Tuesday, 10 March 2015

कहीं केजरीवाल का विकल्प न बन जाएं योगेंद्र यादव

     अन्ना आंदोलन के बल पर देश को अच्छी राजनीति देने के वादे के साथ दिल्ली को कब्जाने वाली आम आदमी पार्टी भी अन्य दलों के रास्ते पर चल पड़ी है। जिन कमियों को लेकर पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक दलों पर निशाना साधा था वह भी उन्हें अपनाने लगे हैं। आप में भी हाईकमान परिपाटी शुरू हो गई है। पार्टी को दिल्ली में प्रचंड बहुमत क्या मिला कि पार्टी ने दो दिग्गजों यागेंद्र यादव व प्रशांत भूषण को पीएसी से ही हटा दिया। इन नेताओं पर आरोप लगाया जा रहा है कि ये लोग पार्टी को दिल्ली में हराना चाहते थे। इन नेताओं को खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है। इस प्रकरण में दिलचस्प बात यह है कि अरविंद केजरीवाल पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति में पार्टी में इतना बड़ा फैसला ले लिया गया।
     योगेंद्र यादव आैर प्रशांत भूषण को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाने के लिए केजरीवाल के सिपहसालार लग गए हैं। मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, पंकज गुप्ता, गोपाल राय ने इन दोनों नेताओं को गद्दार तक कह दिया है। प्रशांत भूषण को अनुशासन समिति के अध्यक्ष पद से भी हटाने की तैयारी है। प्रकरण से आहत योगेंद्र यादव भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ पदयात्रा निकालने जा रहे अन्ना हजारे के साथ हो लिए हैं। वह किसान आंदोलन में भाग लेने जा रहे हैं। राजनीति में विरोध से नेता मजबूत होता है। नरेद्र मोदी विरोध से प्रधानमंत्री बने। अरविंद केजरीवाल विरोध से मुख्यमंत्री बने। अब आप नेता योगेंद्र यादव का जमकर विरोध कर रहे हैं। यदि योगेद्र यादव की किसान आंदोलन में सही रूप से भागेदारी हो गई तो कहीं वह अरविंद केजरीवाल के विकल्प के रूप में उभर आएं।
     अरविंद केजरीवाल को यह समझना होगा कि प्रशांत भूषण आैर योगेंद्र यादव पार्टी के वह स्तंभ हैं जिनसे पार्टी को न केवल मजबूत आधार मिला बल्कि वे विरोधियों से बचाने के लिए उनके लिए ढाल के रूप में काम करते रहे। प्रशांत भूषण ही हैं जिनकी वजह से अरविंद केजरीवाल के खिलाफ होने वाला हर कानूनी वार विफल कर दिया गया। योगेंद्र यादव को पार्टी का थिंक टैंक माना जाता है। यह थिंक टैंक पार्टी के खिलाफ खड़ा हो गया तो वैचारिक शक्ति क्या होती है यह कई बार साबित हो चुका है।
     दरअसल यह लड़ाई योगेंद्र यादव अरविंद केजरीवाल के बीच की मानी जा रही है। अरविंद केजरीवाल ने पहले योगेंद्र यादव को हरियाणा का प्रभारी बनाया। उन्हें हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में भी प्रस्तुत भी किया गया। जब उन्होंने जमीन तैयार करने का प्रयास किया तो अरविंद केजरीवाल ने हरियाणा में चुनाव न लड़ने का निर्णय ले लिया। अरविंद केजरीवाल के विश्वसनीय माने जाने वाले नवीन जयहिंद ने योगेंद्र यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसी बीच केजरीवाल के अति विश्वसनीय माने जाने वाले मनीष सिसोदिया ने योगेंद्र यादव पर केजरीवाल को कमजोर करने का आरोप लगाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में  प्रचंड बहुमत के बाद शपथ ग्रहण समारोह में अरविंद केजरीवाल ने अन्य राज्यों में चुनाव न लड़ने का फैसला ले लिया। अब अरविंद केजरीवाल ने अपने विश्वसनीय लोगों को तो दिल्ली में समायोजित कर लिय है। योगेंद्र यादव की सोच है कि पार्टी अन्य प्रदेशों में चुनाव लड़ेगी तो अन्य कद्दावर नेताओं को उभरने का अच्छा मौका मिल जाएगा। दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के नाते अरविंद केजरीवाल दिल्ली में ही व्यस्त रहंेगे। ऐसे में वह जनता आैर कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ बना सकते हैं। इसलिए उन्होंने उत्तर प्रदेश व बिहार में भी चुनाव लड़ने की बात कही। अरविंद केजरीवाल के समर्थकों को लगा कि यह केजरीवाल के निर्णय का विरोध है।
     प्रशांत भूषण का यह कहना कि अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के नाते संयोजक पद छोड़ देना चाहिए, केजरीवाल समर्थकों को बहुत खला। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब केजरीवाल मुख्यमंत्री बन ही गए तो उन्होंने खुद आगे आकर संयोजक पद क्यों नहीं छोड़ दिया। पार्टी की गतिविधयों पर नजर डाली जाए तो अब तक देखा गया है कि केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह के लिए गए निर्णय ही लागू होते हैं। इन तीनों लोगों ने ही परिवर्तन नामक एक सामाजिक संगठन बनाया था। ये ही तीनों आप में सबसे मजबूत देखे गए।
