Monday, 2 February 2015

तो दबाई जाएगी हक की लड़ाई की आवाज

दिल्ली में जनजातीय कल्याण संबंधी एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से नवगठित नीति आयोग को आदिवासी क्षेत्रों में वामपंथी उग्रवाद को फैलने से रोकने के लिए मिलकर रणनीति तैयार करने को कहा है। जिस तरह से उन्होंने उग्र आंदालनों की वामपंथी उग्रवाद के रूप में की संज्ञा दी है। जिस तरह से उन्होंने नाम लिए बिना आप कार्यकर्ताओं को नक्सली कहा है। जिस तरह से  हक की लड़ाई लड़ने के लिए धरना-प्रदर्शन करने वालों को उन्होंने अराजक लोग कहा है। जिस तरह से उन्होंने इन जैसे लोगों को जंगल में चले जाने को कहा है। उससे उनकी सरकार को चलाने की मंशा जाहिर होने लगी है। उससे ऐसा लगने लगने लगा है कि  केंद्र सरकार हक की लड़ाई के लिए उठाई जाने वाली आवाज को दबाने की तैयारी कर रही है।
     प्रधानमंत्री इस तरह की मंशा इसलिए भी लग रही है कि क्योंकि सरकार की अधिकतर योजनाएं पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। यह स्वभाविक भी क्योंकि भाजपा ने आम चुनाव में लगभग 750 करोड़ रुपए खर्च किए हैं तो जाहिर है कि इतनी बड़ी राशि तो पूंजीपति ही उपलब्ध करवा सकते हैं।
     ये बातें इस बात से भी प्रमाणित होती हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने जिस तरह से श्रम कानून में संशोधन करने के लिए आयोजित बैठक में श्रमिक संगठनों को न बुलाकर पूंजीपतियों को बुलाया, उससे सरकार का पूंजपीतियों के दबाव में काम करना जैसा लगता है। यह मुद्दा इसलिए भी उभारना बनता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने आतंकवाद आैर नक्सलवाद की नहीं बल्कि वामपंथी उग्रवाद की बात कही है। यह इसलिए भी बनता है कि क्योंकि यह शब्द उन्होंने ऐसे में कहा है कि जब वामपंथियों का आंदोलन लगभग न के बराबर है।
      पश्चिमी बंगाल में वामपंथियों के उग्र आंदोलन की बातें कही जाती रही हैं, पर वहां पर भी ममता बनर्जी के वर्चस्व के चलते वामपंथी शांत से ही हैं। इस शब्द की चर्चा करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में भी गरम दल के नेताओं के आंदोलन को कुछ लोगों ने वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी थी। कई राजनीतिक दलों ने व्यवस्था परिवर्तन को लेकर हुए अन्ना आंदोलन को भी वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी थी। आम आदमी पार्टी के आंदोलन को भी वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी जाती रही है। तो यह कहा जाए कि हक की लड़ाई के लिए किए जाने वाले आंदोलन पर सख्ती होने पर उग्र रूप धारण करने के बाद वह वामपंथी उग्रवाद के रूप में देखा जाएगा।
     प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि कि भले ही देश में सरकार बदल गई हो पर व्यवस्था नहीं बदली है। भले ही वह सुधार की तमाम बातें करते फिर रहे हों पर आज भी मुट्ठीभर लोगों ने देश की व्यवस्था ऐसे कब्जा रखी है कि आम आदमी सिर पटक-पटक रह जाता है उसकी कहीं सुनवाई नहीं होती। न महंगाई पर अंकुश लग पाया है आैर न ही भ्रष्टाचार पर। भले ही सरकार किसान हितैषी होने की बात कर ही हो पर यह देखना होगा कि मोदी सरकार के 100 दिनों में 4600 किसानों ने आत्महत्या की है। भ्रष्टाचार के चलते जिसका जहां मौका मिल रहा है, वहां देश को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है। गत दिनों प्रधानमंत्री ने कुछ दलों पर पूंजीपतियों को गलियाते हुए राजनीतिक करने का आरोप लगाया था। मोदी जी को यह समझना होगा कि पूंजीपति ही देश के गरीब आदमी की कमाई खा रहे हैं। नहीं तो गरीब आैर अमीर के बीच की दूरी क्यों बढ़ती जा रही है। वह खुद अपने को गरीब परिवार से बताते हैं तो उन्होंने भी महसूस किया होगा कि पूंजीपति आम आदमी को कीड़े-मकौड़े से ज्यादा समझने को तैयार नहीं।  
     पूंजीपति एशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं आैर गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है। ऐसे में सरकार गरीबों को राहत देने के लिए क्या कर रही है ? यदि कर रही है तो उन्हें राहत क्यों नहीं मिल रही है।
