई हो पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पीके के दम पर चुनाव जीतने का दंभ भर रही है। पीके ने कार्यकर्ताओं में ऐसा मैसेज दिया है कि यदि उन लोगों ने उप्र चुनाव में बढ़त हासिल कर ली तो 2019 का आम चुनाव उनके लिए खुशी लेकर आएगा।
   दिलचस्प बात यह है कि चुनाव को जीतने के लिए कांग्रेस दिग्गज नहीं बल्कि पीके कार्यकर्ताओं से वार्ता कर चुनावी रणनीति बना रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि इस तरह से ही मैनेजर चुनावी रणनीति बनाते रहें तो राजनीतिक अनुभव किस काम का कार्यकर्ता अनुभवी नेताओं से राजनीतिक पाठ क्यों सीखेंगे ? जो मैनेजर चुनाव जिताने का माद्दा रखते हैं उनसे अच्छा राजनीतिक पाठक कौन पढ़ा सकता है ? देश में गर्मी, सर्दी, झेलने वाले कार्यकर्ताओं की फिर क्या जरूरत है ? वातानुकूलित कमरों में बैठकर अच्छी राजनीति की जा सकेगी। वैसे भी देश की राजनीति बहुत तेजी से वातानुकूलित कमरों की ओर भाग रही है। यदि राजनीति इसी रूप में ढलती रही तो देश की राजनीति जनता की नहीं बल्कि आंकड़ों की होकर रह जाएगी। कार्यकर्ता जनता के बीच में पहचान न बनाकर पीके जैसे मैनेजरों के संरक्षण में रहेंगे तथा चुनाव जीतने की राजनीति सीखेंगे। देश की राजनीति में डॉ. राम मनोहर लोहिया, सरदार बल्लभ पटेल, इंदिरा गांधी, लोक नायक जयप्रकाश, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर सिंह, चौधरी चरण सिंह जैसे आदर्श दिग्गजों की जगह पीके जैसे मैनजर लेने लगेंगे।
   देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता कि लंबे समय तक देश की बागडोर संभालने वाले कांग्रेस उत्तर प्रदेश चुनाव पीके के बल पर जीतने की रणनीति बना रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में पीके की मदद लेने की बातें सामने आ रही हैं। ये वे दल हैं जो देश को नेतृत्व देने का दंभ भरते घूम रहे हैं। यदि पीके की चुनावी रणनीति इतनी प्रभावकारी है तो फिर राजनीतिक दलों को इन जैसे नेताओं की जरूरत क्या ? यह भी कहा जा सकता है कि देश के राजनीतिक दिग्गजों को अपनी प्रतिभा व काम पर भरोसा नहीं रह गया है। या फिर इन्हें लगता है कि ये लोग जनता पर ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ पा रहे हैं, जिससे इन्हें वोट मिल सके। यदि पीके देश की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं तो फिर देश की बागडोर पीके को ही क्यों न सौंप दी जाए। यदि पीके चुनाव जिता सकने में सक्षम हैं तो देश भी इन लोगों से अच्छा चला लेंगे आैर अपने जैसे मैनजरों के बल पर विभिन्न प्रदेशों को भी अच्छा नेतृत्व दे देंगे।
   देश में चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल अनुभव के आधार पर रणनीति बनाते हैं तथा उसी के आधार पर चुनावी समर में उतरते हैं। सत्ता व संगठन के अनुभव के आधार पर लंबे समय तक कांग्रेस ने भी राज किया।
सपा, बसपा, राजद, जदयू के अलावा वामपंथियों ने आगे बढ़कर कार्यकर्ताओं के बल पर अपना जनाधार बनाया है। लगभग सभी दल अपने-अपने काम के आधार पर वोट मांगते देखे जा सकते हैं। इस रणनीति में संगठन के नेतृत्व का अहम रोल माना जाता रहा है पर आज के  इस बदले राजनीतिक दौर में जिस तरह से पीके जैसे मैनेजरों को चुनावी रणनीति की इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा रही है यह न केवल राजनीतिक दलों बल्कि देश के लिए भी घातक है। यदि इसी तरह से मैनेजरों के बल पर चुनाव लड़े व जीते जाते रहेंगे तो कौन सा दल संगठन बनाएगा आैर कौन सी सरकार काम करेगी ? पैसों के बल पर मैनेजर हायर करे जाएंगे तथा चुनाव जीतकर जनता के खून-पसीने की कमाई पर एशोआराम की जिंदगी बिताई जाएगी।