कुमार विश्वास का कद बढ़ा तो उन्हें आम चुनाव में अमेठी से चुनाव लड़ा कर अलग-थलग कर दिया गया। साजिया इल्मी तिकड़ी के कहने पर नहीं चलीं तो उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। अब प्रशांत भूषण आैर योगेंद्र यादव ने अपनी आवाज उठाई तो उन्हंे भी पीएसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अरविंद केजरीवाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस बार मुकाबला प्रशांत भूषण आैर योगेंद्र यादव से है। एक कानून का विशेषज्ञ तो दूसरा विचार का। प्रशांत भूषण भले ही राजनीतिक संघर्ष न कर पाएं पर योगेंद्र राजनीतिक रूप से संघर्षशील व्यक्ति रहे हैं। वह न केवल राजनीतिक विश्लेषक बल्कि समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं। उनके इस बयान ने कि अब गांवों में जाकर किसानों के लिए संघर्ष करेंगे उन्हें किसान नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
     जहां तक प्रशांत भूषण की बात है केजरीवाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पार्टी को खड़ा करने में प्रशांत भूषण आैर शांति भूषण का बड़ा योगदान है। न केवल आर्थिक बल्कि कानूनी व मनोबल के मामले में भी इस परिवार ने पार्टी को बड़ा सहयोग दिया है। यह सहयोग यदि योगेंद्र यादव को मिल गया तो केजरीवाल के लिए बड़ी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के पीएसी से बाहर करने के बाद सबसे ज्यादा विरोध उत्तर प्रदेश में देखा गया। दरअसल उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता 2017 के विधानसभा चुनाव में अपना भविष्य देख रहे हैं। यदि योगेंद्र यादव उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने के लिए अड़ गए तो उत्तर प्रदेश में एक बड़ा तबका योगेंद्र यादव के साथ आ सकता है। यह हाल बिहार में भी देखने को मिलेगा। हरियाणा में तो बड़े स्तर पर कार्यकर्ता योगेंद्र यादव के साथ हैं ही। अरविंद केजरीवाल दिल्ली तक सिमट कर रहना चाहते हैं तो योगेंद्र यादव अन्य प्रदेशों में चुनाव लड़ने के पक्ष में हैं। ऐसे में यादव अन्य प्रदेशों में कार्यकर्ताओं की सहानुभूति बटोर सकते हैं।
     अरविंद केजरीवाल को समझना होगा कि किसी भी समस्या को खत्म करने के लिए उसकी जड़ों में जाना जरूरी होता है। आखिरकार सरकार बनते ही पार्टी में ऐसी स्थिति क्यों आ गई कि दो दिग्गजों के खिलाफ इनता बड़ा निर्णय लेना पड़ा। याद कीजिए भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आप के आंदोलन के बल पर जब पहली बार  दिल्ली में आप की सरकार बनी तो देश का युवा नरेंद्र मोदी से ज्यादा प्रभावित अरविंद केजरीवाल से था, पर वोटबैंक की राजनीति कर अरविंद केजरीवाल ने यह सब माहौल खत्म कर दिया था। अब फिर से दिल्ली की जनता से उन पर विश्वास जताया तो पार्टी में ऐसी स्थिति उनको कमजोर कर सकती है। यदि योगेंद्र यादव ने अपने को इस आंदेालन में पूरी तरह से सक्रिय कर लिया तो वह बड़े समाजवादी नेता के रूप में उभर सकते हैं। यह आंदोलन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ चलाया जा रहा है। किसानों से संबंधित होने की वजह से इस आंदोलन का राष्ट्रीय स्तर पर छाने के पूरे आसार हैं।

Sunday, 1 March 2015

तो जेपी आंदोलन की तरह चलेगा अन्ना आंदोलन

    भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में दिल्ली जंतर-मंतर पर धरना देने वाले प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे का यह आंदोलन सामाजिक नहीं राजनीतिक होने वाला है। जिस तरह से इससे बातें निकल कर आ रही हैं उससे यह जेपी आंदोलन की तरह होने वाला है। इस आंदोलन में दो बातें मुख्य रूप से उभर कर आर्इं कि एक ओर जहां अन्ना हजारे ने साफ कह दिया है कि वह इस बार कोई अनशन नहीं करने वाले बल्कि उन्हें देश के लिए जिंदा रहते हुए जेल भरो आंदोलन शुरू करना है, दूसरा कि राजनीतिक दल अन्ना की अगुआई में इस आंदोलन को समर्थन दे सकता है।
      अन्ना आंदोलन से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने तो आंदोलन को अपना समर्थन दे भी दिया है। जिस तरह से  जनसंघ समेत सभी राजनीतिक दल कांग्रेस शासन के खिलाफ जेपी की अगुआई में आंदोलन में कूद गए थे, ठीक उसी प्रकार से इस आंदोलन का आह्वान किया जा रहा है। वैसे भी 24 तारीख के अन्ना के धरने में आप के अरविंद केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, भाकपा से अतुल अंजान मंच पर मौजूद थे।