प्रधानमंत्री अपने को गांवों से जुड़ा बताते हैं पर उनकी सरकार में गांवों की उपेक्षा हो रही है। स्मार्ट सिटी के नाम पर बड़े स्तर पर निवेश किया रहा है पर आदर्श गांव बनाने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीणों से अपना श्रमदान कर गांवों के विकास की बात कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि स्मार्ट सिटी का फायदा गरीब को कम अमीर को ज्यादा मिलेगा।         प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि शहर देश के टॉप 10 फीसद पूंजीपतियों की आैसत संपत्ति लगभग 14.6 करोड़ रुपए है आैर निम्न 10 फीसद गरीबों की मात्र 169 रुपए। एक ओर एक फीसद पूंजीपतियों के पास देश की आधी संपत्ति है आैर दूसरी ओर आधी 99 फीसद लोगों के पास। गरीब आदमी के पास तो मात्र .2 फीसद है।
    निजी संस्थाओं में श्रमिकों का जमकर शोषण किया जा रहा है। गांवों में आज भी मजदूर बेहाल हैं। भले ही सरकार ने हर जिले में श्रम विभाग के कार्यालय खोल रखे हों पर इन कार्यालयों का फायदा श्रमिकों को कम आैर उद्योगपतियों को ज्यादा मिलता है। संबंधित अधिकारियों की पूंजीपतियों की मिलीभगत के चलते श्रमिकों के हित प्रभावित होते हैं। सरकार ने अध्यादेश के माध्यम भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन कर दिया, जिसके चलते अब  किसानों की जमीन का आसानी से अधिग्रहण किया जा सकेगा।
      प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि जोत की जमीन लगातार घट रही है। यही स्थिति रही तो खाद्यान्न समस्या विकराल रूप धारण कर लेगी। वैसे भी विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए किसान खेती से मुंह मोड़ रहे हैं आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के विरोध में आवाज उठना स्वभाविक है। बताया जा रहा है कि श्रम कानून में जो संशोधन किया जा रहा है वह उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रख कर किया जा रहा है। विदेशी निवेशकों को देश में सस्ता श्रम आैर खस्ती जमीन के आश्वासन के साथ लाया जा जा रहा है। ऐसे में गरीब आदमी प्रभावित होगा तो हक की आवाज उठेगी ही, उसमें वामपंथी संगठन भी शामिल होंगे। सरकार सख्ती भी करेगी तो आंदोलन उग्र भी धारण करेगा। तो उसे वामपंथी उग्रवाद की संज्ञा दी जाएगी ? वैसे भी वामपंथियों ने गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा का विरोध कर अपने तेवर दिखा दिए हैं।
       मैं प्रधानमंत्री से ही पूछना चाहता हूं कि क्या इस व्यवस्था में गरीब आदमी की कोई सुनने को तैयार है ? यदि गरीब के साथ लगातार अन्याय किया जा रहा है, उत्पीड़न किया जा रहा है तो ऐसे में कई बार आदमी उग्र रूप धारण कर लेता है हथियार उठा लेता है। इसमें दो राय नहीं कि गरीब के उत्पीड़न के खिलाफ बड़े स्तर पर वैचारिक आंदोलनों के साथ ही हिंसक आंदोलन हुए हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये लोग शौकिया हथियार उठाते हैं ? क्या इनके लिए सरकारें ऐसे संशाधन उपलब्ध नहीं करा सकतीं, जिससे उनका जीवन स्तर ऐसा बनाया जा सके, जिसके चलते वह अपने पथ से न भटकें।
     यदि नक्सलवाद को ही वामपंथी उग्रवाद के रूप में देखा जा रहा है तो यह समझना होगा कि नक्सली विचारधारा पर गत सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में नक्सली विचारकों को सशस्त्र कैडर से अधिक खतरनाक दर्शाया गया था। हलफनामे के अनुसार सीपीआई (माओवादी) विचारक सुनियोजित तरीके से सरकार को बदनाम करते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि देश में नक्सली विचारक बन ही क्यों रहे हैं ?
     पिछड़े क्षेत्र में नक्सली गतिवधियों में सक्रिय रहने वाले लोग तरह-तरह की योजनाओं के अलावा काफी लोक-लुभावनों वादों के बाद भी सरकार की बात क्यों नहीं मान रहे हैं ? ये लोग अपना घर-परिवार छोड़कर जंगलों की जिंदगी क्यों बिता रहे हैं ? मेरा मानना है कि ऐसे में विचारधारा को न कुचलकर सरकार को नक्सलवाद के कारण आैर जड़ों तक जाना होगा। क्या ये लोग सुख सुविधाओं से दूर रहकर जगंलों में ही रहना पसंद करते हैं ?
     क्या इन्हें एशोआराम की जिंदगी पसंद नहीं ? क्या सभी नक्सली लेवी वसूलते हैं ? क्या सभी नक्सली सेना को अपना निशाना बना रहे हैं। या बना रहे हैं तो क्यों बना रहे हैं ? इसमें दो राय नहीं कि नक्सली हमलों में बड़े स्तर पर जान-माल का नुकसान हुआ है। ऐसे में सरकार को कारणों पर जाना जरूरी है ? क्योंकि किसी सामाजिक विचारधारा या आंदोलन का दमन उसे उकसाता है, बढ़ाता है। क्या आज भी गरीब आदमी दमन नहीं हो रहा है ? क्या सरकारी योजनाओं का फायदा वास्तव में लाभ पात्र तक पहुंच रहा है ? क्या राजनेताओं व नौकरशाही की मिलीभगत से योजनाओं की राशि की बंदरबांट नहीं हो रही है ?
      दरअसल ध्वस्त हो चुकी व्यवस्था से गरीब आदमी इतना टूट चुका है। कुछ लोग व्यवस्था के सामने घुटने टेक देते हैं आैर कुछ उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। सरकार के प्रति उपज रहे आक्रोश का फायदा नक्सली विचारक उठाते हैं। चाहे इसे आप नक्सलवाद की परिभाषा दो या फिर वामपंथी उग्रवाद की। यह शब्द कहीं न कहीं इस व्यवस्था के खिलाफ ही पैदा हुआ है। क्योंकि इसके विचारक कोई अनपढ़ लोग नहीं बल्कि पढ़े-लिखे आैर एक सोच रखने वाले लोग हैं। आखिरकार ये लोग इस विचारधारा की ओर क्यों आकर्षित हुए हैं। यह भी देखना होगा कि नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद से जुड़े अधिकतर लोग गरीब परिवारों से ही हैं।
     दरअसल लगातार बढ़ रही बेरोजगारी के चलते बड़ी संख्या में युवा अपराध की दुनिया में धकेले जा रहे हैं। देश में ऐसी व्यवस्था नहीं पैदा कर दी गई है कि जहां एक एक विशेष वर्ग करोड़ों में खेल रहा है वहीं गरीब आदमी को अभी भी दो वक्ट की रोटी के भी लाले पड़े हैं। एक ओर जहां  युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है, बड़े स्तर पर रोजगार छीना भी जा रहा है।
     भले  ही सरकारें नक्सलवाद या वामंपथी उग्रवाद को कुचलने की बात करती रही हों पर इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि हार्डकोर नक्सली सुरक्षा एजेंसियों के समक्ष कुछ सफेदपोशों के संरक्षण की बातें कुबूल चुके हैं। इन लोगों का कहना है कि कई एनजीओ व राजनीतिज्ञों के साथ नक्सल संगठन की अच्छी सांठगांठ है। अब प्रश्न यह उठता है कि संगठन को चलाने हथियार खरीदने के लिए नक्सलियों के पास धनराशि आती कहां से है। जब नेता ही नक्सलवाद को संरक्षण दे रहे हैं तो नक्सली विचारधारा को कैसे खत्म किया जा सकता है। नक्सलवाद क्षेत्र में वोटबैंक की राजनीति इस समस्या को बढ़ावा दे रही है। नक्सली समस्या से निपटने के लिए इस शब्द को समझना जरूरी है। सरकार को यह समझना होगा कि कभी व्यवस्था के विरोध में खड़े हुए नक्सली आंदोलन ने कब कैसे हिंसा का रूप ले लिया आैर कब किन परिस्थितियों में यह कुछ लोगों के लिए धंधा बन गया। किस तरह से लोगों की भावनाओं को नक्सली आंदोलन से जोड़ा जा रहा है। किस तरह से इस समस्या  ने वामपंथी उग्रवाद का रूप ले लिया।
     प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि यदि उनकी नजरों में वामपंथी उग्रवाद नक्सलवाद ही है तो इसकी उत्पत्ति भी अन्याय के खिलाफ ही हुई थी। 'नक्सलवाद" कम्युनिस्टों के उस आंदोलन का नाम है, जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के रूप में पैदा हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के गांव 'नक्सलबाड़ी" से मानी जाती है, जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारु मजूमदार आैर कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी।
मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसक माने जाते रहे हैं। वह मजदूरों आैर किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी की नीतियों को जिम्मेदार मानते थे। उनका कहना था कि सरकार की गलत नीतियों के चलते ही उच्च वर्गां का शासन व कृषि तंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया। वह इसे न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व मानते थे। उनका मानना था कि केवल सशस्त्र क्रांति से ही इसे समाप्त किया जा सकता है। बताया जाता है कि नक्सलियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। बाद में इन विद्रोहियों ने स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया आैर हक की लड़ाई लड़ने का नारा देकर आैर सरकार के खिलाफ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी गई।
ऐसा माना जाता है कि 1971 में मजूमदार आैर सत्यनारायण सिंह के निधन के बाद यह आंदोलन कई शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य आैर विचारधारा से भटक गया। आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गए हैं आैर संसदीय चुनाव में भाग भी लेते हैं। ऐसे भी बहुत से संगठन हैं जो छदम लड़ाई लड़ रहे हैं। नक्सलवाद के विचारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड आैर बिहार को झेलनी पड़ रही है। लगभग 30 सालों से नक्सलवाद की परिस्थतियां बदली हैं। 1983 में पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) जैसे हिंसावादी नक्सली संगठन बन गए आैर उन्होंने 'आम्र्ड रेवोल्यूशन" का नारा दिया। प्रधानमंत्री को यह भी समझना होगा कि मिलिटेंसी आैर पॉलिटिक्स दोनों साथ-साथ चलने से यह मामला तो गंभीर हो गया है। इसकी जड़ में जाना बहुत जरूरी है।