     यह आंदोलन वैसे भी इस वजह से भी बड़ा होने वाला है कि क्योंकि इस आंदोलन में एकता परिषद के संस्थापक, पीवी राजगोपाल, नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता के रूप में जाने जाने वाली मेधा पाटेकर, जलपुरुष राजेंद्र सिंह समेत कई किसान संगठन हिस्सा ले रहे हैं। यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आंदोकारियों ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि अध्यादेश वापस लेने के बावजूद यह आंदालन नहीं रुकेगा। किसानों की अन्य समस्याओं को लेकर आंदोलन चलता रहेगा। इस आंदोलन से जहांं भाजपा को नुकसान होने जा रहा है वहीं जनता परिवार के लिए भी यह बड़ी परेशानी बनने वाला है। एक ओर कभी नीतीश कुमार के घनिष्ट माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अलग पार्टी बनाने जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव के जनता परिवार को एकजुट करने की जिम्मेदारी के बावजूद सपा में इस मुद्दे पर बड़ा मतभेद है। वैसे भी मुलायम सिंह के पोते तेज प्रताप यादव के तिलकोत्सव में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाया पर इस समारोह में नीतीश कुमार नहीं आए। ऐसे में यदि अन्ना आंदोलन गति पकड़ता है तो जनता परिवार पीछे छुटता चले जाएगा।
    आज के बदलते राजनीतिक दौर में दलों को यह समझना होगा कि जनता को अब दिखावा मंजूर नहीं। जनता अब काम मांगती है। राजनेताओं को सोच में परिवर्तन होना बहुत जरूरी है। उन्हें समझना पड़ेगा कि आखिरकार लोग आंदोलन करने को क्यों मजबूर हो रहे हैं। बात भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की नहीं है, बल्कि किसानों के सामने इस समय बहुत सी समस्याएं हैं। देश में यदि कोई सबसे ज्यादा परेशान है तो वह किसान है। किसानों की आत्महत्याओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। देश में अन्ना एक ऐसी आवाज बन चुके हैं कि जहां खड़े हो जाएं उनके पीछे सामाजिक संगठनों के अलावा कई राजनीतिक दल भी आ जाएं।   इसमें दो राय नहीं कि देश में जनहित की बात करना वाला अन्ना हजारे जैसे समाजसेवी कोई दूसरा दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। जब राजनीतिक दलों के साथ ही काफी संख्या में सामाजिक संगठन भी पैसा कमाने की होड़ में लगे हैं वहीं अन्ना हजारे निस्वार्थ सेवा भाव से देश व समाज की सेवा कर रहे हैं। यही वजह है कि उनके आवाज लगाते ही लोग उनके पीछे लग लेते हैं।
    यदि इस आंदोलन आैर 2011 के आंदोलन की तुलना की जाए तो वह भ्रष्टाचार को लेकर था तो यह किसानों की समस्या को लेकर। उस आंदोलन में एनजीओ के लोग थे, तो इस आंदोलन में किसान पृष्ठभूमि से के अलावा राजनीतिक, उस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो इस आंदोलन में पीवी. राजगोपाल, मेधा पाटेकर, राजेंद्र सिंह, सुनीता गोदारा के अलावा कई सामाजिक व किसान संगठन। उस आंदोलन ने लोगों को जागरूक किया तो आंदोलन देश को क्या देगा यह तो समय ही बताएगा। हां किसानों का कुछ जरूर भला होने वाला है। अन्ना आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन करने की बात कहनी शुरू कर दी है। काफी किसान संगठन केंद्र सरकार के संपर्क में हैं
उनका कहना है कि केंद्र सरकार जल्दबाजी में यह अध्यादेश लाई है। इसमें काफी बातें किसान के हित में नहीं हैं। केंद्र सरकार अब इसमें संशोधन करने वाली है। वित्त मंत्री अरुण जेटली की लगातार किसान संगठनों से बातें चल रही हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि ऐसी कौन सी देश में विपदा आ गई थी कि सरकार को अध्यादेश के माध्यम से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करना पड़ा।
    दरअसल जिस तरह से भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला, उससे इन लोगों के दिमाग में यह बैठ गया था कि वह जो भी करेंगे जनता सिर झुकाकर उसे स्वीकार करेगी। जिस तरह से उन्होंने चुनाव में जनता को बरगलाकर बेवकूफ बना दिया, उसी तरह से वह लगातार बेवकूफ बनाते रहंेगे। इस सरकार ने शुरुआती दिनों से ही दिखाना शुरू कर दिया था, यह पूंजीपतियों के इशारे पर काम कर रही है। यह स्वभाविक भी है क्योंकि चुनाव प्रचार में भाजपा ने पानी की तरह पैसा बहाया।
     सर्वविदित है कि यह सब पैसा कारपोरेट घरानों का था। अब उन लोगों को वह पैसा वसूलना है। पर यह किसी के दिमाग में नहीं था कि ये लोग इतनी जल्दी से कारपोरेट घरानों के पक्ष में निर्णय लेना शुरू कर देंगे। अन्ना हजारे ने कह दिया है कि जब तक यह अध्यादेश वापस नहीं होगा तब तक वह आंदोलन वापस नहीं लेगा। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले की फांस बन गया है। यदि वह वापस लेते हैं तो उनकी फजीहत होगी आैर यदि वापस नहीं लेते तो आने वाले समय में बिहार, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अन्ना हजारे का आंदोलन बहुत नुकसान पहुंचा सकता है।
   इसमें भी दो राय नहीं कि यदि समय रहते केंद्र सरकार ने यह अध्यादेश वापस नहीं लिया तो बिहार व उत्तर प्रदेश में सत्ता का सपना संजो रही भाजपा की इन प्रदेशों में वह दुर्गति होगी जो उसने सोचा भी नहीं होगा। इस आंदालन में देशभर के किसान संगठन भाग ले रहे हैं तो स्वभाविक है कि भजापा के पूरे देश के वोटबैंक पर असर पड़ेगा।
    हां अन्ना को यह देखना होगा कि राजनीतिक दलों के मंच पर आने से भाजपा को आंदोलन को कमजार करने का मौका मिल गया है। विशेष रूप से अरविंद केजरीवाल के मंच पर आने से। अब भाजपा इस आंदोलन को आम आदमी पार्टी
को मजबूत करने वाला कहेगी। 2011 के आंदोलन के बाद अन्ना के हिसाब से जन लोकपाल न बनने का असर भी इस आंदोलन पर पड़ेगा।  जन लोकपाल का क्या हुआ। जो सरकार बना रही है वह कितना कारगर होगा।

Thursday, 12 February 2015

मांझी के सहारे 'जनता परिवार" के लिए मझधार तैयार कर रही भाजपा

      भले ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जबर्दस्त जीत से जनता परिवार खुश हो रहा हो पर समाजवादियों को समझना होगा कि अब भाजपा ने मुख्यमंत्री जीतन मांझी को गले लगाकर जनता परिवार में सेंध लगा दी है। भाजपा का जीतन मांझी का बहुमत सिद्ध कर लेने का दावा कहीं न कहीं बड़ा इशारा कर रहा है। मांझी आैर नीतीश कुमार दोनों ही बहुमत सिद्ध करने की बात कर रहे हैं। भले ही जीतन मांझी को पार्टी से निकाल दिया गया हो। भले ही नीतीश कुमार सरकार बना लें पर भाजपा ने बिहार में अपना दांव चलकर समाजवादियों को झटका दिया है। राजद सांसद पप्पू यादव का मांझी के सुर में सुर मिलाना भाजपा के लिए सोने पर सुहागा जैसा है। जहां भाजपा के साथ उपेंद्र कुशवाहा, राम विलास पासवान जैसे दिग्गज हैं वहीं जीतन मांझी, नरेंद्र सिंह, साधु यादव आैर पप्पू यादव के मिलने से नीतीश कुमार आैर लालू प्रसाद की परेशानी बढ़नी तय है।
       दिल्ली में चुनाव हारने के बाद भाजपा अब पूरी ताकत बिहार पर लगाएगी क्योंकि 2017 में उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं आैर बिहार आैर उत्तर प्रदेश में अक्सर चुनाव जातीय समीकरणों के आधार पर लड़े जाते हैं। जीतन मांझी आैर नीतीश कुमार का सत्ता संघर्ष दूरगामी परिणाम लेकर आएगा। जनता परिवार अभी एकजुट भी नहीं हो पाया था कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उसमें सेंध लगानी शुरू कर दी। इस संघर्ष को आैर दिलचस्प बना रहे हैं रमई राम । उन्होंने कह दिया है कि मुख्यमंत्री कोई भी बने वह उप मुख्यमंत्री जरूर बनेंगे, जबकि लालू प्रसाद अपनी बेटी मीसा भारती को उप मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। ऐसे में यदि रमई राम उप मुख्यमंत्री बनते हैं तो लालू प्रसाद प्रसाद की नाराजगी आैर मीसा भारती बनती हैं तो रमईराम नाराज। रमईराम भी महादलित हैं। समाजवादियों को यह समझना होगा कि दिल्ली में हारने के बाद भाजपा ने अब पूरा ध्यान बिहार पर लगा दिया है।
       इसमें दो राय नहीं राजद, जदयू, वामपंथी आैर कांग्रेस इस मामले में एक हो गए हैं पर राज्यपाल भाजपा से हैं आैर इस देश में राज्यपाल के सहारे एक से बढ़कर एक खेल हुए हैं। 1979 में हरियाणा में भजनलाल ने देवीलाल का बहुमत होने के बावजूद उनके विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार बना ली थी। राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने मांझी को 20 को बहुमत सिद्ध करने को कहा है। उधर नीतीश कुमार ने दिल्ली में राष्ट्रपति भवन के सामने 129 विधायकों की परेड करा दी है।
       राजनीति की जननी माने जाने वाले बिहार में सियासत करवट लेती रहती है। कभी जाति के आधार पर तो कभी वर्चस्व के आधार पर आैर कभी हक की लड़ाई को लेकर। भाजपा के खिलाफ जनता परिवार को एकजुट करने की कवायद भी बिहार से शुरू हुई तो टूट भी यहां से ही। जीतन मांझी आैर  नीतीश कुमार का सत्ता संघर्ष न केवल बिहार बल्कि देश के समीकरण  बदलने वाला साबित होगा। सियासत देखिए कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें फेस करने से बचने के लिए अति दलित नेता जीतन मांझी को मुख्यमंत्री बनवाने के बाद नीतीश कुमार ने पर्दे के पीछे से सरकार चलाने का दांव चला था। उन्हें क्या पता था कि मांझी ही नरेंद्र मोदी को घेरने के अभियान की कमजोर कड़ी साबित होने वाले हैं। वह जनता परिवार को संगठित करने के लिए दिल्ली में बैठकें करते रहे आैर जीतन राम मांझी ने बिहार में हक-हकूक का हवाला देतेे हुए अति दलित व दलितों को रिझाने रहे।