Friday, 23 January 2015

दलितों के खेवनहार बन तीसरी धारा बनाने की फिराक में मांझी

     नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने वाले नीतीश कुमार अजीब सी उलझन में पड़ गए हैं। जिस मांझी को उन्होंने अपने प्रतिनिधि के रूप में  चुना था, वह ऐसा राजनीतिक दांव चल गए कि नीतीश कुमार को कुछ बोलते नहीं बन रहा है। अभी तक जीतन मांझी की बयानबाजी को बचकना समझ रहे नीतीश कुमा को अब उनकी रणनीति समझ में आने लगी है। जिस तरह से मांझी ने एक मंझे राजनीतिज्ञ के रूप में दलितों को रिझाने की कोशिश की है उससे न केवल नीतीश बल्कि लालू प्रसाद के माथे पर भी बल पड़ गए हैं।
    दलित अफसरों की सीक्रेट मीटिंग कर जिस तरह से उन्होंने उनसे उनकी समस्याएं जानी, वह दलितों में जगह बनाने में कामयाब हो रहे हैं। जिस तरह से वह जगह-जगह दलितों को अपने हकों की लड़ाई लड़ने का आह्वान कर रहे हैं उससे दलिता में उनकी लोकप्रियता बढ़ती देखी जा रही है। जीतन मांझी के इस रुख से जदयू व राजद में तो बेचैनी है ही साथ ही लंबे समय से दलितों के बल पर राजनीति कर रहे राम विलास पासवान भी सोचने को मजबूर हो गए हैं।
     जीतन राम मांझी के इस रुख का फायदा उठाने को तैयार बैठी भाजपा   ऐसे में बिहार में एक नया दांव चल सकती है। यह जीतन कुमार मांझी का राजनीतिक कौशल ही है कि उनके कृत्य से बेहद नाराज नीतीश कुमार उन्हें पद से नहीं हटा पा रहे हैं। नीतीश कुमार को आशंका है कि उनके पद से हटाने से कहीं दलित वोटबैंक के साथ ही पदाधिकारी उनके खिलाफ न हो जाएं।
    बात बिहार की राजनीति की की जाए तो आजादी मिलते ही यहां पर सवर्णां का वर्चस्व कायम हो गया था। श्री कृष्ण सिंह लंबे ने लंबे समय तक बिहार पर राज किया। उस समय दलित व पिछड़े बिहार में शोषित माने जाते थे। 1975 में जेपी क्रांति के बाद पिछड़ों व दलितों के गठबंधन ने सवर्णांे से बिहार की राजनीति छीन ली। जेपी क्रांति ने बिहार को लालू प्रसाद, नीतीश कुमार आैर राम विलास पासवान के रूप में पिछड़े आैर दलित नेता दिए। 1989 में जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद ने लगभग 15 साल तक राज किया। 
    जार्ज फर्नांडीस की अगुआई में जदयू का दामन थामने वाले नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन कर लालू प्रसाद को पछाड़ कर 2005 में बिहार की गद्दी कब्जा ली। एनडीए के संयोजक भले ही जार्ज फर्नांडीस के बाद शरद यादव रहे हों पर वर्चस्व भाजपा का ही रहा है। वैसे तो एनडीए से कई राज्यों मुख्यमंत्री रहे हैं पर बिहार से नीतीश कुमार व गुजरात से नरेंद्र मोदी की विकास के मामले में अक्सर बयानीबाजी सुनने को मिलती रही। गुजरात दंगों पर लंबे समय तक चुप रहने वाले नीतीश कुमार ने गत लोस चुनाव में भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने पर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया उनकी जिद के चलते जदयू आैर भाजपा के गठबंधन टूट गया।
    हां भाजपा से समर्थन वापस लेने के बावजूद वह अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे। आम चुनाव में प्रचंड बहुमत से नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार हार की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया तथा अपने विश्वासपात्र जीतन मांझी को प्रदेश की बागडोर थमा दी। नीतीश कुमार के सामने इस समय दो दो बड़ी परेशानी हैं एक तो भाजपा की अगुआई में सवर्ण लामबंद हो रहे हैं वहीं  जीतन मांझी उनके लिए दिक्कत बनते जा रहे हैं। वैस राजनीति आैर युद्ध में सब कुछ जायज है। सियासत में कब कौन सा दांव चल दे जाए कहा नहीं जा सकता।