       नीतीश कुमार ने शुरू में तो उनके बयानों को गंभीरता से नहीं लिया। नीतीश कुमार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया जब उन्हें जीतन मांझी का खेल समझ में आ गया तब तक वह अपना खेल कर चुके थे। समय का फायदा उठाते हुए भाजपा ने उन्हें शह देने शुरू कर दी। जीतन मांझी को हटाने को लेकर कई दिनों तक नीतीश कुमार, लालू प्रसाद व शरद यादव में माथा-पच्ची होती रही। जब उन्हें लगा कि अब मांझी भाजपा के हाथों खेल रहे हैं तो अंतत: उन्होंने उन्हें हटाने का निर्णय ले लिया। जीतन मांझी समय की नजाकत को समझते हुए नीति आयोग की बैठक में भाग लेने दिल्ली क्या आए कि लगते हाथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिल लिए आैर नीतीश कुमार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। अब वह नीतीश कुमार को सत्ता का लोभी तक कह रहे हैं। यह संघर्ष दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने अनुशसनहीनता का आरोप लगाकर जहां जतीन मांझी को निष्काशित कर दिया है वहीं  नीतीश कुमार ने बहुमत के विधायकों के साथ राजभवन के सामने परेड कर सरकार बनाने का दावा पेश किया। मांझी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। वह भी बहुमत सिद्ध करने की बात कर रहे हैं। भाजपा नेता शहनवाज हुसैन का मांझी बहुमत सिद्ध कर देंगे वाला बयान अपने आप में बहुत कुछ कह रहा है। जीतन मांझी आैर नीतीश कुमार का सत्ता संघर्ष  बिहार में नए समीकरण पैदा कर सकते हैं। जिस तरह से राजनीतिक परिदृश्य उभरकर सामने आया है कि उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि जीतन मांझी जदयू तोड़कर एक नई पार्टी बना सकते हैं आैर आने वाला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ सकते हैं। मांझी की मुहिम को इसलिए भी नीतीश के लिए झटका माना जा रहा है कि क्योंकि नरेंद्र सिंह आैर साधु यादव जैसे कई कद्दावर नेता उनके साथ है। कभी नीतीश कुमार के करीब रहे पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी मांझी की इस मुहिम को हवा दे रहे हैं।
     दिल्ली में आप की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार भले ही नरेंद्र मोदी को दबाव में मानकर चल रहे हों पर बिहार में जीतन मांझी ने उनका यह दबाव काफी हद तक कम कर दिया है। बिहार चुनाव के लिए दिल्ली चुनाव बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा था तभी तो नीतीश कुमार ने आम आदमी पार्टी कोे बिना मांगे समर्थन दे दिया था आैर दिल्ली में आप जीत भी गई। ऐसे में प्रधानमंत्री नरंेद्र मोदी ने अमित शाह को जीतन मांझी के सहारे जनता परिवार को कमजोर करने में लगा दिया है। नरेंद्र मोदी भी जानते हैं कि आने वाले समय उनके सामने कांग्रेस कम जनता परिवार बड़ी चुनौती देगा। यह चुनौती उन्हें नवम्बर में बिहार में मिलने वाली है। उसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर है। ऐसे में भले ही भाजपा दिल्ली चुनाव हार गई हो पर उनका पूरा प्रयास होगा कि किसी भी तरह से वह बिहार चुनाव जीतें।
         नरेंद्र मोदी भली भांति जानते हैं कि अमित शाह आैर उनकी जोड़ी को उनके अपने ही नहीं पचा पा रहे हैं। ऐसे में जहां अब उन्हें अपनों से जूझना होगा वहीं उनकी टक्कर जनता परिवार के लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह, शरद यादव सरीखे समाजवादियों से है। समय आने पर वामपंथी भी उनके साथ हो सकते हैं। दिल्ली की भरपाई करने के लिए उन्हें जीतन मांझी के रूप में मजबूत मोहरा मिल गया है। यह बात भाजपाई भी जानते हैं कि समाजवादियों का आंदोलन देश में कोई भी समीकरण पैदा करने में सक्षम है। इसलिए वह जीतन मांझी के सहारे समाजवादियों के आंदोलन को कुंद करने का भरपूर प्रयास करेंगे। वैसे भी एक ओर जहां नीतीश कुमार व लालू प्रसाद विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हुए हैं वहीं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने 2017 के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है।
       स्वभाविक है कि समाजवादी किसान-मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने का नाम देकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे। वैसे भी वह इसका आगाज गत दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर से कर चुके हैं। अन्य पार्टियों के नेताओं को मोदी आम चुनाव आैर दिल्ली के चुनाव में भी इस्तेमाल कर चुके हैं। जहां उन्होंने आम चुनाव में कांग्रेस व अन्य दलों के नेताओं को इस्तेमाल किया वहीं दिल्ली के चुनाव में अन्ना आंदोलन से निकलीं पूर्व आईपीएस किरण बेदी का इस्तेमाल आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के खिलाफ किया। हालांकि यह प्रयोग उनके लिए उल्टा ही बैठा। फिर भी राजनीतिक जीत में विभीषणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश की सियासत में नीतीश-मांझी सत्ता संघर्ष कोई नया नहीं है। इस तरह के मामले में देश में होते रहे हैं। हरियाणा में भगवत दयाल शर्मा को बंसीलाल ने ऐसे ही झटका दिया था। जनता परिवार में इस तरह के मामले होते रहे हैं। नीतीश कुमार आैर लालू प्रसाद आैर मुलायम सिंह यादव लड़ते आैर मिलते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अजीत सिंह मुलायम सिंह केंद्र में मोरारजी देसाई आैर चरण सिंह का सत्ता संघर्ष जगजाहिर है। हां पहले समाजवादी नेताओं का इस्तेमाल कांग्रेस करती रही है आैर अब यह खेल भाजपा ने शुरू किया है।