    जतीन मांझी ने भी यही किया, मौके की नजाकत को समझते हुए उन्होंने दलितों को रिझाने के लिए वह काम शुरू कर दिया, जिसे कभी लालू प्रसाद आैर नीतीश कुमार करते थे। वह भी सवर्णांे के खिलाफ मुखर होने लगे। शुरू में तो उनकी बयानबाजी को हल्के में लिया जा रहा था पर धीरे-धीरे असली राजनीतिक खेल समझ में आने लगा। वह एक रणनीति के तहत दलितों को आकर्षित करने वाली बयानबाजी कर रहे हैं। राजनीति देखिए कि अक्टूबर में होने जा रहे विधानभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का विजयी रथ रोकने के लिए लालू प्रसाद आैर नीतीश कुमार ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने की ठानी तथा देश में सपा, जदयू, राजद, इनेलो को एक सूत्र में पिरोकर जनता परिवार को संगठित करने का बीड़ा उठाया, तो मांझी ने अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया।
     उधर लालू प्रसाद आैर नीतीश कुमार जनता परिवार को संगठित करने की रणनीति में मशगूल थे, इधर बिहार में मांझी ने एक आईपीएस को सुरक्षा अधिकारी तथा पटना का कमिश्नर एक दलित को बना दिया। साथ ही दलित व अनुसूचित जन जाति के लगभग 200 आईएएस, आईपीएस आैर बिहार राज्य सिविल सेवा के अफसरों के साथ एक सीक्रेट मीटिंग कर राजनीतिक हल्कों में बैचेनी पैदा कर दी। जब उनसे इस मीटिंग के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह तो नीतीश कुमार के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। सीक्रेट मीटिंग के लिए जब उनसे कोई नहीं पूछता था तो उन्हें क्यों परेशान किया जा रहा है ? उन्हें पद से हटाने की बात पर उन्होंने कहा कि वह कुर्सी नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने दलित कार्ड खेलते हुए बताया कि अफसरों ने उनसे शिकायत की कि जातिगत कारणों के चलते प्रमोशन आैर अन्य मामलों में उनके साथ भेदभाव किया जाता है। मांझी के अनुसार अधिकारियों का कहना था कि दलित होने के कारण कई बार उन्हें फंसा दिया जाता है जबकि वैसे ही मामलों में अन्य लोग बरी हो जाते हैं। 22 फीसद दलितों में अपनी छवि निखारने के लिए उन्होंने गत सप्ताह  25 करोड़ की लागत से बीआर अंबेडकर फाउंडेशन की स्थापना की जो दलित आैर महादलित स्कॉलर्स को अध्ययन आैर शोध में मदद करेगा। इसके अलावा हाल ही में उन्होंने गया आैर बेतिया में दलितों का आह्वान किया कि अगला मुख्यमंत्री दलित बनाने के लिए जुट जाएं। दरभंगा में भी उन्होंने दलितों को अपने मान-सम्मान व अधिकार के प्रति जागरूक  होने का कहा । गया में भी उन्होंने एक सभा के दौरान दलितों को रिझाने की कोशिश की। लोग उन्हें दलित मुख्यमंत्री के रूप में देखे इसके लिए उन्होंने कहा कि वह अपने रणकौशल से यह साबित कर देना चाहते हैं कि एक महादलित भी बेहतर तरीके से सरकार चला सकता है।
    कहा जा रहा है कि 18 जनवरी को बिहार में होने जा रही बड़ी रैली में नीतीश कुमार आैर लालू प्रसाद बड़ा ऐलान कर सकते हैं। चर्चा यह भी है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री आैर लालू प्रसाद की पुत्री मीसा यादव उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा हो सकती है। इस बात की जानकारी मांझी को भी है इसलिए वह नीतीश कुमार से नाराज हैं आैर पार्टी के दलित आैर पिछड़े नेताओं को अपने साथ लामबंद कर रहे हैं। भले ही वह नीतीश कुमार को अपना नेता मानते हों।
     भले ही वह यह कह रहे हैं कि जनता परिवार से नीतीश कुमार के नाम वह मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तावित करेंगे। भले ही वह देवी देवताओं से ज्यादा नीतीश कुमार को मानने की बात कर रहे हों पर नीतीश कुमार के अधिकारियों को इधर से उधर कर उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नीतीश कुमार किसी भी तरह से उन्हें पद से हटाना चाहते हैं पर दलित वोटबैंक नाराज होने का खतरा मोल लेने को वह तैयार नहीं। मेरा भी यह मानना है कि राजनीतिक हल्कों में किसी भी तरह की चर्चा हो पर हाल की राजनीतिक माहौल को देखते हुए नीतीश कुमार मांझी को नहीं छेड़ंगे। यह बात उन्होंने कह भी दी है कि मांझी मुख्यमंत्री बने रहेंगे। इस राजनीतिक माहौल में भाजपा नेता गिरीराज सिंह का बयान भी महत्वपूर्ण है। 
      गिरीराज सिंह ने कहा कि मांझी को हटाने का ठीकरा नीतीश कुमार लालू प्रसाद के सिर तथा लालू प्रसाद नीतीश कुमार के सिरे फोड़ना चाहते हैं। ऐसे में उन्होंने मांझी के साथ गलत होने पर भाजपा उनके साथ होगी अपना दांव चल दिया है।

Saturday, 3 January 2015

गरीबी मिटाने को क्यों नहीं लाए जाते अध्यादेश ?