Monday, 2 February 2015

तो दबाई जाएगी हक की लड़ाई की आवाज

दिल्ली में जनजातीय कल्याण संबंधी एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से नवगठित नीति आयोग को आदिवासी क्षेत्रों में वामपंथी उग्रवाद को फैलने से रोकने के लिए मिलकर रणनीति तैयार करने को कहा है। जिस तरह से उन्होंने उग्र आंदालनों की वामपंथी उग्रवाद के रूप में की संज्ञा दी है। जिस तरह से उन्होंने नाम लिए बिना आप कार्यकर्ताओं को नक्सली कहा है। जिस तरह से  हक की लड़ाई लड़ने के लिए धरना-प्रदर्शन करने वालों को उन्होंने अराजक लोग कहा है। जिस तरह से उन्होंने इन जैसे लोगों को जंगल में चले जाने को कहा है। उससे उनकी सरकार को चलाने की मंशा जाहिर होने लगी है। उससे ऐसा लगने लगने लगा है कि  केंद्र सरकार हक की लड़ाई के लिए उठाई जाने वाली आवाज को दबाने की तैयारी कर रही है।
     प्रधानमंत्री इस तरह की मंशा इसलिए भी लग रही है कि क्योंकि सरकार की अधिकतर योजनाएं पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। यह स्वभाविक भी क्योंकि भाजपा ने आम चुनाव में लगभग 750 करोड़ रुपए खर्च किए हैं तो जाहिर है कि इतनी बड़ी राशि तो पूंजीपति ही उपलब्ध करवा सकते हैं।
     ये बातें इस बात से भी प्रमाणित होती हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने जिस तरह से श्रम कानून में संशोधन करने के लिए आयोजित बैठक में श्रमिक संगठनों को न बुलाकर पूंजीपतियों को बुलाया, उससे सरकार का पूंजपीतियों के दबाव में काम करना जैसा लगता है। यह मुद्दा इसलिए भी उभारना बनता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने आतंकवाद आैर नक्सलवाद की नहीं बल्कि वामपंथी उग्रवाद की बात कही है। यह इसलिए भी बनता है कि क्योंकि यह शब्द उन्होंने ऐसे में कहा है कि जब वामपंथियों का आंदोलन लगभग न के बराबर है।
      पश्चिमी बंगाल में वामपंथियों के उग्र आंदोलन की बातें कही जाती रही हैं, पर वहां पर भी ममता बनर्जी के वर्चस्व के चलते वामपंथी शांत से ही हैं। इस शब्द की चर्चा करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में भी गरम दल के नेताओं के आंदोलन को कुछ लोगों ने वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी थी। कई राजनीतिक दलों ने व्यवस्था परिवर्तन को लेकर हुए अन्ना आंदोलन को भी वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी थी। आम आदमी पार्टी के आंदोलन को भी वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी जाती रही है। तो यह कहा जाए कि हक की लड़ाई के लिए किए जाने वाले आंदोलन पर सख्ती होने पर उग्र रूप धारण करने के बाद वह वामपंथी उग्रवाद के रूप में देखा जाएगा।
     प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि कि भले ही देश में सरकार बदल गई हो पर व्यवस्था नहीं बदली है। भले ही वह सुधार की तमाम बातें करते फिर रहे हों पर आज भी मुट्ठीभर लोगों ने देश की व्यवस्था ऐसे कब्जा रखी है कि आम आदमी सिर पटक-पटक रह जाता है उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती। न महंगाई पर अंकुश लग पाया है आैर न ही भ्रष्टाचार पर। भले ही सरकार किसान हितैषी होने की बात कर ही हो पर यह देखना होगा कि मोदी सरकार के 100 दिनों में 4600 किसानों ने आत्महत्या की है। भ्रष्टाचार के चलते जिसका जहां मौका मिल रहा है, वहां देश को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है। गत दिनों प्रधानमंत्री ने कुछ दलों पर पूंजीपतियों को गलियाते हुए राजनीतिक करने का आरोप लगाया था। मोदी जी को यह समझना होगा कि पूंजीपति ही देश के गरीब आदमी की कमाई खा रहे हैं। नहीं तो गरीब आैर अमीर के बीच की दूरी क्यों बढ़ती जा रही है। वह खुद अपने को गरीब परिवार से बताते हैं तो उन्होंने भी महसूस किया होगा कि पूंजीपति आम आदमी को कीड़े-मकौड़े से ज्यादा समझने को तैयार नहीं।  
     पूंजीपति एशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं आैर गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है। ऐसे में सरकार गरीबों को राहत देने के लिए क्या कर रही है ? यदि कर रही है तो उन्हें राहत क्यों नहीं मिल रही है।