हमारे संविधान में देश को चलाने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई है कि कहीं पर कोई समस्या पैदा होती है तो उसके निराकरण के लिए विभिन्न विभाग स्थापित किए गए हैं। वैसे तो देश में विभिन्न एजेंसियां देश की व्यवस्था को संभाल रही हैं पर चार स्तम्भ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका आैर मीडिया महत्वपूर्ण रूप से कारगर माने जाते हैं। इनमें से भी हम लोग न्यायपालिका को सर्वोपरि मानते हैं। देश में कोई कानून बनाना होता है या फिर संशोधन करना होता है तो ऐसी व्यवस्था की गई है कि केंद्र सरकार एक विधेयक लाती है उस पर चर्चा होने के बाद वह लोकसभा व राज्यसभा से पास होकर राष्ट्रपति के पास जाता है। जब राष्ट्रपति उस पर अपने हस्ताक्षर कर देते हैं तो वह कानून बन जाता है।
     हमारे संविधान में ऐसी भी व्यवस्था भी की गई है कि यदि आपातकाल स्थिति में कोई कानून बनाना हो या उसमें संशोधन करना हो तो संबंधित मंत्रालय की अनुमति के बाद बिना लोकसभा आैर राज्य सभा के केबिनेट में एक अध्यादेश पास कराया जाता है तथा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने के बाद वह कानून बन जाता है। काफी समय से देखने में आ रहा है कि यह व्यवस्था भले ही आपातकाल के लिए बनाई गई हो पर सरकारें पूंजीपतियों के हित तथा अपने स्वार्थ के लिए अध्यादेश ले आती हैं। यह काम अन्य सरकारों ने भी किया है आैर अब मोदी सरकार भी कर रही है। बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को 26 प्रतिशत से 49 प्रतिशत करने और कोल ब्लाक के आवंटन का रास्ता प्रशस्त करने  लिए  केंद्र सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होते ही अध्यादेश का खेल खेलना शुरू कर दिया।
       सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में भी संशोधन के लिए अध्यादेश ले आई है। सरकार का तर्क है कि सदन में विपक्ष के सहयोगात्मक रवैया न अपनाने के चलते सरकार को यह रास्ता अपनाना पड़ा। यूपीए सरकार ने इन दस सालों में भूमि अधिग्रहण कानून बनाकर किसानों के हित में एक अच्छा काम किया था, जिसमें एनडीए सरकार संशोधन करने जा रही है। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने के लिए अध्यादेश लाने वाली एनडीए सरकार को यह समझना होगा कि 2013 में पास कराए गए भूमि सुधार कानून के पीछे देश भर में लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन, आदिवासी आंदोलन की भूमिका थी। इस कानून के बल पर ही किसानों-आदिवासियों की भूमि के सरकारी या गैर सरकारी तरीके से अधिग्रहण को इन लोगों की सहमति को जोड़ा गया था। साथ ही मुआवजा राशि भी इतनी रखी गई जिसके चलते उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सके। यही वजह थी कि कॉरपोरेट लॉबी यूपीए सरकार के विरु द्ध हो गई थी। भले ही प्रधानमंत्री अपने भाषणों में किसानों की चिंता जताते घूम रहे हों पर विकास परियोजनाओं और कॉरपोरेट लाबी के दबाव के चलते यह सरकार खदान कानून 1885, परमाणु ऊर्जा कानून  1962, रेलवे कानून 1989 आैर नेशनल हाइवे कानून 1956 जैसे 13 केंद्रीय कानूनों को नए भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे से बाहर करने जा रही है।
     सरकार का तर्क है इस संशोधन से किसानों को उचित मुआवजा दिया जाएगा। तो यह माना जाए कि अब भूमि अधिग्रहण में किसानों की सहमति नहीं ली जाएगी। तो यह संशोधन किसानों के हित में होगा या पूंजपीतियों के ? मान लिया जाए कि किसानों को आपने उचित मुआवजा दे भी दिया, तो उनका रोजगार तो आप उनकी बिना रजामंदी के छीन ही लेंगे। भूमि अधिग्रहण कानून पर अध्यादेश लाने के मामले में यह भी माना जा रहा है कि सरकार पूंजीपतियों के दबाव में बड़े स्तर पर किसानों की भूमि का अधिग्रहण करने जा रही है।
    ऐसे में प्रश्न उठता है कि सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि ये दो अध्यादेश पास कराए गए आैर तीसरे की लानी की तैयारी है। वित्त मंत्री का कहना है कि इन मामलों में पहले से ही बहुत देर हो चुकी है इसलिए ये जरूरी हो गया था। तो ऐसे में प्रश्न उठता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या तो महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, अपराध, बेरोजगारी आतंकवाद है। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए इनसे संबंधित कानून में संशोधन करने के लिए कोई अध्यादेश क्यों नहीं लाया जा रहा है। किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं मजदूर बेहाल हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए इनसे संबंधित कानून में संशोधन करने के लिए कोई अध्यादेश क्यों नहीं लाया जा रहा है ? कई निजी संस्थाओं में कर्मचारियों का शोषण ही नहीं उत्पीड़न तक किया जा रहा है, उन कर्मचारियों के लिए सरकार क्या कर रही है।