प्रधानमंत्री अपने को गांवों से जुड़ा बताते हैं पर उनकी सरकार में गांवों की उपेक्षा हो रही है। स्मार्ट सिटी के नाम पर बड़े स्तर पर निवेश किया रहा है पर आदर्श गांव बनाने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीणों से अपना श्रमदान कर गांवों के विकास की बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि स्मार्ट सिटी का फायदा गरीब को कम अमीर को ज्यादा मिलेगा।         प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि शहर देश के टॉप 10 फीसद पूंजीपतियों की आैसत संपत्ति लगभग 14.6 करोड़ रुपए है आैर निम्न 10 फीसद गरीबों की मात्र 169 रुपए। एक ओर एक फीसद पूंजीपतियों के पास देश की आधी संपत्ति है आैर दूसरी ओर आधी 99 फीसद लोगों के पास। गरीब आदमी के पास तो मात्र .2 फीसद है।
    निजी संस्थाओं में श्रमिकों का जमकर शोषण किया जा रहा है। गांवों में आज भी मजदूर बेहाल हैं। भले ही सरकार ने हर जिले में श्रम विभाग के कार्यालय खोल रखे हों पर इन कार्यालयों का फायदा श्रमिकों को कम आैर उद्योगपतियों को ज्यादा मिलता है। संबंधित अधिकारियों की पूंजीपतियों की मिलीभगत के चलते श्रमिकों के हित प्रभावित होते हैं। सरकार ने अध्यादेश के माध्यम भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर दिया, जिसके चलते अब  किसानों की जमीन का आसानी से अधिग्रहण किया जा सकेगा।
      प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि जोत की जमीन लगातार घट रही है। यही स्थिति रही तो खाद्यान्न समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। वैसे भी विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के विरोध में आवाज उठना स्वभाविक है। बताया जा रहा है कि श्रम कानून में जो संशोधन किया जा रहा है वह उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रख कर किया जा रहा है। विदेशी निवेशकों को देश में सस्ता श्रम आैर खस्ती जमीन के आश्वासन के साथ लाया जा जा रहा है। ऐसे में गरीब आदमी प्रभावित होगा तो हक की आवाज उठेगी ही, उसमें वामपंथी संगठन भी शामिल होंगे। सरकार सख्ती भी करेगी तो आंदोलन उग्र भी धारण करेगा। तो उसे वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी जाएगी ? वैसे भी वामपंथियों ने गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा का विरोध कर अपने तेवर दिखा दिए हैं।
       मैं प्रधानमंत्री से ही पूछना चाहता हूं कि क्या इस व्यवस्था में गरीब आदमी की कोई सुनने को तैयार है ? यदि गरीब के साथ लगातार अन्याय किया जा रहा है, उत्पीड़न किया जा रहा है तो ऐसे में कई बार आदमी उग्र रूप धारण कर लेता है हथियार उठा लेता है। इसमें दो राय नहीं कि गरीब के उत्पीड़न के खिलाफ बड़े स्तर पर वैचारिक आंदोलनों के साथ ही हिंसक आंदोलन हुए हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये लोग शौकिया हथियार उठाते हैं ? क्या इनके लिए सरकारें ऐसे संशाधन उपलब्ध नहीं करा सकतीं, जिससे उनका जीवन स्तर ऐसा बनाया जा सके, जिसके चलते वह अपने पथ से न भटकें।
     यदि नक्सलवाद को ही वामपंथी उग्रवाद के रूप में देखा जा रहा है तो यह समझना होगा कि नक्सली विचारधारा पर गत सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में नक्सली विचारकों को सशस्त्र कैडर से अधिक खतरनाक दर्शाया गया था। हलफनामे के अनुसार सीपीआई (माओवादी) विचारक सुनियोजित तरीके से सरकार को बदनाम करते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि देश में नक्सली विचारक बन ही क्यों रहे हैं ?
     पिछड़े क्षेत्र में नक्सली गतिवधियों में सक्रिय रहने वाले लोग तरह-तरह की योजनाओं के अलावा काफी लोक-लुभावनों वादों के बाद भी सरकार की बात क्यों नहीं मान रहे हैं ? ये लोग अपना घर-परिवार छोड़कर जंगलों की जिंदगी क्यों बिता रहे हैं ? मेरा मानना है कि ऐसे में विचारधारा को न कुचलकर सरकार को नक्सलवाद के कारण आैर जड़ों तक जाना होगा। क्या ये लोग सुख सुविधाओं से दूर रहकर जगंलों में ही रहना पसंद करते हैं ?
     क्या इन्हें एशोआराम की जिंदगी पसंद नहीं ? क्या सभी नक्सली लेवी वसूलते हैं ? क्या सभी नक्सली सेना को अपना निशाना बना रहे हैं। या बना रहे हैं तो क्यों बना रहे हैं ? इसमें दो राय नहीं कि नक्सली हमलों में बड़े स्तर पर जान-माल का नुकसान हुआ है। ऐसे में सरकार को कारणों पर जाना जरूरी है ? क्योंकि किसी सामाजिक विचारधारा या आंदोलन का दमन उसे उकसाता है, बढ़ाता है। क्या आज भी गरीब आदमी दमन नहीं हो रहा है ? क्या सरकारी योजनाओं का फायदा वास्तव में लाभ पात्र तक पहुंच रहा है ? क्या राजनेताओं व नौकरशाही की मिलीभगत से योजनाओं की राशि की बंदरबांट नहीं हो रही है ?