     इस देश का 10 फीसद तबका 90 फीसद तबके की कमाई खा रहा है। इन 90 फीसद लोगों को न्याय देने के लिए कानून बनाने के लिए कोई अध्यादेश क्यों नहीं लाया जाता। बताया जा रहा है कि इस देश का एक फीसद तबका देश की आधी संपत्ति का मालिक है आैर आैर रात दिन मेहनत कर देश के लिए काम करने वाले गरीब के पास मात्र .02 फीसद संपत्ति है। इस संपत्ति का देश में सही बंटवारा हो। ऐसा कानून बनने के लिए कोई अध्यादेश क्यों नहीं पास कराया जाता ? बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश आैर कोयला आवंटन से निश्चित रूप से सरकार को राजस्व प्राप्त होगा पर क्या देश में अध्यादेशों की व्यवस्था बस सरकार के इस्तेमाल के लिए की गई है। तो यह मान लिया जाए कि सत्ता में बैठते ही नेताओं को बस अपनी आैर अपनी सरकार की ही चिंता होती है। जिस जनता की बदौलत वे इस मुकाम तक पहुंचे हैं उनके बारे में ये लोग क्या कर रहे हैं ? इस अध्यादेश की आलोचना मैं ही नहीं कर रहा हूं। विपक्ष के साथ ही संविधानविद भी कर रहे हैं।
      बात अध्यादेश की चल रही तो हमें यह भी देखना होगा कि अध्यादेशों का यह खेल देश में लंबे समय से चल रहा है। भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के साथ समाजवादियों की सरकारें भी ऐसा ही करती रही हैं।  1970 और 1990 के दशक में संसद ने 10.6 अध्यादेश हर साल जारी किए। इनमें से महज 77.7 प्रतिशत संसद से कानून बन पाए। 1993 में 34 अध्यादेश जारी हुए। 1996-1997 में औसतन 20 से 30 अध्यादेश जारी हुए। यह संख्या 2013 में नौ तक आई लेकिन उनमें से तीन अध्यादेश दोबारा जारी किए गए।
      सरकार का तर्क है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इन विधेयकों पर चर्चा नहीं करायी जा सकी तो ये अध्यादेश लाए गए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि चर्चा नहीं की गई तो क्या सत्र को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था ? इन मामलों में वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश सीमा बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने से संबंधित वर्ष 2008 से लंबित संशोधन विधेयक से देश में 6 से 8 अरब डॉलर का पूंजी प्रवाह होगा। उनका कहना है कि वर्तमान में यह सीमा 26 प्रतिशत है। यदि हम अपने देश में व्यवस्था सही करते तो विदेशी निवेश की जरूरत ही न पड़ती। उनका कहना है कि कोयला खान (विशेष प्रावधान) बिल, 2014 को लोस ने मंजूरी दे दी, पर रास में इस पर चर्चा नहीं हो पाई। कोयले क्षेत्र पर अध्यादेश फिर से जारी होने पर निजी कंपनियों को उनके स्वयं के इस्तेमाल के लिए कोयला खानों की ई-नीलामी हो सकेगी तथा राज्य एवं केंद्रीय सार्वजनिक उपक्र मों को सीधे खानों का आवंटन किया जा सकेगा। वित्त मंत्री ने यह नहीं बताया कि इन अध्यादेशों से जनता को किस स्थिति में कितना फायदा होगा।
      राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से बीमा क्षेत्र में एफडीआई आैर कोयला खदानों की ई-नीलामी को लेकर दो अध्यादेशों पर हस्ताक्षर करने के बाद केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी शिवसेना का यह कहना कि अध्यादेशों का रास्ता अपनाने से अगले छह महीने तक 'केंद्र के सिर पर तलवार लटकती" रहेगी। अपने आप में अध्यादेश लाने के तरीके की आलोचना है। संकट का भांपते हुए शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना" में भी कहा है कि सरकार के पास राज्यसभा में जरूरी संख्या बल नहीं है। ऐसे में अध्यादेश का रास्ता सरकार के सिर पर लटकती तलवार की तरह होगा।" 
    इन सबके के बीच प्रश्न उठता है कि तमान कानून बनने के बाद आखिर गरीबी कम क्यों नहीं हो रही है ? किसानों की समस्याएं क्यों बढ़ती जा रही है ? इस देश की भुखमरी, बेचारगी, उत्पीड़न, शोषण, समस्याएं क्यों नहीं कम हो रही हैं। क्यों
पूंजीपति इस देश की संपत्ति हथियाए बैठे हैं ? क्यों गरीब बेसहाय है ?

Saturday, 20 December 2014

अपनों के विरोध में दिल्ली को कैसे फतह करेंगे केजरीवाल ?