      दरअसल ध्वस्त हो चुकी व्यवस्था से गरीब आदमी इतना टूट चुका है। कुछ लोग व्यवस्था के सामने घुटने टेक देते हैं आैर कुछ उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। सरकार के प्रति उपज रहे आक्रोश का फायदा नक्सली विचारक उठाते हैं। चाहे इसे आप नक्सलवाद की परिभाषा दो या फिर वामपंथी उग्रवाद की। यह शब्द कहीं न कहीं इस व्यवस्था के खिलाफ ही पैदा हुआ है। क्योंकि इसके विचारक कोई अनपढ़ लोग नहीं बल्कि पढ़े-लिखे आैर एक सोच रखने वाले लोग हैं। आखिरकार ये लोग इस विचारधारा की ओर क्यों आकर्षित हुए हैं। यह भी देखना होगा कि नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद से जुड़े अधिकतर लोग गरीब परिवारों से ही हैं।
     दरअसल लगातार बढ़ रही बेरोजगारी के चलते बड़ी संख्या में युवा अपराध की दुनिया में धकेले जा रहे हैं। देश में ऐसी व्यवस्था नहीं पैदा कर दी गई है कि जहां एक एक विशेष वर्ग करोड़ों में खेल रहा है वहीं गरीब आदमी को अभी भी दो वक्ट की रोटी के भी लाले पड़े हैं। एक ओर जहां  युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है, बड़े स्तर पर रोजगार छीना भी जा रहा है।
     भले  ही सरकारें नक्सलवाद या वामंपथी उग्रवाद को कुचलने की बात करती रही हों पर इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि हार्डकोर नक्सली सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष कुछ सफेदपोशों के संरक्षण की बातें कुबूल चुके हैं। इन लोगों का कहना है कि कई एनजीओ व राजनीतिज्ञों के साथ नक्सल संगठन की अच्छी सांठगांठ है। अब प्रश्न यह उठता है कि संगठन को चलाने हथियार खरीदने के लिए नक्सलियों के पास धनराशि आती कहां से है। जब नेता ही नक्सलवाद को संरक्षण दे रहे हैं तो नक्सली विचारधारा को कैसे खत्म किया जा सकता है। नक्सलवाद क्षेत्र में वोटबैंक की राजनीति इस समस्या को बढ़ावा दे रही है। नक्सली समस्या से निपटने के लिए इस शब्द को समझना जरूरी है। सरकार को यह समझना होगा कि कभी व्यवस्था के विरोध में खड़े हुए नक्सली आंदोलन ने कब कैसे हिंसा का रूप ले लिया आैर कब किन परिस्थितियों में यह कुछ लोगों के लिए धंधा बन गया। किस तरह से लोगों की भावनाओं को नक्सली आंदोलन से जोड़ा जा रहा है। किस तरह से इस समस्या  ने वामपंथी उग्रवाद का रूप ले लिया।
     प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि यदि उनकी नजरों में वामपंथी उग्रवाद नक्सलवाद ही है तो इसकी उत्पत्ति भी अन्याय के खिलाफ ही हुई थी। 'नक्सलवाद" कम्युनिस्टों के उस आंदोलन का नाम है, जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के रूप में पैदा हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के गांव 'नक्सलबाड़ी" से मानी जाती है, जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारु मजूमदार आैर कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी।
मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसक माने जाते रहे हैं। वह मजदूरों आैर किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी की नीतियों को जिम्मेदार मानते थे। उनका कहना था कि सरकार की गलत नीतियों के चलते ही उच्च वर्गां का शासन व कृषि तंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया। वह इसे न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व मानते थे। उनका मानना था कि केवल सशस्त्र क्रांति से ही इसे समाप्त किया जा सकता है। बताया जाता है कि नक्सलियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। बाद में इन विद्रोहियों ने स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया आैर हक की लड़ाई लड़ने का नारा देकर आैर सरकार के खिलाफ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी गई।
ऐसा माना जाता है कि 1971 में मजूमदार आैर सत्यनारायण सिंह के निधन के बाद यह आंदोलन कई शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य आैर विचारधारा से भटक गया। आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गए हैं आैर संसदीय चुनाव में भाग भी लेते हैं। ऐसे भी बहुत से संगठन हैं जो छदम लड़ाई लड़ रहे हैं। नक्सलवाद के विचारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड आैर बिहार को झेलनी पड़ रही है। लगभग 30 सालों से नक्सलवाद की परिस्थतियां बदली हैं। 1983 में पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) जैसे हिंसावादी नक्सली संगठन बन गए आैर उन्होंने 'आम्र्ड रेवोल्यूशन" का नारा दिया। प्रधानमंत्री को यह भी समझना होगा कि मिलिटेंसी आैर पॉलिटिक्स दोनों साथ-साथ चलने से यह मामला तो गंभीर हो गया है। इसकी जड़ में जाना बहुत जरूरी है।