        अन्ना आंदोलन के बल पर राजनीतिक वजूद बनाने वाले अरविंद केजरीवाल भले ही मात्र दो साल के संघर्ष के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए थे। भले ही दिल्ली के गत विधानसभा चुनाव में लोगों ने उन्हें पलकों पर बैठाया था। भले ही पूरे में देश में वह चर्चा का विषय बन गए थे। पर जिस तरह से आम चुनाव में आम आदमी पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के साथ ही दिग्गजों का भी अरविंद केजरीवाल पर उपेक्षा का आरोप लगाना, उनका मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री पद के लिए लालायित होना। वोटबैंक के लिए भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा साम्प्रदायिकता बताना। उनके खिलाफ आम आदमी सेना का गठन किया जाना। ये सब मुद्दे इन विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ी दिक्कतें लेकर आ रहे हैं। ऐसे में जब कुमार विश्वास, साजिया इल्मी, प्रभात कुमार जैसे दिग्गज  उनके खिलाफ हो गए हों। योगेंद्र यादव राजनीति में कुछ खास दिलचस्पी न ले रहे हों, तब वह कैसे दिल्ली फतह करेंगे यह समझ से बाहर है। वैसे भी आम चुनाव में जिस तरह से उन्होंने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर सेलिब्रिटी को तवज्जो दी थी उससे उनकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगना स्वभाविक है।
       इन चुनाव में यह बात मुख्य रूप से देखी जा रही है कि अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की गलती स्वीकार कर रहे हैं आैर इसके लिए लोगों से माफी भी मांग रहे हैं। दरअसल अरविंद केजरीवाल को अब तक की गई गलतियों का अहसास हो गया है। उनकी समझ में आ गया है कि उनकी अति महत्वाकांक्षा के चलते देश में जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी में राजनीति के प्रति रुझान पैदा हुआ था वह धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। उनकी समझ में आ गया है कि अन्ना आंदोलन के बाद उनकी गलतियों का फायदा भाजपा उठा ले गई। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में करारी शिकस्त के बाद उनकी समझ में आ गया कि संघर्ष के साथियों की उपेक्षा उन पर भारी पड़ी। उनकी समझ में आ गया है कि बिना समर्पित कार्यकर्ताओं आैर संगठन के राजनीति नहीं की जा सकती है। उनकी समझ में आ गया है कि काम को धरातल पर लाए बिना जनता का विश्वास लंबे समय तक कायम नहीं रखा जा सकता है। उनकी समझ में आ गया है कि कुछ विशेष लोगों के पार्टी को कब्जाने का नतीजा क्या होता है। उनकी समझ में आ गया है कि उनकी मनमानी के चलते योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास आैर साजिया इल्मी जैसे विचारवान नेताओं को उनकी नीतियों की आलोचना करनी पड़ी। उनकी समझ में आ गया है कि यदि पंजाब में उन्हें चार सीटें न मिली होती तो वह जनता का मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचते। उनकी समझ में आ गया है कि दिल्ली की सत्ता छोड़कर केंद्र की सत्ता की ललक ने दिल्ली के लोग भी उनसे नाराज कर दिए।
      ऐसे में प्रश्न उठता है कि अरविंद केजरीवाल पर से कम हुआ जनता का विश्वास फिर से कैसे बनाया जाएगा ? जिस व्यक्ति की नीतियों का विरोध अब उसके संगठन में ही होने लगा हो। जिस दल को छोड़कर कई नेता घर बैठ गए हों पर जिस दल के मुखिया पर तानाशाह का आरोप लगाकर बागी कार्यकर्ताओं ने आम आदमी सेना बना ली। जिस दल में दो  राष्ट्रीय नेता योगेंद्र यादव आैर नवीन जयहिंद का विवाद राजनीतिक गलियारे में गूंजा हो, जिस दल में योगेंद्र यादव पर अरविंद केजरीवाल के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले मनीष सिसोदिया ने खुले रूप से अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक रूप से खत्म करने का आरोप लगा दिया हो उस दल पर जनता अब कैसे विश्वास करेगी ?
      अरविंद केजरीवाल के अब तक के राजनीतिक करियर की बात करें तो उनमें  राजनीतिक रूप से असुरक्षा की भावना देखी गई है। आम आदमी पार्टी से विभिन्न दलों के अच्छे छवि के लोग जुड़ना चाहते थे पर उन्होंने उन्हें सटाया तक नहीं। यदि इक्का-दुक्का लिए भी तो खास तवज्जो नहीं दी। जैसे कि कांग्रेस से छोड़कर आप में अलका लांबा को पार्टी में कोई खास तवज्जो नहीं दी गई। कभी भाजपा में रहे निर्दलीय पार्षद से आप में आकर विधायक बने विनोद कुमार बिन्नी को कितनी फजीहत झेलनी पड़ी। विनोद कुमार बिन्नी के मामले में किसी विधायक को लोकसभा का टिकट न देने की बात करने वाले अरविंद केजरीवाल खुद वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़े आैर राखी बिडलान को पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ाया। आवेदन के नाम पर टिकट देने का वादा करने वाले अरविंद केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने आम चुनाव में आवेदनों को कचरे की टोकरी में डालकर सेलिब्रिटी आैर विशेष लोगों को ही टिकट दिए। उनके पार्टी के ही कार्यकर्ताओं ने उन पर आरोप लगाए कि पार्टी के खड़ी होते ही वह पुराने साथियों को भूल गए आैर पैसे वाले नेताओं को तवज्जो देने लगे। मुंबई में उन्होंने 20,000 रुपए देने वाले लोगों के साथ डिनर किया। मुस्लिम वोटबैंक के लिए उन्हें साम्प्रदायिकता भ्रष्टाचार से बड़ा मुद्दा दिखाई देने लगा। ऐसे में जनता को फिर से विश्वास में लेना अरविंद केजरीवाल के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी।